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जब नेहरू ने कहा कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान के हाथों में खेल रहे हैं हिंदुत्ववादी संगठन

देश में कश्मीर मुद्दे को लेकर एक बार फिर भावनात्मक और उग्र बहस चल रही है. हमने देखा कि कश्मीर में आतंकवादी हमले में जवानों की शहादत के बाद देश के कई इलाकों में कश्मीरियों की पिटाई की गई. इन दोनों घटनाओं से आम भारतीय और आम कश्मीरी के बीच प्रेम की डोर कमजोर हुई है. कश्मीरियों की पिटाई करने वाले खुद को हिंदुत्ववादी बताते हैं. ऐसे में 1949 से 1953 का वह दौर देखना महत्वपूर्ण होगा जब कबायलियों को भारत से खदेड़ने के बाद कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने की प्रक्रिया चल रही थी. पत्रकार पीयूष बबेले की किताब नेहरू मिथक और सत्य में इस प्रसंग का विस्तार से वर्णन है.

यहां देखिए कि कश्मीर समस्या के हल के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, शेख अब्दुल्ला, कश्मीर के महाराज हरि सिंह, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, भारतीय जनसंघ और अकाली दल क्या भूमिका निभा रहे थे. और नेहरू को क्यों लग रहा था कि इन दक्षिणपंथी संगठनों के आंदोलन कश्मीर घाटी में भारत की स्थिति को कमजोर करेंगे और पाकिस्तान को फायदा पहुंचाएंगे.

जब नेहरू ने कहा कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान के हाथों में खेल रहे हैं हिंदुत्ववादी संगठन

परिस्थितियों के इस मोड़ पर कश्मीर फिर वहीं पहुंच गया था, जहां से भारत और पाकिस्तान के बंटवारे की बात शुरू हुई थी. एक तरफ शेख अब्दुल्ला आजाद कश्मीर का ख्वाब देख रहे थे, तो दूसरी तरफ राजा हरि सिंह और उस उस समय के हिंदूवादी संगठन जम्मू, पंजाब और दिल्ली में जम्मू प्रजा परिषद के बैनर तले हिंदुत्ववादी आंदोलन चला रहे थे. इन दोनों रणनीतियों का परिणाम हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य के तौर पर सामने आना था. इससे कश्मीर को सैद्धांतिक और मानवीय ढंग से भारत का अंग होने में दिक्कत खड़ी होने वाली थी.

17 अप्रैल 1949 को पंडित नेहरू ने सरदार पटेल को पत्र लिखा. इस पत्र में अन्य बातों के साथ इस बात का उल्लेख किया गया है कि “जम्मू प्रांत में क्षेत्रीय जनमत संग्रह के लिए हिंदू आंदोलन बढ़ रहा है. यह विचार इस मान्यता पर आधार रखता है कि सारे कश्मीर के लिए किया जाने वाला जनमत संग्रह निश्चित रूप से भारत के विरुद्ध जाएगा. इसलिए हम कम से कम जम्मू को तो अपने हाथ में रखें. आपको शायद स्मरण होगा कि कुछ महीने पहले इसी तरह का कोई प्रस्ताव महाराजा ने भी प्रस्तुत किया था. मुझे लगता है कि इस तरह का प्रचार वास्तव में हमारे लिए बड़ा हानिकारक सिद्ध होगा. भविष्य में कुछ भी क्यों न हो, लेकिन मैं नहीं मानता कि जम्मू प्रांत हमसे छिन जाएगा. अगर हम केवल जम्मू प्रांत ही चाहते हों और राज्य का बाकी भाग पाकिस्तान को सौंप देने के लिए तैयार हों तो इसमें कोई शक नहीं कि कुछ ही दिनों में हम यह मुद्दा खड़ा कर सकेंगे. हम जिस महत्वपूर्ण वस्तु के लिए लड़ रहे हैं, वह तो है कश्मीर की घाटी. क्षेत्रीय जनमत संग्रह का यह प्रचार जम्मू, दिल्ली और अन्य स्थानों में चल रहा है. यह प्रचार जम्मू प्रजा परिषद नामक संस्था द्वारा किया जा रहा है. गुप्तचर विभाग के हमारे अधिकारी ने रिपोर्ट दी है कि इस प्रजा परिषद को आर्थिक सहायता महाराजा से मिलती है. इसके अलावा धर्मार्थ फंड के लिए जो रकम जुटाई जाती है, जिस पर महाराजा का नियंत्रण है, उसका उपयोग महाराजा के लिए प्रचार करने में होता है. इसके फलस्वरूप एक अत्यंत विचित्र और दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति पैदा हो रही है. हम जानते हैं शेख अब्दुल्ला और उनके कुछ साथियों ने अपने सार्वजनिक भाषणों और उद्गारों में बड़ी नासमझी का परिचय दिया है. उन्होंने अनुचित रूप में महाराजा की टीका की है और उन्हें पद से हटाने की मांग की है. पिछली रात शेख अब्दुल्ला से मेरी लंबी बातचीत हुई और मैंने पुनः जोरदार शब्दों में उनसे कहा कि खास तौर पर इस मामले में उनका रवैया कितना गलत और दुर्भाग्यपूर्ण रहा है. वह कैसे न केवल हमारे लिए बल्कि खुद उनके लिए कठिनाइयां पैदा कर रहा है.”

लेकिन कश्मीर के भीतर कोई बड़ा कदम उठाने से पहले नेहरू कश्मीर मामले पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति चाहते थे. 8 अप्रैल 1950 को भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के बीच नई दिल्ली में एक समझौता हुआ. जिसमें दोनों देश शांति कायम रखने पर रजामंद हुए.

जब इस समझौते में मीन-मेख निकाली गई तो नेहरू ने कहा कि “अगर युद्ध को टालने वाली कोई भी बात तुष्टीकरण है, तो हां हमने पाकिस्तान का तुष्टीकरण किया है. इस परिभाषा के हिसाब से पाकिस्तान ने भी हमारा तुष्टीकरण किया है.”

इसी दिन नेहरू ने कहा, “7 दिन तक लगातार चले मैराथन विचार विमर्श के बाद यह समझौता हुआ है. समझौते के कुछ हिस्सों की आलोचना संभव है और यह समझा भी जा सकता है. लेकिन असली बात समझौते के ब्योरे में नहीं है, बल्कि उसमें निहित भावना और भविष्य की संभावनाओं में है.’’

15 अप्रैल को नेहरू ने कहा, “समझौता होने से पहले एक ही विकल्प बचा था और वह था युद्ध. हम भले ही युद्ध के कितने भी खिलाफ हों, लेकिन दुर्भाग्य से दुनिया में अभी यह एक विकल्प के तौर पर बचा हुआ है. अगर यह विकल्प खत्म हो गया होता तो हम क्यों सेना, नौसेना और वायुसेना रखते. इसलिए हम इस तरह के अंदेशों के लिए तैयार रहते हैं, भले ही वे हमें कितने ही अस्वीकार क्यों न हों. लेकिन हमें युद्ध के खतरों के बारे में भी तैयार रहना चाहिए. ज्यादातर लोग जो युद्ध के बारे में बात करते हैं, इसके परिणामों को समझते नहीं हैं. यह परिणाम भयानक होते हैं. परिणामों को छोड़ भी दें तो यह सोचना पड़ेगा कि क्या युद्ध से हमारी तात्कालिक समस्या का कोई हल निकल सकता था. अक्सर कहा जाता है की आधुनिक विश्व में युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है, भले ही पुराने समय में यह समस्याएं हल करता रहा हो.”

इस तरह नेहरू ने पाकिस्तान के साथ समझौता कर तत्काल किसी युद्ध की संभावनाओं को टाल दिया. अब उनके पास कश्मीर को भीतर से संभालने के लिए पर्याप्त गुंजाइश थी. यहां तक पहुंचते-पहुंचते भीतर ही भीतर जनमत संग्रह कराने के बारे में उनका मन बदलने लगा था.

सरदार पटेल ने 3 जुलाई 1950 को नेहरू को पत्र लिखा. इसमें जनमत संग्रह पर नेहरू की बदली हुई सोच का संकेत भी पटेल देते हैं-

“मैं कश्मीर के संबंध में चिंतित हो रहा हूं. खास तौर पर शेख साहब के रवैये के बारे में, राज्य में कम्युनिस्टों की घुसपैठ का कारगर सामना करने में उनकी असफलता के बारे में तथा नेशनल कांफ्रेंस में पैदा हुए मतभेदों के बारे में मैंने पी सी चौधरी से बात की है. उनके कहने से मालूम होता है की नेशनल कान्फ्रेंस और शेख साहब कश्मीर घाटी के लोगों पर अपना प्रभाव खो रहे हैं और कुछ हद तक अप्रिय बन रहे हैं. साथ ही यह भी पता चला है कि हमने घाटी के लोगों के लिए जो कुछ किया है, उसकी स्पष्ट शब्दों में प्रशंसा की जा रही है, यद्यपि लोगों को स्वभावत: ऐसा लगता है की उनके लिए इससे अधिक कुछ किया जाना चाहिए. ऐसी परिस्थितियों में और आज की वैश्विक परिस्थिति में मैं इस बात में आपके साथ हूं कि कश्मीर में जनमत संग्रह अवास्तविक और अस्वाभाविक है. इतना ही नहीं, वह निश्चित रूप से खतरनाक साबित होगा, क्योंकि मेरी अपनी भावना यह है कि एक बार जनमत संग्रह की बात शुरू हुई कि जम्मू और कश्मीर की गैर मुसलमान जनता घबराने लगेगी और संभव है कि हमें भारत की दिशा में इन लोगों की हिजरत की समस्या का सामना करना पड़े. हमारे दृष्टिकोण के बारे में यह एक अतिरिक्त बिंदु है, जिस पर हमें जोर देना चाहिए कि जनमत संग्रह की बात हम कर सकें, उससे पहले उसकी प्रारंभिक शर्तें पूर्णता और परिणामकारी ढंग से पूरी की जानी चाहिए.”

सरदार पटेल की चिंता जायज थी. लेकिन अब उनका वक्त बीत रहा था. अंग्रेजों से आजादी की लंबी लड़ाई और उसके बाद देसी राज्यों का भारत में विलय, ऊपर से महात्मा गांधी की हत्या और फिर कश्मीर की समस्या, इन सब से पटेल थक चुके थे. 15 दिसंबर 1950 को सरदार पटेल इस दुनिया से विदा हो गए. इससे पहले जनवरी 1948 में महात्मा गांधी और सितंबर 1948 में मोहम्मद अली जिन्ना भी फानी दुनिया को अलविदा कह चुके थे. अब उपमहाद्वीप में जवाहरलाल नेहरू सबसे बड़े नेता थे. इसलिए बड़ी समस्या निपटाने में वह अकेले थे, उन्हें आगे का कठिन सफर अकेले तय करना था.

नेहरू शेख अब्दुल्ला का कोई पक्का इंतजाम कर पाते, इससे पहले ही जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में जम्मू-कश्मीर का घनिष्ठता से भारत में विलय करने का उग्र आंदोलन शुरू हो गया. यह आंदोलन दिल्ली, पंजाब और जम्मू में ज्यादा जोर पकड़ रहा था, जहां बड़ी संख्या में पाकिस्तान से आए हिंदू और सिख शरणार्थी रह रहे थे. यह आंदोलन एक तरफ देश में उग्र दक्षिणपंथी राजनीति की नींव रख रहा था, तो दूसरी तरफ भारत और कश्मीर घाटी के बीच भरोसे के रिश्ते को कमजोर कर रहा था. इसी दौरान भारतीय जनसंघ और अकाली एक दूसरे के करीब आए. उनकी यह कुरबत अब तक भाजपा-अकाली दल के गठबंधन के रूप में जिंदा है.

भारत में हिंदुत्व के उभार की ताकतवर पृष्ठभूमि तैयार करने वाले इस आंदोलन के असली मंसूबों और भावी खतरों के बारे में 27 जनवरी 1953 को नेहरू ने अपने मुख्यमंत्रियों को विस्तार से समझाया:

“जम्मू का विरोध प्रदर्शन, जिसके बारे में मैंने आपको पहले भी लिखा है, बहुत ही मूर्खतापूर्ण और शरारतपूर्ण है. कोई भी सामान्य दिमाग का आदमी यह बात समझ सकता है कि इस विरोध प्रदर्शन से जम्मू और भारत के हितों पर बुरा असर पड़ेगा और यह पाकिस्तान के हाथ में खेलने जैसी बात है. लेकिन हद यह है कि यह सब भारत से और बेहतर घनिष्ठता के नाम पर किया जा रहा है. आप जानते हैं कि जम्मू और कश्मीर का पूरा मामला अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़ा हुआ है. किसी संगठन का ऐसा विरोध प्रदर्शन करना जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमारे खिलाफ जाए, मूर्खता की पराकाष्ठा है. इसके बावजूद भारत के कुछ सांप्रदायिक संगठन मुख्य रूप से जन संघ, आरएसएस और अकाली दल ने इन विरोध प्रदर्शनों के पीछे अपना पूरा जोर लगा दिया है. यह बात स्पष्ट है कि इन संस्थाओं का स्वार्थ केवल जम्मू तक सीमित नहीं है, बल्कि वे किसी बड़े लक्ष्य पर निगाहें जमाए हैं. वे भारत सरकार और उसकी धर्मनिरपेक्ष नीतियों से इतनी ज्यादा घृणा करते हैं और इसे नुकसान पहुंचाने के लिए वह इस हद तक जा रहे हैं कि जम्मू और कश्मीर राज्य से भारत के रिश्ते खराब कर रहे हैं. आप जानते ही हैं कि कुछ महीने पहले लंबी बातचीत के बाद हम जम्मू और कश्मीर सरकार के साथ एक समझौते पर पहुंचे थे और इस समझौते को संसद में मान्यता दे दी थी. इस विरोध प्रदर्शन का मकसद उस समझौते को नुकसान पहुंचाना है. यह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों दृष्टिकोण से बुरा है. जम्मू प्रांत से यह कहना कि वह भारत के साथ और सघन संबंध रखें. यह जम्मू और कश्मीर राज्य का विघटन शुरू करने वाली बात है. इसके साथ बहुत से बुरे परिणाम आएंगे, बल्कि हो सकता है जम्मू प्रांत खुद ही खंडित हो जाए. इससे कश्मीर घाटी में हमारी स्थिति बुरी तरह से खराब होगी, बल्कि अगर विघटन जारी रहा तो घाटी में हमारी शायद ही कोई स्थिति बचे. जम्मू के विरोध प्रदर्शन ने घाटी में हमारी स्थिति खराब कर दी है.

अगर सिर्फ जम्मू या कश्मीर पर इसका असर छोड़ दें तो भी यह आंदोलन बुरी तरह सांप्रदायिक है और पूरे देश में हमारी नीति के खिलाफ है. अगर हम किसी भी रूप में इसके सामने घुटने टेकते हैं तो इसका मतलब होगा कि हम अपनी अखिल भारतीय नीति से पूरी तरह पलट गए. इसलिए जब तक भारत की मौजूदा सरकार काम कर रही है, यह नहीं हो सकता. दुर्भाग्य की बात यह है कि बहुत से लोग इन परिणामों को नहीं समझते हैं. यह सही है कि बहुत से मामलों में जम्मू और कश्मीर राज्य को देश के दूसरे राज्यों की तुलना में समझौते के माध्यम से ज्यादा स्वायत्तता हासिल है, लेकिन यह कुछ विशेष ऐतिहासिक, राजनीतिक और अंतर्राष्ट्रीय कारकों के कारण है, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, भले ही हम यह नजर अंदाज करने की कितनी भी कोशिश करें. जम्मू और कश्मीर का भारत के साथ घनिष्ठ संबंध बनाना जोर जबरदस्ती या इस तरह के विरोध प्रदर्शनों से नहीं हो सकता. यह विरोध प्रदर्शन भी एक तरह की जबरदस्ती है. कश्मीर का भारत से बेहतर जुड़ाव अन्य बहुत से तरीकों से हो सकता है. यह तरीके कानूनी और संवैधानिक तरीकों से अलग होंगे. यह काम एक दूसरे पर भरोसा करके हासिल किया जा सकता है, लेकिन इसी बड़ी भावना को यह विरोध प्रदर्शन हिला कर रख देगा.

पुस्तक : नेहरू मिथक और सत्य

लेखक : पीयूष बबेले

प्रकाशक : संवाद प्रकाशन मेरठ

मूल्य 300 रुपये

प्रकाशन पहला संस्करण जनवरी 2019, रिप्रिंट संस्करण फरवरी 2019

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