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राजनीति रिपोर्ट

कुर्मी (पटेल) समुदाय के मतदाताओं का मोदीकरण

सुशील मानव

बड़े राजनीतिक दल पहले चुनावी गठबंधन करके किस तरह अपना चुनावी हित साधते हैं और फिर छोटे राजनीतिक दलों को मतदाता समुदाय पर आधिपत्य कर लेते हैं इसकी बानगी उत्तरप्रदेश में देखने को मिलती है। कुर्मी (पटेल) मतदाता जो पिछले एक दशक से अपनादल का परंपरागत वोटर था वो भाजपा की ओर शिफ्ट हो गया है।

राष्ट्रवादी उभार और राजनीतिक अपसंस्कृतिकरण ने किस तरह उनकी जातीय चेतना और अस्मिताबोध का क्षरण किया है। उत्तर प्रदेश में कुर्मी समुदाय पिछड़े वर्ग में आता है। सबसे मेहनतकश तबका और शांत रहने वाले कुर्मी समुदाय में पिछले पांच साल में हद दर्जे तक आक्रामकता और उन्माद आ गया है, विषेषकर युवा पीढ़ी में। मोदी के सत्ता में आने के बाद कुर्मी समुदाय की युवा पीढ़ी गले में भगवा गमछा डालकर घूमता है।

ना दल और कुर्मी मतदाता
बता दें कि उत्तरप्रदेश न सिर्फ सर्वाधिक लोकसभा सीटों (80 सीट) के चलते राजनैतिक नजरिए से सबसे महत्वपूर्ण राज्य है बल्कि देश की राजनीति को सर्वाधिक प्रभावित करने वाला भी। उत्तरप्रदेश में सर्वाधिक जाति आधारित छोटी-बड़ी पार्टियाँ हैं। जाति आधारित छोटी राजनीतिक पार्टियां अपनी जातिगत वोटबैंक के चलते हमेशा ही बड़ी पार्टियों से राजनीतिक बारगेनिंग करके उन्हें सपोर्ट करती आई हैं। यूपी में ऐसी ही एक राजनीतिक पार्टी है अपना दल।

अपना दल के संयोजक थे डॉ सोनेलाल पटेल। उनके निधन के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में अपना दल ने भाजपा के साथ गठबंधन करके एनडीए घटक के तौर पर मोदी सरकार में शामिल हुई थी।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के समय ही अपना दल में भी पारिवारिक कलह फूटी और पार्टी दोफाड़ हो गई। सोने लाल पटेल की बड़ी बेटी अनुप्रिया पटेल ने अपना दल (एस) बनाया और उनकी पत्नी कृष्णा पटेल ने अपनादल (कृष्णा) बनाया। केंद्र और यूपी की सरकार में शामिल अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल ने हाल ही में एनडीए से मनमुटाव बढ़ा था। लेकिन फिर समझौता हो गया। जबकि अपना दल (कृष्णा) ने कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया है। सोनेलाल पटेल फूलपुर सीट से पहले भी चुनाव लड़ चुके हैं। चर्चा है कि कृष्णा पटेल फूलपुर संसदीय सीट से चुनाव लड़ेंगी।

ऐसे में हमने फूलपुर संसदीय सीट से ताल्लुक़ रखनेवाले कुर्मी समुदाय के युवा, अधेड़ और बुजुर्ग लोगों से बात करके उनकी प्रतिक्रियाएं ली।
पटेल युवओं में नहीं है अस्मिताबोध।

प्रदीप, सोनू, रंजीत

प्रदीप पटेल की उम्र 29 वर्ष है और उन्होंने साफ्टवेयर हार्डवेयर का डिप्लोमा कोर्स किया है। लेकिन वो बेरोज़गार हैं। इस चुनाव में कौन कृष्णा या अनुप्रिया के सवाल पर प्रदीप कहते हैं कृष्णा को वो वोट करेंगे जो मूर्ख होंगे या फिर बुड्ढे। मैंने उनसे पूछा कि गर अनुप्रिया भाजपा से अलग हो गई तो किसे वोट करोगे। और फिर संदीप बिना एक भी सेकेंड का समय लिए कहते हैं बेशक़ मोदी को वोट करेंगे हम। मोदी जैसा महान नेता इस देश में नहीं हुआ है।

रन्जीत पटेल की उम्र 25 वर्ष है और वो पेशे से ड्राईवर हैं। वो कहते हैं हम अनुप्रिया को नहीं मोदी को सपोर्ट कर रहे हैं। रंजीत कहते हैं मोदी के अलावा और कोई पाकिस्तान को घुसकर मारने का काम नहीं कर सकता था।

19 वर्षीय सोनू पटेल का नाम मतदाता सूची में पहली बार आया है। वो बताते हैं कि मोदी को वोट करने को लेकर मैं बहुत उत्तेजित और रोमांचित हूँ उन्हें वोट करने का ख्याल ही प्राउड फील देता है।

24 वर्षीय आलोक पटेल बेरोजगार हैं। सीजन में वो अपनी ही बिरादरी के महाजन का ट्रैक्टर चलाकर जुताई, मड़ाई का काम कर लेते हैं बाकी समय बैठकी रहती है। वो कहते हैं कि मोदी के होने से लगता है हम भी कुछ हैं।

यादव खुद को पटेलों से श्रेष्ठ समझते हैं
जय प्रकाश पटेल की उम्र 36 वर्ष है। और वो कहते हैं हम पहले भी भाजपा को वोट देते रहे हैं और इस चुनाव में भी हम भाजपा को वोट देंगे। जब मैं जयप्रकाश से कहता हूँ कि लेकिन भाजपा तो पिछड़ा वर्ग विरोधी है, ये उनके शाससनकाल में कई बार देखने के मिला है। क्या बेहतर नहीं होता कि पिछड़ी समुदाय की सारी राजनीतिक पार्टियां एकसाथ आतीं? इसके जवाब में जयप्रकाश का जातीय दर्द छलक पड़ता है वो कहते हैं यादव खुद को हमसे श्रेष्ठ समझते हैं। वो बात-बेबात जताते हैं कि भगवान कृष्ण यादव थे और वो उनके वंशज हैं इसलिए कुर्मियों से श्रेष्ठ हैं। जबकि कृष्ण यादव नहीं थे बस उनका लालन-पालन यादवों के घर में हुआ था।

जब सोने लाल पटेल जिंदा थे तो उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में वो समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ना चाहते थे। उन्होंने मुलायम सिंह के सामने 50 सीटों की मांग की थी लेकिन समाजवादी पार्टी ने उनकी मांग ठुकरा दिया था। 403 सीटों में से गर 50 सीट अपना दल को दे देते तो क्या हो जाता लेकिन नहीं उनमें तो श्रेष्ठता का अहंकार था।

कुर्मी समुदाय की लड़कियां और औरतें मोदी की दीवानी हैं
कुर्मी समुदाय की औरतों में मोदी के प्रति हद दर्जे तक दीवानगी है। अमूमन राजनीतिक बहसों से दूर रहनेवाली औरतें अब बैठती हैं तो मोदी की बात करती हैं। कई औरतें बताती हैं कि इलाहाबाद क्षेत्र में जब भी कभी मोदी की रैली होती है तो वो रैली में शामिल होने ज़रूर जाती हैं। हालांकि इसके लिए उन्हें दिहाड़ी भी मिलती है और दरवाजें तक बस लेने और वापिस छोड़ने आती है।

सुग्गी और सीता

सीता देवी कहती हैं आज बच्चा बच्चा मोदी को जानता है। वो बताती हैं कि मोदी ने उन्हें गैस कनेक्शन दिया है। शौंचालय दिया है।
नीलम पटेल छात्रा हैं वो कहती हैं- “इस देश में तो सब चोर हैं, इसलिए मेरा वोट चौकीदार को।”

मोदी के आने से मुसलमानों की हालत खराब हुई है
पचास पार के रामचंद्र पटेल सीमांत किसान हैं और फैक्ट्रियों में मजदूरी करते हैं। वो कहते हैं मोदी के आने के बाद से कटुओं (मुसलामानों) की हालत खराब हुई है वर्ना कांग्रेस और सपा राज में तो ये इतने मनबढ़ हो गए थे कि कहीं न कहीं उत्पात मचाते ही रहते थे। इनकी जनसंख्या भी लगातार बढ़ रही है। मोदी के आने से इस पर भी लगाम लगेगी।

सत्य नारायण पटेल

सत्य नारायण पटेल की उम्र 36 वर्ष है वो कई वर्षों से लगातार बेरोजगारी की मार झेलने के बाद 80 हजार रुपए एजेंट को देकर वर्ष 2015 में कतर चले गए थे और कतर से पिछले साल अपने वतन लौटे हैं। मैं पूछता हूँ कि आपके लिए क्या कुछ बदला है इस देश में? क्या आपको अब आसानी से काम मिल जाता है। जवाब में वो कहते हैं नहीं। सत्य नारायण बताते हैं कि कुंभ मेले में उन्हें एक महीने का काम मिला था। लेकिन उसमें भी बढ़ा हुआ पेमेंट नहीं मिला। सत्य नारायण पटेल बताते हैं कि मेरा वोट तो मोदी का जाएगा। क्यों? जवाब में वो कहते हैं मेरी बिरादरी के सब मोदी को वोट दे रहे हैं, हर तरफ मोदी की चर्चा है इसलिए मेरा भी वोट मोदी को।

बेनी बहादुर पटेल

बेनी बहादुर पटेल की उम्र 75 वर्ष है और वो लाठी के सहारे ही चलते फिरते हैं। वो मोदी सपोर्टर हैं। मोदी की आलोचना करने वाले किसी भी सख्श से वो लड़ जाते हैं।

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