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लाल झंडा लिए मेरी कविताएं मेरे विरुद्ध हड़ताल पर बैठी हैं संसद मार्ग पर

कविताओं की हड़ताल

मेरी कविताएं हड़ताल पर हैं 
मैंने उनसे अपील की
पर वे नहीं मानी

मैंने कहा चुनाव प्रचार में शामिल करूंगा 
कविता ने कहा -तू ठग है 
कवि नहीं

मैंने कहा -पाठ्यक्रम में शामिल करवाऊंगा 
उसने कहा – मुझे मौत मंजूर है

मेरी कविताएं संसद मार्ग पर बैठी हैं 
लाल झंडा लिए 
मेरे विरुद्ध

यह बर्फ के पिघलने का वक्त है

सर्दी सिकुड़ रही है
और हमारी अभिव्यक्ति जमने लगी हैं
जैसे हमारी ज़ुबान पर कोई भारी वस्तु रख दी गई हो
कीचड़ से चिपक गई हों जैसे 
आंखों की पलकें

बाज से लड़ती चिड़िया की कहानी 
अब हम नहीं सुनाते अपने बच्चों को 
विज्ञान के प्रवेश परीक्षा से पहले बच्चों को मंदिर ले जा रही हैं माएं
हमने मां को भी तो गाय बना दिया है
कंप्यूटर का छात्र शिवलिंग पर दूध उड़ेल आया है सोमवार सुबह
हिंदी साहित्य की एक शोधार्थी सोलह सोमवार के निर्जला उपवास के बाद 
अब किसी संतोषी माता की खुशी के लिए 
कुछ बच्चों को गुड़ चना खिला रही है 
एक गाय प्लास्टिक चबाती हुई दिल्ली की भीड़ भरी सड़क के बीच खड़ी होकर रंभा रही है 
हममें से किसी ने उसे नहीं बताया कि
अखलाक, जुनैद जैसे अनेक युवाओं की 
हत्या कर दी गई है उसके नाम पर 
हत्यारों ने खुद को गौ रक्षक बताया है 
और हत्या को वध कहा है
इसी तरह गांधी की हत्या कर उसे वध कहा था इनके पूर्वजों ने 
और अब वे गांधी के पुतले को भी गोली मार रहे हैं

खून से रंगे हाथों की सफाई के लिए
पैर भी धोए गए ताकि
तस्वीर में कैद हो जाएं उसकी निर्मलता 
डिजिटल युग में तस्वीर ही तो बोलती है

विश्वविद्यालयों में छात्र लाठी खा रहे हैं 
मैं राजा के सांड की तलाश में सड़क पर भटक रहा हूं 
इस बीच हरामी ने बनारस उजाड़ दिया।
यह बर्फ के पिघलने का वक्त है।

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