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रोहतक में नरेंद्र मोदी: ‘बदले-बदले मेरे सरकार नज़र आते हैं’

धीरेश सैनी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2014 के हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान हुई रोहतक रैली से उनकी कल की लोकसभा चुनाव प्रचार के तहत रोहतक में हुई रैली से तुलना करें तो उस मशहूर गीत के मुखड़े के शेर की पहली लाइन याद आती है। ‘बदले-बदले मेरे सरकार नज़र आते हैं’। शेर की दूसरी लाइन ‘घर की बर्बादी के आसार नजर आते हैं’ को फ़िलहाल यहां एप्लाई करना शायद ठीक न रहे।

2014 के विधानसभा चुनाव के दौरान रोहतक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जाटों को लेकर बेहद मुखर होकर आक्रामक रहे थे। प्रदेश के दूसरे कई हिस्सों में पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला को लेकर आक्रामक रहे मोदी के निशाने पर रोहतक में तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा थे। उन्होंने 2012 में एक के बाद एक हुई दलित उत्पीड़न की कई सनसनीखेज वारदातों का हवाला देते हुए बाहुबली शब्द का इस्तेमाल किया था जिसे डीकोड करना मामूली समझ वाले किसी व्यक्ति के लिए भी कठिन नहीं था। मुझे याद है कि उस रैली के बाद हम एक चौधरी पत्रकार साथी के दफ्तर में बैठे हए थे जो बाहुबली शब्द को लेकर बेहद विचलित था।

दरअसल, वेस्ट यूपी में लोकसभा चुनाव से पहले साम्प्रदायिक विभाजनकारी अभियान में जाटों को साथ लेकर दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान तक फायदे में रह चुकी भाजपा के लिए हरियाणा में मेवात को छोड़कर हिन्दू बनाम मुसलमान कार्ड से कुछ बड़ा निकलना मुमकिन नही था। हालांकि, उसकी अपील लायक जगह उसके पास थी ही। तब जाट बनाम गैर जाट जो हरियाणा की राजनीति का पुराना आसान फार्मूला था, भाजपा के काम आने जा रहा था।

रोहतक की शहरी सीट से लेकर प्रदेश भर में भाजपा ने न केवल इस कार्ड को जमकर दुहा बल्कि बाद में भी इस प्रोजेक्ट पर काम जारी रखा। मनोहर लाल खट्टर के तौर पर हरियाणा में पहला पंजाबी सीएम देने से लेकर दंगों तक भाजपा गैर जाट वोटों की सबसे बड़ी ठेकेदार बन चुकी थी। भाजपा की इस भयानक राजनीति पर आँसू बहाने वाले इस कार्ड के पुराने सॉफ्ट प्लेयर्स की स्थिति आज ‘जब ऱंज़ दिया बुतों ने ख़ुदा याद आया जैसी है’।

सवाल यह है कि कल नरेंद्र मोदी रोहतक में दंगों के ज़िक्र से क्यों बचे और 2014 की तरह ‘बाहुबलियों’ पर आक्रामक क्यों नहीं हुए। क्या इसलिए कि दंगों में भाजपा की केंद्र और प्रदेश सरकारों की भूमिका संदिग्ध थी और पीएम खुद जवाबदेही के घेरे में आते।

जाहिर है कि संघ या उसकी विंग भाजपा जवाबदेही की परवाह करती ही नहीं है। असल में, गैर जाटों के वोटों को लेकर भाजपा लगभग सन्तुष्ट है। रोहतक में हुड्डा परिवार के प्रति हालिया परिस्थितियों में जाट वोटरों में उमड़ रही सहानुभूति को हवा न देने की वजह से शायद उन्होंने यह रणनीति बरती हो। हिसार और भिवानी जैसी सीटों पर बुरा असर पड़ने की आशंका के मद्देनज़र भी शायद मोदी को हरियाणा से यही फीड किया गया हो।

इस रैली से पहले सांपला में चौ. छोटूराम की प्रतिमा के अनावरण के मौके पर रैली कर चुके मोदी ने कल उनका नाम ज़रूर दो बार लिया। एक बार शुरू में रोहतक को छोटूराम और मंगलसेन की धरती बताते हुए जो शायद ही जाटों को पसंद आया हो। मंगलसेन रोहतक से बार-बार जनसंघ के विधायक रहे थे और वे संघ की राजनीति का हरियाणा के खासकर पंजाबी इलाक़ों में नेतृत्व करते थे। प्रदेश के पंजाबी वोटरों पर भजनलाल के असर को वही चुनौती देते थे। अब चूंकि संघ की चड़दी कलां है तो मंगलसेन को छोटूराम के बराबर खड़ा करने की कोशिश से भी आगे जाकर भाजपा चंडीगढ़ एयरपोर्ट के नामकरण में भगत सिंह की जगह मंगलसेन का नाम उछाल चुकी है।

यह भी दिलचस्प है कि मंगलसेन और उनके बाद के भाजपाइयों को हरियाणा में जाट नेताओं देवीलाल, बंसीलाल, चौटाला आदि से ही राजनीतिक सहारा हासिल होता रहा है। जहां तक छोटूराम का सवाल है तो उनकी राजनीति को लेकर तमाम तार्किक सहमतियों-असहमतियों के बावजूद यह भी सच है कि वे पंजाब में हिन्दू महासभा के बजाय फजले हुसैन वगैराह के साथ मिलकर यूनियनिस्ट पार्टी की राजनीति कर रहे थे।

आर्य समाज के बहाने संघ की ज़मीन पर ही सॉफ्ट हिंदूवादी राजनीति करते रहे हरियाणा के जाट नेता इस तथ्य पर चुप रहते आए हैं। हुड्डा के मुंह से उनके सीएम पद से हटने के बाद रोहतक में छोटूराम जयंती पर भाजपा नेताओं की मौजूदगी में एक बार जरूर यह बात पुख़्ता ढंग से मुझे सुनने को मिली थी पर बाद में उन्होंने इसे सिलसिला नहीं बनाया था। मोदी ने ‘सर छोटूराम’ को भाखड़ा डैम का श्रेय देते हुए आरोप लगाया कि कांग्रेस ने उनसे यह श्रेय छीनने की कोशिश की। यूँ ही दिलचस्प यह कि श्रेय छीनने की बातों के दौरान मुझे तो आडवाणी की भी याद आई।

नरेंद्र मोदी ने 2014 में करप्शन पर हुड्डा को तो घेरा था पर वाड्रा का ज़िक्र नहीं किया था लेकिन इस बार उन्होंने वाड्रा को जेल भेजने का वादा किया। पिछले चुनाव में उन्होंने श्वेत क्रांति और लाल क्रांति जैसे जुमलों के जरिये बीफ और मांस के कारोबार पर अंकुश और दूध उत्पादन में वृद्धि की बातें की थीं और इस बहाने कम्युनिस्टों को भी निशाने पर लिया था। इस बार उन्होंने ऐसा कुछ नहीं बोला। बोलते तो आंकड़े उन्हें झूठ ठहराते पर आंकड़ों से उन्हें क्या? जैसे उन्होंने आभास दिया कि अब हिंदुस्तान के मोबाइल फोन के बाजार में चीन का दबदबा खत्म हो गया है।

मोदी ने 2014 की रैली में केसरिया बनाम सेक्युलर पर ज़ोर था, इस बार ‘भगवा आतंक’ के आरोपों के मसले पर बोले। बोले तो 2014 में वे भारत के उस डंके के बारे में भी थे जो उनके मुताबिक उनकी बदौलत दुनियाभर में बज रहा था। इस बार इस डंके पर वे नहीं बोले पर संयोग/दुर्योग से एक अमेरिकी पत्रिका का कवर पेज कल से ही फ़िज़ा में था जो उन्हें ‘डिवाइडर इन चीफ’ के खिताब से नवाज़ रहा था।

*दलित उत्पीड़न की उन वारदातों पर न्याय कहाँ पहुंचा जिनका ज़िक्र मोदी ने 2014 में किया था?

(रोहतक प्रेम-एक दिन लेट)

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