लोकवाणी

मुख़्तलिफ़ आवाज़, निगाह और विचार

इतिहास

हिटलर-मुसोलिनी की दोस्ती की कहानी: इतिहास ने दो तानाशाहों की दोस्ती कुछ ऐसे दर्ज की

नितिन ठाकुर

आइए आज आपको दो ऐसे दोस्तों की छोटी सी कहानी सुनाता हूं जो इतिहास में दर्ज हो चुकी है। दोनों ही अपने देश में लोकप्रियता का चरम पाकर लोकतंत्र को भूल गए थे। दोनों ही ने अपने देश के पुराने गौरव को लौटा लाने का जनता से वादा किया था। दोनों मन ही मन एक-दूसरे को तुच्छ समझते थे लेकिन सावर्जनिक तौर पर दोस्ती का ज़ोरदार प्रदर्शन करते हुए अपने-अपने देश में एक-दूसरे का भव्य स्वागत करते थे। इनमें एक का नाम था हिटलर और दूसरा था मुसोलिनी। पहले वाला जर्मनी का तानाशाह था और दूसरे ने इटली पर कब्ज़ा जमाया था। ये बात स्पष्ट है कि दोनों में हिटलर ज़्यादा चर्चित है लेकिन तथ्य ये है कि खुद हिटलर मुसोलिनी को प्रेरणास्रोत माना करता था, भले ही बाद में उसके विचार कुछ बदले भी हों। अब इस कहानी को पढ़ें और पढ़ते हुए आसपास घट रही घटनाओं पर भी नज़र रखते चलें।

मुसोलिनी ने फासीवाद को जन्म दिया था जो एक अतिराष्ट्रवादी विचारधारा थी जिसके मुताबिक एक देश में एक दल और उसके एक नेता का शासन ही बेहतर है। हिंसा को इस विचारधारा में बुरा नहीं माना जाता।

खैर, मुसोलिनी 1922 में अपने देश इटली का प्रधानमंत्री बन गया था। मुसोलिनी के करीब तीस हज़ार समर्थकों ने देश की राजधानी को घेर लिया था जिसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इस्तीफा दे दिया और राजा ने लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखने के लिए उसे सरकार बनाने का न्यौता दिया। उस वक्त हिटलर की राजनैतिक नाज़ी पार्टी घुटनों पर चलना बंद करके पांवों पर खड़ा होना सीख रही थी। इस घटना ने हिटलर को बेहद प्रभावित किया। एक तरफ तो वो मुसोलिनी का लोहा मान गया और दूसरी तरफ फासीवादियों के तरीके ने उसे प्रेरित किया कि वो भी ऐसा ही कुछ करके सत्ता पा ले। हालांकि दस साल बाद हिटलर सत्ता पा भी गया लेकिन उसने मुसोलिनी के रास्ते से चांसलरशिप नहीं पाई। उसने मुसोलिनी से भी ज़्यादा साज़िशें रचीं। इतिहासकारों ने इटली के फासीवाद को जर्मनी के नाज़ीवाद का बड़ा भाई बताया है।

शुरू-शुरू में मुसोलिनी अपने सामने हिटलर को कुछ खास समझता नहीं था। हालांकि हिटलर के दल को खड़ा करने में उसने आर्थिक सहायता ज़रूर दी क्योंकि नफरत पर टिके उनके सिद्धांत फासीवादियों की नीति से मिलते-जुलते थे। मुसोलिनी के देश इटली का अपना एक शानदार इतिहास था। वो उसे लौटा लाना चाहता था। देश के स्वर्णिम काल को लौटाने की बात हिटलर भी करता था लेकिन मुसोलिनी अकेले में उस पर हंसता था और उपेक्षापूर्ण बातें करता था। मुसोलिनी ने जिस तरह सत्ता पाई थी वो उसे हिटलर के सत्ता पाने के तरीके से बेहतर और शानदार मानता था। उसे इटली का इतिहास अधिक चमकीला भी लगता था। वो नाज़ियों की आर्य वाली थ्योरी की भी खिल्ली उड़ाता था क्योंकि उसके लिए रोमन अधिक महान थे। गनीमत है कि तब ट्विटर वगैरह नहीं था वरना हो सकता है कि मुसोलिनी कभी-कभार खुलकर ट्वीट करके हिटलर की कुछ आलोचना भी कर दिया करता, मगर मजबूरी बड़ी चीज़ है। उसी चीज़ ने मुसोलिनी को मजबूर किया। दुनिया के सामने उसे हिटलर का हाथ पकड़कर उसे दोस्त कहना पड़ता था, भले ही अंदर से वो उसके प्रति वैरभाव रखता था। यहां तक कि मुसोलिनी खुद हिटलर की उस आत्मकथा को बोरिंग मानता था जिसे नाज़ी जर्मनी में बाइबिल का दर्जा दे दिया गया था। इसी के आधार पर उसने हिटलर के विचारों को उज्जड़ और साधारण माना था।

दोनों नेताओं के बीच जून 1934 को पहली मुलाकात इटली के वेनिस में संपन्न हुई। उस बैठक में गज़ब का बंटाधार हुआ था। खुद को ज़रूरत से ज़्यादा ज्ञानी समझने वाले मुसोलिनी ने हिटलर से बात करने के लिए जर्मन बोलनी शुरू की। उसने अनुवादक लेने से मना कर दिया। उधर हिटलर खुद तो ऑस्ट्रिया में पैदा हुआ था तो उसी लहज़े में जर्मन बोलता था। मुसोलिनी की समझ में आधी से ज़्यादा चीज़ें आई ही नहीं। बेवजह रौब गालिब करने के चक्कर में वो फंस गया। दूसरी तरफ हिटलर का घमंड भी आसमान से कम ऊंचा नहीं था। उसे अपनी हर बात बढ़ा-चढ़ाकर बताने की आदत थी और यहां तो उसका रोल मॉडल बैठा था जो उस दौर में नाज़ी पार्टी का बड़ा मददगार भी था। हिटलर की आदत थी कि वो सामने वाले को बोलने नहीं देता था। अकेला ही लंबी-लंबी बात करता था। कहा जाता है कि मुसोलिनी बुरी तरह बोर होकर बैठक से निकला। इस बैठक के बाद दोनों ही एक-दूसरे को अपने से नीचा मानने लगे। हालांकि पब्लिकली दोनों को साथ दिखना था क्योंकि कूटनीतिक विवशता थी।

इसके बाद इटली ने जब 1935 में अबीसीनिया (आज इथियोपिया) पर धावा बोला और दुनिया में बेइज़्ज़त हुआ तब हिटलर ने उसका साथ दिया। तब की दुनिया में संयुक्त राष्ट्र संघ नहीं था, उसकी जगह लीग ऑफ नेशंस था। जर्मनी को हिटलर ने 1933 में ही इससे बाहर निकाल लिया था। स्पेनिश सिविल वॉर में भी दोनों दोस्तों की खूब छनी। आखिरकार 1937 का सितंबर आया (संयोग से वही चल रहा है) और मुसोलिनी ने जर्मनी का शानदार दौरा किया। हिटलर पूरा बिछ ही गया। अपने देश की ताकत दिखाकर अपने से बड़े लोकतंत्र के दुश्मन को खुश कर दिया। मुसोलिनी इतना प्रभावित हुआ भी कि जापान-जर्मनी के उस पाले में शामिल हो गया जिसे आने वाले दिनों में विश्वयुद्ध हारकर बर्बाद होना था। यहां तक कि उसने इटैलियन यहूदियों को सरकारी नौकरियों और नागरिकता से निकाल फेंकने का आदेश तक जारी कर दिया ताकि उसका यहूदी विरोधी दोस्त हिटलर खुश हो सके। आप गूगल कीजिए और पाएंगे कि ऐसा ही ज़ोरदार स्वागत मुसोलिनी ने अपने देश में हिटलर का किया था जब सड़कें स्वस्तिक से भर गई थीं।

मई 1939 में दोनों ने मिलकर एक ऐसी संधि साइन की जिसके तहत आनेवाले दस सालों में वो एक-दूसरे को जंग में फंसे होने पर सेना और पैसा मुहैया कराने को तैयार हो गए। हालांकि सितंबर में हिटलर ने मुसोलिनी की परवाह किए बिना पोलैंड पर हमला कर दिया तो मुसोलिनी ने अपने देश की हालत देखकर युद्ध की घोषणा से साफ इनकार कर दिया। जब तक वो संभलकर मैदान में कूदा उसकी सेनाएं उत्तरी अफ्रीका में बुरी तरह हार गईं जहां वो ब्रिटिश और फ्रेंच कॉलोनियों पर कब्ज़ा करना चाहता था और इसीलिए युद्ध में कूदा था। 1943 में तो इटली ने ही घुटने टिका दिए और अप्रैल 1945 में उसे इतालवियों ने ही उसकी पत्नी और सहयोगियों समेत मारकर चौराहे पर टांग दिया था। कई दिन तक लोग उसकी लाश पर पत्थर फेंकते रहे और थूकते रहे जिस पर मैंने कुछ साल पहले पोस्ट लिखा था। दो दिन बाद उसका दुलारा हिटलर भी एक अंडरग्राउंड बंकर में अपनी पत्नी समेत खुद को गोली मारकर मर गया। पत्नी से उसने कुछ ही घंटों पहले शादी की थी।

बहरहाल, इतिहासकार रे मोसेले की एक बात लिखकर इस दोस्ती वाली पोस्ट का अंत कर रहा हूं। उन्होंने लिखा था कि उनका रिश्ता वक्त बीतने के साथ विकसित हुआ। पहलेपहल हिटलर मुसोलिनी का सम्मान करता था और वाकई अपने से वरिष्ठ तानाशाह को इज्जत देता था। बाद में जब हिटलर विश्वयुद्ध में नेता के तौर पर उभरा तो उन दोनों की बैठक में हिटलर अकेले ही लंबी-लंबी बातें करता रहता जिसमें मुसोलिनी बमुश्किल कुछ कह पाता। 1942 की एक यादगार बैठक में हिटलर अकेला ही एक घंटा चालीस मिनट बोलता रहा और इस दौरान उसका जनरल ऊंघता रह जबकि मुसोलिनी घड़ी देखता रहा।
बताइए भला कैसी-कैसी दोस्ती हुआ करती हैं, जाने ये दोस्ती हैं भी या नहीं।

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *