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प्रेस कॉन्फ्रेंस के नाम पर की गई नौटंकी के लिए नरेंद्र मोदी को याद किया जाएगा!

श्याम मीरा सिंह

इस तस्वीर को सेव कर लीजिए। तानाशाही के दौर की ये अबतक की सबसे खूबसूरत तस्वीर है। कल्पना कीजिए किसी यूरोपीय देश की जनता ने किसी शख्स को 5 साल शासन करने के लिए चुना होता। पांच साल बाद जब हिसाब देने का वक्त आता तो वह शख्स ढोंग करने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस करता। पत्रकारों को बुलाता। तमाम पत्रकारों को बुलाकर बेहयाई के साथ एक भी सवाल का जवाब देने से भी मना भी कर देता… यह कहते हुए कि जवाब मैं नहीं दूंगा मेरी पार्टी का चीफ देगा।

इस हद दर्जे की तानाशाही पर आपकी क्या प्रतिक्रिया होती।

इस एक आदमी ने जनता के जनादेश को खिलौना माना हुआ है। क्या आप जानते हैं नरेंद्र मोदी को एक लोकतंत्र में इतना गैरजिम्मेदाराना होने की ताकत कहाँ से मिलती है..! इस देश की मूर्ख जनता से।

जब सत्तर के दशक में इंदिरागांधी ने इमरजेंसी लगाई थी तब अखबारों के ऊपर भी सेंसरशिप लगा गई दी थी यानी अखबारों में क्या छपेगा क्या नहीं। इसकी जांच सबसे पहले सरकारी आदमी करेंगे। इसके विरोध में इंडियन एक्सप्रेस ने अपने सम्पादकीय पेज खाली छोड़ दिए। उनमें कुछ लिखा ही नहीं। उस पन्ने पर कुछ छापा ही नहीं। अखबार के उस खाली पन्ने ने अपना जो विरोध दर्ज किया वह इतिहास बन गया। इमरजेंसी के समय सरकार की गोद में लोट मारने अखबारों के नाम कोई नहीं जानता लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की उस हिम्मत पर कोई भी डेमोक्रेसी ताउम्र नाज करेगी। जब भी तानाशाही का दौर आएगा। इंडियन एक्सप्रेस को याद किया जाएगा।

शायद किताब के कोई शब्द उतनी ताकत के साथ विरोध न जता पाते जितना उन खाली पन्नों ने जताया

देश के हरेक अखबार को इंडियन एक्सप्रेस और टेलीग्राफ से सीखने की जरूरत है। तानाशाह आते रहेंगे, गद्दी से खचेरे भी जाएंगे। सड़क पर पटके भी जाएंगे। लेकिन अखबारों को तो कमसे कम अपनी रीढ़ की हड्डी बचाए रखनी चाहिए।

नरेंद्र मोदी को बताना चाहिए कि देश की जनता ने प्रधानमंत्री को संसद चुनकर भेजा था उनके पार्टी अध्यक्ष को नहीं!

प्रेस कॉन्फ्रेंस के नाम पर की गई बेहयाई के लिए नरेंद्र मोदी को याद किया जाएगा…!

टेलीग्राफ के विरोध करने के इस तरीके को सहेजने की जरूरत है ताकि आने वाली पीढ़ियों को इस लोकतंत्र को ऐसे ही सौंपा जा सके जैसे इंडियन एक्सप्रेस ने हमें सौंपा।

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