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कोई पूछे कि नरेंद्र मोदी की विशाल जीत की वजह सिर्फ एक शब्द में बतलाओ, तो जवाब होगा ‘मीडिया’!

गिरीश मालवीय

19वीं शताब्दी के एक फ्रेंच उपन्यासकार ने व्यवसाय बन चुकी पत्रकारिता के बारे में सही कहा था कि दरअसल ‘पत्रकारिता ‘मानसिक वेश्यालय’ में बदल गयी है, जिसमें समाचारपत्र मालिक ठेकेदार होते हैं और पत्रकार दलाल की भूमिका निभाते हैं’.

आज यह बात इसलिए याद आयी कि यूरोप के छोटे से देश ऑस्ट्रिया में सत्तारूढ़ दल अचानक अल्पमत में आ गया और सरकार गिर गयी। इसकी वजह हम भारतवासियों को बड़ी आश्चर्यजनक लग सकती है।

दरअसल कुछ समय पूर्व जर्मन मीडिया में एक वीडियो फुटेज सामने आया यह वीडियो ऑस्ट्रिया के 2017 में हुए चुनाव से पहले का बताया जा रहा है। इस वीडियो में फ्रीडम पार्टी के नेता और जर्मनी के मौजूदा सरकार में वाइस चांसलर रहे हेनिज़ क्रिश्चियन स्टार्के अपनी ही पार्टी के अहम नेता जोहान्ना गुडेनस के साथ बात कर हैं.

इस वीडियो में दोनों नेता एक रूसी महिला के साथ बैठे और ड्रिंक्स लेते भी देखे जा रहे हैं. बताया जा रहा है कि ये महिला किसी रूसी बिजनेसमैन की भतीजी है। इस वीडियो में स्टार्के उस महिला से ऑस्ट्रियाई समाचार पत्र कोरेनेन जिटुंग में बड़ी हिस्सेदारी ख़रीदकर फ्रीडम पार्टी की मदद करने की अपील कर रहे हैं और इसके बदले में मदद देने की बात कर रहे हैं.

इस वीडियो के सामने के बाद आस्ट्रिया के चांसलर कुर्ज़ ने स्टार्के को हटाने का फ़ैसला लिया. स्टार्के को अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा.इसके बाद फ्रीडम पार्टी के दूसरे मंत्रियों ने भी इस्तीफ़ा दे दिया और इसके बाद से बाद आस्ट्रिया के चांसलर कुर्ज़ की सरकार अल्पमत में आ गई।

मतलब यह है कि एक छोटा सा स्टिंग ऑपरेशन हुआ और जिस पर आरोप लगा उसे गद्दी छोड़ना पड़ी। लेकिन क्या भारत मे ऐसा होता है?यहाँ तो बड़े बड़े स्टिंग सामने आ जाते हैं और सरकार के कानों पर जू भी नही रेंगती।

तहलका ओर कोबरापोस्ट जैसी न्यूज़ वेबसाइट ने ऐसे कई वीडियो रिलीज किये लेकिन उसका क्या नतीजा निकला हम अच्छी तरह से जानते हैं।

आस्ट्रिया की सरकार महज इसलिए गिर जाती है कि एक नेता देश के एक प्रमुख अखबार कोरेनेन जिटुंग में बड़ी हिस्सेदारी ख़रीदकर फ्रीडम पार्टी की मदद करने की अपील कर रहा है और इसके बदले में मदद की बात कर रहा है।

हमारे यहाँ क्या हो रहा है? अम्बानी के रिलायंस के पास नेटवर्क 18 है विभिन्न न्यूज चैनल्स है, एस्सेल के सुभाष चंद्रा के पास जी समूह है, चंद्रशेखर के रिपब्लिक को ही देख लीजिए और समाचार पत्रों की तो बात ही क्या की जाए जब टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे नामी गिरामी समाचार पत्र समूह के मालिक विनीत जैन खुद प्राउड से कहते हैं ‘पत्रकारिता वास्तव में विज्ञापन के व्यवसाय का दूसरा नाम है’

क्या कोई 2019 के चुनावों में मीडिया के रोल को नजरअंदाज कर सकता है?

कोई अगर मुझसे पूछे कि आप नरेंद्र मोदी की इस विशाल जीत की वजह सिर्फ एक शब्द में बतलाओ, तो मेरा जवाब होगा ‘मीडिया’!

मीडिया ने पिछले 6 सालों से मोदी की छवि को लार्जर देन लाइफ बना करके पेश किया है। अखबार और टीवी न्यूज चैनल लगातार केवल और केवल मोदी ही छाये हुए हैं। उसे देखिये और उसी के बारे में बात कीजिए, और कुछ मत सोचिए। थ्योरी ऑफ एजेंडा सेटिंग का इससे बेहतर शायद ही कोई उदाहरण हो सकता है।

लेकिन इतना होता तो भी ठीक था। मीडिया ने एक दूसरा काम भी किया है जो इससे भी ज्यादा खतरनाक है। मीडिया जन साधारण से जुड़े असली मुद्दे भुलवाने का काम कर रही है। मीडिया दरअसल उसी मुद्दे को लेकर काम करती है जिससे कोई विवाद जुडा हो या विवाद खडे होने की संभावना हो।

वाल्टर लिपमेंन ने दशकों पहले इस प्रक्रिया को समझ लिया था वह कहते हैं ‘मीडिया ये बताने पूरी तरंह सफ़ल नहीं हो पाती कि समाज को क्या सोचना है बल्कि ये बताने में पूरी सफ़ल रहती है कि समाज को किस बारे में सोचना है।” क्या सोचना है और किस बारे में सोचना है दोनों में बड़ा फर्क है।

मीडिया जिन मुद्दो को जन्म देती है वही मुद्दें समाज की प्राथमिकताएंं बन जाते हैं। आज जिस मुदे को मीडिया बडे ही जोर शोर से उठाता है उसको समाज का समाज ज्यादा सोचे-विचारे बिना ठीक वही नजरिया अपनाने लगता है। पर वास्तविकता बिलकुल इससे भिन्न होती है। नतीजा यह निकल रहा है कि आज मीडिया समाज के एक बडे तबके की सोच पर राज कर रहा है। उसने मोदी मोदी का ऐसा जयकारा सुबह शाम लगाया है कि आम आदमी की स्वतंत्र सोच पर मनो पत्थर पड़ गया है।

इस संदर्भ में अमेरिकी दार्शनिक नोम चोमस्की को भी समझना होगा। वे लिखते हैं कि मास मीडिया लोगों को डायवर्ट करने का काम करता है। वह प्रोफेशनल लोगों के लोक व्यवहार, स्कैंडल या फिर बड़े लोगों की व्यक्तिगत बातों को जमकर सामने रखता है. क्या इससे इतर और कोई गंभीर मामले होते ही नहीं क्या?

नोम चोम्स्की मानते है कि जितने बड़े मीडिया घराने हैं वे एजेंडे को सेट करने में लगे हुए हैं। अमेरिका के न्यूयार्क टाइम्स और सीबीएस ऐसे मामलों के बादशाह हैं। उनका कहना है कि अधिकतर मीडिया इसी सिस्टम से जुड़े हुए हैं। संस्थानिक ढांचा भी कमोबेश उसी तरह का है। न्यूयार्क टाइम्स एक कॉरपोरेशन है और वह अपने प्रोडक्ट को बेचता है। उसका प्रोडक्ट ऑडियंस है। वे अखबार बेचकर पैसे नहीं बनाते। वे वेबसाइट के जरिए खबरें पेश करके खुश हैं। वास्तव में जब आप उनके अखबार खरीदते हैं तो वे पैसे खर्च कर रहे होते हैं। लेकिन चूंकि ऑडियंस एक प्रोडक्ट है, इसलिए लोगों के लिए उन लोगों से लिखाया जाता है तो समाज के टॉप लेवल नीतिनियंता हैं। आपको अपने उत्पाद को बेचने के लिए बाजार चाहिए और बाजार आपका विज्ञापनदाता है। चाहे टेलीविजन हो या अखबार या और कुछ, आप ऑडियंस को बेच रहे होते हैं.

भारत मे बहुत बड़े लेवल पर यह खेल खेला जा चुका है। कल तक पेट्रोल व मोबाइल बेचनेवाली कंपनियां आज अखबार निकाल रही हैं, समाचार चैनल चला रही हैं। कुल मिलाकर प्रिंट व इलेक्ट्राॅनिक मीडिया पर काॅरपोरेट घरानों का कब्जा हो गया है। वो हमसे और आपसे ज्यादा बेहतर समझ रखते हैंं कि उनकी नीतियो को जो सूट करेगा उसे ही सबसे बड़े पद पर आसीन रखा जाएगा।

देश वस्तुतः एक बाज़ार में बदल गया है। हम वही सोचते है जिसे हमें सोचने पर मजबूर किया जाता है। हम उसी को जितवा रहे हैं जिसको बाजार जिताना चाहता है. यह नमो टीवी, जी टीवी, रिपब्लिक टीवी, आज तक एबीपी ओर यहाँ तक कि NDTV भी एक टूल है. हम सिर्फ कठपुतलियां हैं. हमने अपने दिमाग को गिरवी रख दिया है.

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