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क्या भारतीय होने का मतलब यह है कि मुझे पाकिस्तानियों से नफरत करनी चाहिए?

मैं अपने घर से बहुत दूर थी जब पुलवामा में सीआरपीएफ (केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल) के काफिले पर आत्मघाती हमले की खबर आई. मेरे इस घटना के समझ पाने तक दो दिन बीत चुके थे. मेरे स्मार्टफोन पर नेटवर्क कनेक्शन बहुत खराब था, और मैं अपने सोशल मीडिया पर आने वाली सूचनाएं नहीं देख पा कर रही थीं, जो आमतौर पर मेरे लिए खबरों का पहला स्रोत है. मित्रों से प्राप्त हुए कुछ संदेशों को जब मैं समझ नहीं पा रही थी तब मैने इस पूरे हादसे के बारे में कुछ खबरें पढ़ीं. तब तक देश के विभिन्न हिस्सों में कश्मीरी छात्रों, दुकानदारों और परिवारों को चिन्हित कर उनपर हमले शुरू हो गए थे.
मेरे व्हाट्सएप ग्रुप में उन लोगों के लिए सूचनाओं और राहत के प्रयासों के लिए लगातार संदेशों का आदान-प्रदान हो रहा था, जो असुरक्षित थे. मैं असमंजस में थी कि कश्मीरी मुसलमानों को संभावित खतरों से बचाने के लिए दिल्ली के उपनगर में अपने घर की पेशकश करना सुरक्षित है या नहीं, क्योंकि मैं खुद वहां नहीं थी.

नवंबर 1984 में मैं एक स्कूली बच्ची थी, जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हमारे चारों ओर दिल्ली को आग में झोंका जा रहा था. हिंसक भीड़ ने सिखों के घरों, कॉलोनियों, ट्रेनों और टैक्सी स्टैंड पर हमले कर दिए थे. उस समय हिंसा भड़काकर देश भर के हजारों निर्दोष नागरिकों को जिंदा जला दिया गया था.
एक दशक से भी कम समय के बाद, मैं जामिया मिलिया इस्लामिया में, एजेके मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर की कैंटीन में खड़ी थी, जब हमें खबर मिली कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहा दी गई है. परिसर को संभावित हिंसा से बचाने के लिए हमारे कॉलेज के गेट अंदर से बंद कर दिए गए. हमें बाहर से बंदूकों और झड़पों की आवाजें आ रही थीं, इन आवाजों के बीच हम देर शाम तक घर नहीं जा सके.

मेरे जहन में आज भी उस खौफ़ और दुःख की यादें तैर रही हैं जिनकी मैं उस समय भुगतभोगी थी. उस रात शहर की अंधियारी सी की रोशनी और अराजकता से घिरे हुए मैं अकेले बस में सफर कर घर पहुँची थी. यह कैसे हो सकता था? पत्थर और चूने से निर्मित एक मध्ययुगीन मस्जिद को भरे दिन के उजाले में तब तक कैसे ध्वस्त किया जा सकता था जब तक उसकी रक्षा करने वाले सभी लोग जानबूझकर अपनी भूमिका नहीं निभाते? बाबरी मस्जिद गिरने के बाद, मुंबई और देश के अन्य हिस्सों में दंगे हुए थे. जिंदगियां तहस-नहस हुईं और निर्दोष लोगों को फिर से आतंक में रहने के लिए झोंक दिया गया था.

कुछ साल बाद ही मैंने अपनी सहयोगी शिखा त्रिवेदी के साथ एक वीडियो पत्रकार के रूप में श्रीनगर की यात्रा की. हम उन माताओं से मिले जिनके बेटे सुरक्षा बलों द्वारा उठाए गए थे और वर्षों से गायब थे. परिवार में अकेली बची माताएँ इस उम्मीद में थीं कि उनका बेटा शायद घर लौट आए. एक महिला जो हमारी बातचीत के दौरान चुप रही लेकिन जब बातचीत में उनके बेटे की शारीरिक यातनाओं का जिक्र हुआ तो फिर अचानक बिखर गईं. बेटे के जख्मों का दर्द उस मां के अपने शरीर में उभर आया था.

अब मैं बच्चों की मां हूं जो इस समय उतनी ही उम्र के हैं जितनी उम्र में मैंने पहली बार अपने आसपास सांप्रदायिक हिंसा का भयावह रूप देखा था. मैं उनसे यह खबर कैसे बताऊं? यदि वे निराशा हुए, तो मैं इसे सहन नहीं कर सकती. यदि वे प्रतिक्रिया नहीं करते हैं, तो मुझे चिंता होगी कि उनके जहन में क्या चल रहा है.
आतंकी हमले से 40 सुरक्षाकर्मियों की मौत के बारे में जानना बेहद दुःखद अहसास है. पूरे भारत में कश्मीरी मुसलमानों के खिलाफ हिंसा का आह्वान करने वाले नागरिक समाज की प्रतिक्रिया के बारे में कोई कैसे बोलता है? ये कौन लोग हैं जो कट्टरता और पूर्वाग्रह को उभारते हैं, वह भी त्रासदी के समय में? हम उनके साथ बड़े हुए, हम उनके साथ काम करते हैं, हम उनके साथ फेसबुक मित्र हैं. हम त्योहार मनाते हैं और उनके साथ पारिवारिक समारोह में शरीक होते हैं.

हमें इस विभाजनकारी उन्माद का सामना करते हुए अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा का समर्थन करने वालों को बाहर निकालना चाहिए. हमें शांति चाहने वालों की ताकत से नफरत को बेअसर करने के तरीके खोजने होंगे. हम असहाय नहीं देख सकते हैं क्योंकि आवामी चर्चाओं को नफऱती नारों और गुंडागर्दी ने कब्ज़ा लिया है. भविष्य में क्या होने वाला है, हमें उसकी जिम्मेदारी लेनी होगी.

पिछले हफ्ते मैं हर्ष मंदर की नई किताब, पार्टीशन ऑफ द हार्ट के विमोचन पर एक चर्चा में शामिल थी. मेरे बाईं ओर बैठे, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. अपूर्वानंद ने कहा था कि हमें स्वीकार करना चाहिए कि हम वास्तव में निराशा के दौर में जी रहे हैं. उन्होंने कहा कि इस बात से इनकार करने का कोई मतलब नहीं है कि सांप्रदायिक घृणा ने सभ्य समाज को कितनी गहराई से प्रभावित किया है. उन्होंने हिंदोस्तानी जबान में कहा,
“आप और मेरे जैसे भारत में हिंदू समुदाय से ताल्लुक रखने वाले लोगों को खूनी जाल में फंसाकर भ्रमित किया गया है कि भारत को एक हिंदू प्रमुख राज्य बनना चाहिए.”

उनके इन शब्दों को सुनकर मैं सहम गई. हम सभी वास्तविकता से निपटने के लिए अलग-अलग शब्दों का उपयोग करते हैं जब यह हमें अभिभूत करता है.

जब मैं 15 साल की थी, तो मैंने सबसे पहले यह सोचना शुरू किया कि मेरे लिए भारतीय होना क्यों जरूरी है? मैं ऐसी पहचान को क्यों स्वीकार करूं जो इंसानों के मनमाने ढंग से खींची गई सीमाओं से परिभाषित होती है? एक पहचान जो जन्मजात दुर्घटनावश हासिल हुई है?

यदि भारतीय होने का मतलब है कि मुझे पाकिस्तानियों से नफरत करनी चाहिए, तो यह एक ऐसा पैमाना है जिसे मैं स्वीकार नहीं करूंगी. आम पाकिस्तानियों और भारतीयों के बीच कोई अंतर नहीं है, न तो हममें से कोई आतंकवादी है और न ही आतंकवाद का हमदर्द है. हम दोनों विभाजनकारी राजनीति के शिकार हैं, दोनों युद्ध और सीमा पार आतंकवाद से अनावश्यक रूप से पीड़ित होंगे.
राष्ट्रीय त्रासदी के इस समय कितने शिक्षित भारतीय ठीक से व्यवहार कर रहे हैं. हम भारतीय होकर दूसरे भारतीयों के साथ एकजुटता नहीं दिखा सकते तो क्या यही भारतीयता है.

अगर हम जीवन की अहमियत और मूल्यों को नहीं जोड़ पाते तो किसी राष्ट्र या समुदाय से संबंधित होने का क्या मतलब रह जाता है? मैं अपने जीवन में संभावनाओं को सिकोड़ने वाली पहचान को नहीं मानती. ऐसी पहचान मुझे छोटा और बंद, शातिर और हिंसक बनाने की कोशिश करती है.

पहचान पोषण और सुरक्षा के लिए होती है, न कि नफरती मानसिकता बढ़ाने के लिए. सिर्फ इसलिए कि मैं उन लोगों के प्रति सुरक्षात्मक महसूस करती हूं जो मेरे समुदाय का हिस्सा हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि मैं अन्य समुदायों के लोगों को नुकसान पहुंचाना चाहती हूं.

एक अभिभावक के रूप में, मैं अपने बच्चों को इस बात की वास्तविकता से नहीं बचा सकती कि हमारे आसपास की दुनिया में क्या हो रहा है. एक वयस्क के रूप में, मैं निराशा के बीच भी नहीं घिरी रह सकती. भारतीय होने का मतलब मेरे लिए केवल एक चीज है. इसका अर्थ है इंसान होना और साथी मनुष्यों के हितों के प्रति निष्ठावान बने रहने के लिए जो कुछ भी हो सके वह करना.

(यह लेख अंग्रेज़ी में लाइव मिंट वेबसाइट पर प्रकाशित हो चुका है।

(नताशा बधवार एक फिल्म-निर्माता और “My Daughters’ Mum and Immortal For A Moment” पुस्तकों की लेखिका हैं.)

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