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कला एवं साहित्य

सुरजन: सफर 1947 शेखुपुरा से करनाल

                     इतिहास हमें जहां जीवन में एक अच्छा और मजबूत बनाने की शिक्षा देता है, वही ये भी सिखाता है कि हम कोई ऐसी गलती ना दुबारा ना दोहराएं जो हमारे, हमारे समाज या हमारे देश के लिये मुसीबतों का कारण बने। ये उपन्यास इतिहास में रुचि रखने वालों के लिये तो है ही, वही ये भारत के सब जनमानस के लिये है, वो चाहे पंजाब के विस्थापित के वंशज हो, या मध्य भारत या दक्षिण भारत के नागरिक। ये उपन्यास आपको समझने में मदद करेगा कि 1947 में एक धर्मिक उन्माद से हुए बटवारें से उठी आग से हर धर्म, हर जाति, हर वर्ग का नागरिक झुलसा। आप यह भी समझ सकेंगे जब इस तरह के धर्मिक उन्माद में भाई भाई का सगा नहीं रहता तब कुछ ऐसे भी होते हैं जो धर्म को एक तरफ रख इंसानियत को जिंदा रखते हैं। ये सब उन पाठकों के लिये है जो इतिहास से सीख लें अपने देश और अपने समाज को मजबूत देखना चाहते हैं।
इस किताब को समझने के लिये किताब में से एक अंश हाजिर है :–

 सुरजन 

               नाजर सिंह अपनी दुनाली गन में कारतूस डाल लिए और कुछ कारतूस एक कपड़े की झोली सी बना कमर में बांध लिए हजारा सिंह ने घोड़ी की लगाम नाजर सिंह को पकड़ाते हुए कहा
  “पा अपना ख्याल रखी 
 नाजर सिंह ने घोड़ी पर चढ़ते हुए कहा
 “अब जल्दी चलो और सबका ख्याल रखी
  ये कहते ही नाजर सिंह ने घोड़ी दौड़ा दी. काफिला बड़ा था मगर घुड़सवार बन्दूकों वाले मुश्किल से 5, 6 थे जो घोड़ी दौड़ा दौड़ा कर काफिले को चलाने की कोशिश कर रहे थे. 

    नाजर सिंह की तीन लड़कियां और दो बेटे थे. लड़कियों और एक बड़े बेटे करतार सिंह की शादी हो चुकी थी. छोटा बेटा अर्जन सुरजन से साल कु ही छोटा था. सुरजन का चाचा  मुख्तार सिंह सिरे का वैली बन्दा था. उसकी कोई औलाद नहीं थी और चाची को अक्सर पिटता रहता था. उसकी दूसरे भाइयों से नहीं बनती थी. चाची पिछले एक साल से मायके में रह रही थी. घर लाने के लिये कई बार पंचायत भी हो चुकी थी. मगर कोई नतीजा नहीं निकला. चाचा मुख्तार कई बार कई दिनों तक घर से गायब रहता. अपने बदमाश साथियों के साथ अय्याशी करता फिरता और अभी भी पिछले 15 दिन से गायब था उसका कोई आता पता नहीं था.

  एक बैलगाड़ी में घर की औरते सवार हो गईं जिसमें सुरजन की माँ, ताई, बहन सुखवंत, करतार की बहू थी. उसको अब सुरजन चला रहा था और साथ मे तलवार लिये हाजरा सिंह और गंडासी लिये करतार चल रहा रहा था. दूसरी बैलगाड़ी को अर्जन चला रहा जिसमे थोड़ा बहुत खाने का सामना और कुछ कपड़े बर्तन थे.

   काफिला चलाने लगा एक पीछे एक बैलगाड़ी कुछ पैदल लेकिन कम्प बड़ा था तो कुछ लोग एक लाइन में नही आ पर रहे थे. सुरजन और अर्जन अपनी अपनी बैलगाड़ी चला रहे थे. बदूंक धारी घोड़ों पर एक सिरे से दूसरे सिरे पर जा रहे थे और चलते रहने को बोल रहे थे. एक घुड़सवार एक सिरे से चलता और दूसरा दूसरे सिरे से अंधेरे की वजह से शक्लें नहीं दिखती थी.

   अभी काफिला मुश्किल से घण्टा चला होगा रफ्तार बेहद धीमी थी. अभी पड़ोस के गाँव के खेतों के कच्चे रास्ते से ही गुजर रहे थे तभी दाहिने तरफ कुछ मशालों के साथ शोर सुनाई दिया हमलावर जत्था समझ चुका था. कैम्प अब उठ गया था और अब वो ज्यादा नुकसान नहीं कर सकता था. वो तकरीबन काफिले के आध की तरफ अल्ला हु अकबर के नारे लगाते हुए भागे आ रहे थे. तभी नाजर सिंह ने घुड़सवार बंदूकधारी को आवाज लगाई.

  “जवानों फैसले की घड़ी आ गई है. कोई बच के न जाए जिस तरफ से आवाजें आ रही है फायर करो.
   आगे से जोर आवाज आई
 “बोले सो निहाल एक साथ कई स्वर गूंजे
“सत श्री अकाल. फिर गोलियों की आवाज आई शरू हो गई अंधेरे में आवाज के चिंगारिया निकलती ही दिख रही थी. एक आम दुनाली गन ज्यादा वक्त तक फायर नहीं कर सकती. 5, 6 फायर करने के बाद उसे ठंडा करने के लिये रुकना पड़ता नहीं तो कारतूस जाम हो जाते हैं. काफिले की तरफ से एक गन की आवाज अलग थी और काफी ज्यादा भी शायद कोई पक्की राइफल थी जो लगातार चल रही थी बाकी कभी रुक रही थीं कोई चल रही थीं.

   आगे से भी गोलियों की आवाज आ रही थीं. काफिले में चीख पुकार मची हुई थी. अंधेरे में कुछ समझ नहीं आ रहा था. काफिला साथ साथ चलने की कोशिश कर रहा था. शोर से बैल बिदक रहे थे. तभी अर्जन का एक बैल लेट गया शायद उसको कहीं से गोली लगी थी. करतार ने एक पल न गवातें हुए अर्जन को बोला
 “अर्जन गढे से उतर और इस गढ़े पर आ
  अर्जन एक ही छलांग में गजब की फुर्ती से उतरा और सुरजन के पास आ पहुचा  करतार फिर बोला 
  “सुरजन गढे अर्जन को देकर नीचे आ जा और गढे में एक मोटा लाठी नुमा डंडा पड़ा है, उठाकर पिछली तरफ आ जा
   तभी हजारा सिंह बोला
“ओये अर्जन कुछ भी हो जाए तू गढ़ मत रोकना बस चलते रहना” 
 
  यह किताब अमेजन पर उपलब्ध है.
Surjan : Sfar 1947 Shkupura se Karnal  https://www.amazon.in/dp/938219729X/ref=cm_sw_r_apa_i_Z.2-CbSP5SZE4

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