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आप देश की त्रासदी के वक़्त बस अपनी ड्यूटी ही निभा लें तो इससे बड़ी देशभक्ति नहीं हो सकती

लेखक : सर्वप्रिया सांगवान

एक न्यूज़ चैनल पर मेरे रिपोर्टर दोस्त ने CRPF के जवान से बात की जो पाकिस्तान हाई कमीशन के दफ़्तर के बाहर सुरक्षा के लिए खड़े थे. विडंबना यही थी कि पाकिस्तान की साज़िशों ने उनके साथियों की जान ली और उन्हें पाकिस्तान के अधिकारियों की सुरक्षा करनी पड़ रही थी.

रिपोर्टर के पूछने पर जवान ने कहा कि ‘ग़ुस्सा हमें भी आता है, दुःख भी होता है लेकिन सर, देश की ड्यूटी सबसे ऊपर है..ज़िम्मेदारी ऊपर है..आपने रंगीन कपड़े पहने हैं..हमने तो वर्दी पहनी हुई है ना.’

ऐसी घड़ी में ऐसा सोचना और ऐसी बात कहना यहाँ बड़ी-बड़ी ज़िम्मेदारी के पदों पर बैठे लोगों के बस की बात भी नहीं. क्या हुआ जो हमने वर्दी नहीं पहनी लेकिन क्या देश की ज़िम्मेदारी हर नागरिक के कंधे पर नहीं है? लेकिन कितने ही लोग इस तरह देश के लोगों को भड़काने में लगे हैं जैसे वो ऐसी त्रासदी का इंतज़ार ही कर रहे थे. ये कहाँ की देशभक्ति है कि लोकल अख़बारों में फ़ोटो के लिए अपने ही देश की प्रॉपर्टी जला दें, अपने ही लोगों को पीटने लगें. अपने ही लोगों का सोशल मीडिया पर जीना हराम करने लगें कि आपका दुःख पर्याप्त नहीं दिख रहा फ़ेसबुक पर.

जो लोग ऐसा कर रहे हैं, वो सिर्फ़ बरसाती मेंढक हैं और इनकी टर्र टर्र टीवी और सोशल मीडिया पर बारिश देख कर शुरू होती है. पिछले काफ़ी वक़्त से हमारे जवान 2-3 की संख्या में मारे जा रहे हैं, आत्महत्या कर रहे हैं. देश के लिए काम करते मज़दूर खदान में फँस जाते हैं और उन्हें हफ़्तों तक निकाला नहीं जाता है. देश की गन्दगी साफ़ करते लोग सीवर में घुट कर मर जाते हैं. क्या आप तब भी उनके परिवारों के लिए ऐसे ही शोक मना रहे थे जैसे अब सभी की पोस्ट पर जाकर देशभक्ति सिखा रहे हैं, मातम करना सिखा रहे हैं? मैं ज़रूर हर बार आपकी पोस्ट पर आकर सवाल करूँगी कि आप पर्याप्त शोक कर रहे हैं कि नहीं. ये सिलेक्टिव संवेदना से काम नहीं चलेगा. रोना तो आपको तब भी चाहिए जब भीड़ किसी बेक़सूर को सरे राह मार दे.

एक तो ये हमारे पत्रकार लोग हैं जो परमाणु युद्ध तक को विकल्प बता रहे हैं. बताना तो ये चाहिए कि सबसे पहले देश की राजधानी ही ख़तरे में होगी और आप लोगों के न्यूज़रूम और घर-परिवार भी. ये युद्ध कुछ दिन का नहीं होता, इसके परिणाम लोग सदियों तक झेलते हैं, अपाहिज बच्चे पैदा होते हैं. इस युद्ध में कोई नहीं जीतता.

देखिए, ना हम सेना हैं, ना सरकार हैं और ना इंटेलिजेन्स. बहुत से लोगों में तो दसवीं कक्षा के लायक जानकारी और समझ भी नहीं है जो ज्ञान दे रहे हैं. इसलिए जिनका काम है उन्हें करने दें. सोशल मीडिया जानकारी का पहला स्त्रोत नहीं हो सकता है. पहले जाकर संसद की standing committee की रिपोर्ट पढ़िए जो आर्मी के हालात पर लिखी गयी है. राज्यसभा, लोकसभा में आर्मी, CRPF पर पूछे गए सवालों के जवाब पढ़िए. क्यों आर्मी से संबंधित CAG रिपोर्ट website पर लगवाना बंद किया गया, इस पर सोचिए और 2017 तक की रिपोर्ट पढ़ डालिए. अगर बस की नहीं है तो भजन कीजिए.

आप देश की त्रासदी के वक़्त बस अपनी ड्यूटी ही निभा लें तो इससे बड़ी देशभक्ति नहीं हो सकती.

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