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यौन उत्पीड़न पर चर्चा, लेकिन महिला पैनलिस्ट बुलाना भूल गए ऐंकर!

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगे हैं। इस मामले में मुख्य न्यायधीश छुट्टी वाले दिन अपने ऊपर लगे यौन शोषण के आरोपों के लिए बेंच गठित करते हैं और खुद भी इस बेंच में शामिल हो जाते हैं। निष्कर्ष निकलकर आता है- न्यायपालिका खतरे में है। पूरे मामले की कवरेज से महिला का मुद्दा गायब है, महिला का पक्ष रखता कोई नज़र नहीं आता। मुख्य न्यायधीश को कोई गुनहेगार कह भी नहीं रहा है जब तक पूरे मामले की जांच नहीं हो जाती (अगर जांच होती है तो)।

इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर मीडिया ने चुप्पी साधे रखी। कुछ बेवसाइट्स और चैनलों ने ऊपरी तौर पर इस खबर को दिखाया। वहीं, कुछ बेवसाइट्स ने ज़रूर इसे एक महत्वपूर्ण खबर की तरह पेश किया। इसी बीच कल रात मैं TV9 भारतवर्ष पर इसी मुद्दे पर हुई एक प्राइम टाइम डिबेट देख रही थी। प्राइम टाइम के ऐंकर अजीत अंजुम थे और चर्चा के लिए योगेंद्र यादव, जस्टिस एस.एन ढींगरा, जस्टिस सीबी पांडे, जस्टिस पवित्र सिंह और जस्टिस एस आर सिंह को बुलाया गया था। अफसोस की यौन उत्पीड़न पर हुई इस चर्चा में एक भी महिला पैनलिस्ट मौजूद नहीं थी। इस बात से इनकार नहीं है कि जिस मुद्दे पर पूरी मीडिया चुप्पी साधे बैठा रहा उसे TV9 ने अपने प्राइम टाइम डिबेट का मुद्दा बनाया, कम से कम इस पर चर्चा भी की। लेकिन अगर TV9 ने इस चर्चा की जिम्मेदारी उठाई और उसमें कोई कमी दिखी तो क्या उसकी आलोचना नहीं की जाएगी।

यह एक तथ्य है कि TV9 की इस चर्चा में एक भी महिला न्यायाधीश, कानूनी विशेषज्ञ या सामाजिक कार्यकर्ता नहीं शामिल थी। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि भारत की राजधानी में इस मुद्दे पर राय रखने वाली महिलाओं की कमी होगी। यह भी एक तथ्य है कि हमारे मीडिया में महिलाओं की संख्या कितनी है, उनकी भागीदारी कितनी या कितनी महिलाएं संपादक हैं। सिर्फ इस मुद्दे पर ही नहीं बाकी मुद्दों पर भी कितनी बार हमें महिला पैनलिस्टों की मौजूदगी देखने को मिलती है।

दूसरा तथ्य यह भी है कि शो की शुरुआत में ऐंकर अजित अंजुम इस मुख्य न्यायधीश पर आरोप लगाने वाली महिला का पक्ष नहीं रखा। पैनल में मौजूद जस्टिस ढींगरा के हस्तक्षेप के बाद अजित अंजुम ने अपनी गलती सुधारी।

यह मीडिया की मर्दवादी मानसिकता ही है जिसने मेरी इस आलोचना पर मुझे यह याद दिलाया कि कम से कम जो मुद्दा उठा रहा है उसे तो मत घेरो। अलग-अलग चैनल तो अलग-अलग मुद्दे उठाते रहते हैं लेकिन बतौर पत्रकार हमारा ध्यान इस पर होता है कि चैनल मुद्दों को किस तरह से उठा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर अगर जी न्यूज जेएनयू का कोई मुद्दा उठाता है और उसे आदतनुसार देशद्गोहियों के अड्डे के रूप में प्रस्तुत करता है तो क्या उसकी आलोचना सिर्फ इसलिए नहीं होगी कि उसने मुद्दे को कम से कम उठाया। इस दौर में जहां मीडिया कहीं न कहीं किसी खास पार्टी की ओर झुका नज़र आता है वहां निष्पक्ष पत्रकारिता का दावा करने वालों की क्या आलोचना नहीं होगी। मीडिया के खेमों में उनके चहेते पत्रकारों की आलोचना करने पर एक महिला को याद दिलाया जाता है कि अरे चुप रहो, कम से कम वह तुम्हारे मुद्दे तो उठा रहा है। किसी पर व्यक्तिगत टिप्पणी करना अलग है पर बात जहां कॉन्टेंट की होगा वहां तो रवीश की भी आलोचना जायज़ है। मीटू के वक्त भी कई प्रगतिशीत पत्रकारों ने उलाहने दिए थे कि आपने सिर्फ एक पक्ष देखा और वही जब आज मैं कह रही हूं कि आपने सिर्फ एक पक्ष रखा तो मुझे सलाह दी रही है कि अरे शुक्रिया अदा करो तुम मुद्दा उठाने वाले का।

इस मर्दवादी मीडिया का एक ही सूत्र है- Divided by ideologies United by patriarchy.

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