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बीजेपी सरकार का महाघोटाला: कोर्ट से गड़करी और खट्टर के जमानती वारंट जारी

वरिष्ठ IAS अशोक खेमका की नोटिंग से खट्टर फंसे मुश्किल में

  • सर्वदमन सांगवान/ गुरूग्राम

इसे आप भारत के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला कह सकते हैं। इस महाघोटाले में कितनी बड़ी रकम डकारी जा चुकी है, इसका अनुमान लगा पाना लगभग नामुमकिन ही है। आप अपनी सोच की रकम के आगे एक के बाद एक जीरो लगाते चले जाएं, फिर भी घोटाले की सही रकम की थाह नहीं पा सकेंगे। शर्मनाक बात यह है कि खुद को देश और प्रदेश की संपत्ति के रक्षक और सतर्क चौकीदार घोषित करने वाले लोग या तो इस घोटाले में सीधे संलिप्त हैं या फिर पूरी जानकारी होने के बावजूद इस घोटाले पर पर्दा डालने के दोषी हैं। दोनों ही परिस्थितियों में ये लोग देश के संविधान, कानून और देश की करोड़ों करोड़ जनता के विश्वास को छलने के अपराधी तो हैं ही।

देश के इतिहास के इस सबसे बड़े घोटाले में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, PMO यानि प्रधानमंत्री कार्यालय, केंद्रीय परिवहन मंत्री नीतिन गड़करी, हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, हरियाणा के परिवहन मंत्री कृष्ण पंवार, केंद्र व दिल्ली सरकार के दर्जन भर बड़े बड़े आईएएस अफसर, हरियाणा के ट्रांसपोर्ट विभाग के कई बड़े अधिकारियों तथा अनेकों कारपोरेट घरानों के सीईओ (CEO) की भूमिका बेहद संदेहास्पद है।

मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस घोटाले के संबंध में कोर्ट में मुकदमा चलाए जाने की इजाजत मिल चुकी है और गुरूग्राम की सैशन अदालत में दो मुकदमे शुरू हो चुके हैं। पहला मुकदमा “मुकेश सोनी कुल्थिया बनाम नीतिन गड़करी एंड अदर्स” है, जबकि दूसरे मुकदमे का नाम “मुकेश सोनी कुल्थिया बनाम मनोहर लाल खट्टर एंड अदर्स” है। इन दोनों मुकदमों में कुल 28 लोगों को आरोपी बनाया गया है, जिनमें प्रधानमंत्री कार्यालय से ले कर ARPGI (एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्मज एंड पब्लिक ग्रिवेंसिज ऑफ इंडिया) कार्यालय, हरियाणा के मुख्यमंत्री का कार्यालय, हरियाणा के परिवहन मंत्री कृष्ण पंवार, ट्रांसपोर्ट विभाग हरियाणा, दर्जनों आईएएस व प्रशासनिक अधिकारियों, गुरूग्राम के पुलिस कमीश्नर, गुरूग्राम के सेक्टर- 9 के पुलिस स्टेशन और गुरूग्राम नार्थ के सब डिविजनल मजिस्ट्रेट (SDM) के ऑफिस भी शामिल हैं।

मुकेश सोनी कुलथिया

अदालत में इन सभी आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा-120बी (आर्थिक लाभ के लिए धोखा देने की नीयत से साजिश रचना, 10 वर्ष की कैद व आर्थिक दंड का प्रावधान), धारा 166 (पब्लिक सर्वेंट द्वारा कानून की उन्लघना करना, एक वर्ष की कैद व जुर्माना का प्रावधान ), धारा 336 (दूसरों की जिंदगी की सुरक्षा को खतरे में डालना, एक वर्ष तक की कैद व जुर्माना), धारा 406 (अपने फायदे के लिए लोगों के विश्वास को ठेस पहुंचाना, तीन वर्ष तक की कैद व जुर्माने का प्रावधान), धारा 409 (लोक सेवक द्वारा विश्वास का आपराधिक हनन, 10 वर्ष तक की कैद व जुर्माना ), धारा 420 (छलकपट पूर्ण व्यवहार द्वारा बेईमानी से बहुमूल्य वस्तु देने के लिए प्रेरित करना (7 वर्ष का कठोर कारावास व जुर्माने का प्रावधान), धारा 471 (चालबाजी से तैयार फर्जी दस्तावेज या अभिलेख का असली की तरह प्रयोग करना, 10 साल का कारावास व आर्थिक दंड का प्रावधान) तथा प्रीवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट की धारा 13 (1) के तहत आरोपी बनाया गया है।

गुरूग्राम के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश अश्विनी कुमार मेहत्ता की अदालत में चल रहे इन दोनों केसों में साढ़े तीन सौ पृष्ठ की शिकायत में भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के गंभीर आरोप लगाए गये हैं और आरोपों के पक्ष में बड़ी तादाद मेे सबूत भी लगाए गए हैं। आरोपों और सबूतों का अवलोकन करने के बाद ही अदालत ने सभी आरोपियों को समन जारी कर अदालत में हाजिर होने का हुक्म जारी किया है। अदालत की तरफ से बार बार समन भेज जाने के बाद भी जब कई आरोपी अदालत में पेश नहीं हुए तो अदालत को उनके जमानती वारंट जारी करने का निर्णय लेना पड़ा है। प्रधानमंत्री कार्यालय अभी भी कोर्ट में हाजिर नहीं हुआ है, जबकि कोर्ट के समन की तामील हो चुकी है। इसी तरह हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर भी समन मिल जाने के बाद भी कोर्ट में पेश होने से बच रहे हैं। यह एक तरह से कोर्ट की तौहीन है। कोर्ट अब उन सभी आरोपियों के गैर जमानती वारंट जारी कर सकता है जो जमानती वारंट जारी होने के बावजूद भी कोर्ट में हाजिर नहीं हो रहे। कोर्ट ने आज सोमवार को चार लोगों के गैर जमानती वारंट जारी किये हैं, जबकि चार अन्य आरोपियों के बैलेबल वारंट जारी कर सभी को अगली सुनवाई पर यानि 20 अप्रैल को कोर्ट में हाजिर होने का हुक्म दिया है।

इनके अलावा सौ से अधिक प्राइवेट पार्टीज (कारपोरेट कंपनियों) को भी केस में गवाह के तौर पर पेश होने के लिए समन दिए गए हैं । ज्यादातर कारपोरेट कंपनियां समन तामील होने के बाद कोर्ट में अपनी हाजिरी लगवा चुकी हैं। ट्रांसपोर्ट विभाग के कर्मचारी भी अपनी हाजिरी लगवा चुके हैं। कोर्ट में पेश किए गए तथ्यों, दस्तावेजों व सबूतों की ट्रांसपोर्ट विभाग के अधिकारी व कर्मचारी पुष्टि कर चुके हैं।

वैसे पूरे घोटाले का विवरण देने के लिए एक फुल साइज के अखबार के 16 पृष्ठ भी कम पड़ेंगे, लेकिन संक्षिप्त लब्बो-लुआब यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर एसडीएम कार्यालय के साधारण क्लर्क तक हर कोई इस घोटाले में शामिल है। कोर्ट में दाखिल शिकायत में आरोप लगाया गया है कि परिवहन विभाग के अधिकारी व कर्मचारी पिछले तीन साल से जनता को अंधेरे में रख कर लगातार दोनों हाथों से लूटने में लगे हुए हैं और सरकारी खजाने को सीधा नुक्सान पहुंचा रहे हैं। आरोप यह है कि एक एक्टीवा से लेकर करोड़ें रूपये की लक्जरी गाड़ियों और भारी भरकम वाहनों की खरीद फरोख्त में उपभोक्ताओं से वास्तविक कीमत के मुकाबले 65 फीसदी अधिक कीमत वसूली जा रही है और बेचारे उपभोक्ता अज्ञानता के कारण अपनी जेबें खाली करा रहे हैं। लूट का यह पैसा वाहन निर्माता कंपनियों, उनके डीलर्स, कारपोरेट घरानों, लालची नेताओं और भ्रष्ट अफसरों व कर्मचारियों की गिरह में जा रहा है। इसके अलावा ऐसे सबूत भी मिले हैं कि ये सब लोग माफिया की तरह सरकारी टैक्स की भी खुलेआम चोरी कर रहे हैं। वाहनों की बिक्री पर लगने वाले 10 फीसदी के रजिस्ट्रेशन टैक्स में भारी घपले के सबूत हाथ लगे हैं। उदाहरण के लिए मर्सीडीज गाड़ी 30 लाख रूपये में भी मिलती है, 60 लाख में भी और 90 लाख रूपये में भी। यदि किसी ने 90 लाख रूपये की मर्सीडीज गाड़ी खरीदी तो उस पर 10 फीसदी टैक्स के हिसाब से उपभोक्ता से नौ लाख रूपये का टैक्स वसूला जाएगा। उपभोक्ता से नौ लाख रूपये ले लिये जाते है, लेकिन सरकारी खजाने में गाड़ी की कीमत 30 लाख रूपये दिखा कर 10 फीसदी टैक्स के हिसाब से महज तीन लाख रूपये ही जमा कराए जा रहे हैं और छह लाख रूपये का सरकार को चूना लगा दिया जाता है।

गौरतलब है कि इस तरह की घपलेबाजी देश के लगभग सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी जारी है। केंद्र शासित सात राज्य सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और परिवहन मंत्री नीतिन गड़करी के अंतर्गत हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय, परिवहन मंत्रालय को इस घपले की शिकायतें सबूतों के साथ कई दफा की गईं, लेकिन किसी ने भी इस बारे में लेशमात्र भी कार्रवाई नहीं की। कोर्ट ने इस अनदेखी को एक तरह से इन अधिकारियों की संलिप्ता के तौर पर लिया है और इसके लिए इन्हें कोर्ट में हाजिर होने का हुक्म देने का फैसला किया है।

आलम यह है कि उपभोक्ताओं के साथ वाहन के टैम्परेरी रजिस्ट्रेशन के नाम पर भी खुली लूट चल रही है। सुपीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश हैं कि किसी भी वाहन से टैम्परेरी रजिस्ट्रेशन का शुल्क 200₹ से ज्यादा नहीं लिया जाना चाहिये, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की धज्जियां उड़ा कर हर वाहन क्रेता से टेम्परेरी रजिस्ट्रेशन के नाम पर प्रति वाहन 500 से 1500₹ की अवैध वसूली की जा रही है। इस लूट खसोट के सबूत भी कोर्ट में लगाए गए हैं। जब कोर्ट ने कारपोरेट कंपनियों के प्रतिनिधियों से इस अवैध वसूली के बारे में पूछा और वसूली के संबंध में सरकारी आदेश दिखाने को कहा तो वे आदेश दिखा पाने मेे असफल रहे। इसी तरह जब परिहन विभाग और एसडीएम कार्यालयों के अधिकारियों व कर्मचारियों से टैक्स के इनवायस के मुताबिक सरकारी खजाने में जमा हुई रकम का रिकार्ड दिखाने को कहा गया तो वे रिकार्ड दिखा पाने में नाकाम रहे। परिवहन विभाग की तरफ से पेश हुए अधिकारियों ने यह कह कर अपना पीछा छुड़ाने की कोशिश की कि संबंधित रिकार्ड जल कर राख हो चुका है। लेकिन जब कोर्ट ने जले हुए दस्तावेजों की सूची देने और आगजनी की एफआईआर पेश करने की हिदायत जारी की तो परिवहन अधिकारियों ने कोर्ट में 2014 में हुई आगजनी की एफआईआर पेश कर दी जबकि उनसे रिकार्ड 2016-17, 2017-18 और 2018-19 का मांगा गया था। जब कोर्ट ने परिवहन अधिकारियों को लताड़ लगाई तो परिवहन अधिकारियों व एसडीएम कार्यालय ने अगली तारीख पर रिकार्ड पेश करने का आश्वासन देकर पीछा छुड़ाया। लेकिन अगली तारीखों पर रिकार्ड पेश करने की बजाए संबंधित रिकार्ड कीपर ने बीमार हो जाने की सूचना कोर्ट को भिजवा दी। परिवहन विभाग के अधिकारियों व एसडीएम कार्यालय के कर्मचारियों के लिए यह मामला सांप के मुंह में छछूंदर की तरह फंस गया है, जिसे न निगलते बन रहा है और न ही उगलते। यदि रिकार्ड पेश किया तो सारी पोल पट्टी खुल कर सामने आ जाएगी, नहीं किया तो कोर्ट का डंडा सिर पर पड़े ही पड़े। देखना यह है कि सिर पर खड़ी इस आफत से ये लोग कैसे बचेंगे?

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर किस तरह कारपोरेट कंपनियों के दबाव में काम कर रहे हैं, इसके भी पुख्ता सबूत हाथ लगे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने तीन साल पहले केंद्र सरकार और देश के सभी राज्यों को निर्देश जारी किए थे कि मोटर व्हीकल एक्ट के प्रावधानों की धज्जियां उड़ा कर निर्मित हुए तमाम भारवाहक वाहनों को फौरन बंद किया जाए। मोटर वहीकल एक्ट में सभी वाहनों के लिए स्पैसेफिक लंबाई-चौड़ाई व ऊंचाई रखने की हिदायत होने के बावजूद वाहन निर्माता कंपनियां मनमाने तरीके से ये ओवरसाइज की गाड़ियां बनाती आ रहीं हैं। ओवरसाइज होने की वजह से वाहन ओवरलोड हो जाते हैं, ड्राइवर का वाहन पर कंट्रोल नहीं रहता, ओवरसाइज वाहन का चालक वाहन के पीछे की स्थिति को नहीं देख पाता, सड़कों पर क्षमता से अधिक बोझ पड़ने से सड़कें जल्दी जवाब दे जाती है, इससे पब्लिक को परेशानी झेलनी पड़ती है, वाहनों की लंबाई अधिक होने के कारण पीछे वाले वाहन के ड्राइवर सामने से आ रहे वाहन को नहीं देख पाते और अक्सर ओवरटेक करते समय दुर्धटनाग्रस्त हो जाते हैं तथा लोगों की जिंदगियां खतरे में पड़ती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ऐसे वाहनों को फौरन जब्त कर लिया जाना चाहिये, लेकिन केंद्रीय परिवहन मंत्री नीतिन गड़करी और हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और मोटर व्हीकल एक्ट को ताक पर रखते हुए ऐसे वाहनों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। हरियाणा के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अशोक खेमका की एक चिट्ठी मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के लिए गले में हड्डी की तरह फंस गई है। यह चिट्ठी सबूत के तौर पर कोर्ट में लगाई गई है। यह चिट्ठी तीन साल पहले की तब की है, जब खेमका परिवहन विभाग के सैक्रेटरी होते थे। उन दिनों सरकार ने ओवरसाइज के वाहनों को बंद करने का हुक्म दिया था, लेकिन सात प्रमुख कारपोरेट कंपनियों के सीईओज की मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्रर के साथ चंडीगढ़ में हुई खास मुलाकात के बाद मुख्यमंत्री ने ओवरसाइज वाहनों को बंद करने के अपनी ही सरकार के फैसले को एक साल के लिए स्थगित कर दिया था और इन वाहनों को सड़कों पर चलने देने की इजाजत दे दी थी। जब मुख्यमंत्री का यह आदेश राज्य के चीफ सैक्रेटरी की मार्फत तामील होने के लिए परिवहन विभाग के तत्कालीन सैक्रेटरी अशोक खेमका के पास पहुंचा तो उन्होंने इस पत्र पर कड़ा नोट लिख डाला कि मुख्यमंत्री का आदेश पालन करने के योग्य नहीं है, क्योंकि यह भारत के संविधान की भावना, मोटर वहीकल एक्ट के प्रावधानों तथा सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों के पूरी तरह खिलाफ है। अशोक खेमका ने यह भी लिखा कि मुख्यमंत्री ने कारपोरेट कंपनियों के सीईओज से मुलाकात होने के बाद यह फैसला लिया है, जिससे साफ है कि फैसला जनहित में नहीं बल्कि कारपोरेट कंपनियों के हित में लिया गया है। पाठक जानते हैं कि खेमका का यह नोट मुख्यमंत्री को इतना नागवार गुजरा था कि उन्होंने खेमका को फौरन ही परिवहन विभाग से चलता कर एक मामूली विभाग में खुड्डेलाइन लगा दिया था।

मजेदार तथ्य यह है कि मुख्यमंत्री का एक साल के लिए लिया गया उपरोक्त फैसला एक वर्ष की अवधि गुजर जाने के बाद भी पिछले तीन साल से बदस्तूर चल रहा है और कारपोरेट कंपनियों के कर्ताधर्त्ता मुख्यमंत्री से पूरी तरह खुश हैं। मुख्यमंत्री भी इन कंपनियों को डिस्टर्ब करने के बिल्कुल भी मूड में नहीं है। कंपनियों की मनमानी बदस्तूर जारी है और सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश फाइलों की भीड़ में धूल खा रहे हैं। मोटर वहीकल एक्ट की भी अब किसी को परवाह नहीं है और न ही संविधान में दी गई लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी का ही किसी को अहसास है।

सबसे अहम सवाल यह है कि देश के संविधान की रक्षा की शपथ लेने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय परिवहन मंत्री नीतिन गड़करी, हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर तथा हरियाणा के परिवहन मंत्री कृष्ण लाल पंवार आदि कोर्ट से समन मिलने और बैलेबल वारंट जारी होने के बावजूद कोर्ट में पेश नहीं हो रहे, जिससे साबित होता है कि इन लोगों की निगाहों में देश की न्याय पालिका के प्रति दो कौड़ी की भी इज्जत नहीं है। अगर देश को चलाने वाले लोग ही संविधान के तहत स्थापित अदालतों की तौहीन करेंगे तो देश की आम जनता की निगाह में अदालतों के प्रति कहां से सम्मान बचेगा?

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