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साफ नहीं है आम चुनाव के बाद की तस्वीर

चंद्र प्रकाश झा

सत्रहवीं लोक सभा चुनाव के सातवें एवं अंतिम चरण में सात राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश की 59 सीटों के लिए रविवार 19 मई को वोटिंग समाप्त होते ही सदन के कुल 543 निर्वाचन क्षेत्रों में से दो को छोड़ सभी की एकसाथ 23 मई को निर्धारित मतगणना की तैयारियां शुरू हो जायेंगीं।

वोटिंग समाप्त होते ही विभिन्न पोल्स्टर एजेंसियों और खबरिया टीवी चैनलों के गठजोड़ के एग्जिट पोल एवं विश्लेषण का सिलसिला भी शुरू हो जाएगा। निर्वाचन आयोग द्वारा वास्तविक मतगणना 23 मई को शुरू होगी और उसी देर शाम या रात तक सभी सीटों के अधिकृत परिणाम मिल जाने की संभावना है। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) से डाले गए मतों में से कुछ का वोटर्स वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपेट) मशीन से निकाली पर्चियों से मिलान करने की नई व्यवस्था के कारण मतगणना में देरी भी हो सकती है।

लोक सभा के साथ ही चार राज्यों – आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, सिक्किम और अरुणांचल प्रदेश की विधान सभा के भी नए चुनाव कराये गए। सिक्किम विधान सभा का मौजूदा कार्यकाल 27 मई, अरुणांचल प्रदेश विधान सभा का एक जून, उड़ीसा विधान सभा का 11 जून और आंध्र प्रदेश विधान सभा का मौजूदा कार्यकाल 8 जून को समाप्त होगा।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने सुरक्षा कारणों से जम्मू -कश्मीर विधान सभा के नए चुनाव के कार्यक्रम की घोषणा नहीं की, जो अभी भंग है। जम्मू और कश्मीर की 6 लोकसभा सीटों के लिए चुनाव पांच चरणों में हुए। इस आम चुनाव में 11 अप्रैल से 19 मई तक सात चरणों में 29 राज्यों और सात केंद्र शासित प्रदेशों में फैले कुल 543 निर्वाचन क्षेत्रों में करीब 65 प्रतिशत ने 10 लाख पोलिंग स्‍टेशन पर वोट डाले। दो निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान रद्द कर दिए गए, जहां बाद में नए सिरे से चुनाव होंगे। इनमें से एक तमिलनाडू की वेल्लूर सीट है। इस चुनाव में 18-19 वर्ष के करीब 1.5 करोड़ नए वोटर थे।

अंतिम चरण में उत्तर प्रदेश की 80 में से शेष सभी 13 सीटों, पश्चिम बंगाल की 42 में से शेष सभी 9, बिहार की 40 में से शेष सभी 8, मध्य प्रदेश की 29 में से शेष सभी आठ, पंजाब की सभी 13, हिमाचल प्रदेश की सभी चार, झारखंड की 14 में से शेष तीन और चंडीगढ़ की एकमात्र सीट के लिए वोटिंग है।

इन सीटों में उत्तर प्रदेश की वाराणसी भी शामिल है जहां से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार दूसरी बार भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी है। अन्य प्रमुख प्रत्याशियों में केंद्रीय विधी मंत्री रविशंकर प्रसाद और फिल्म अभिनेता शत्रुघन सिन्हा तथा केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा शामिल हैं। बिहार के पटना साहिब में रविशंकर प्रसाद का मुकाबला करीब तीन दशक तक भाजपा में रहने के बाद हाल में कांग्रेस में आये और वहाँ से भाजपा के दो बार सांसद रहे शत्रुघन सिन्हा से है। पूर्वी उत्तर प्रदेश की गाजीपुर सीट पर 1999 में जीते रेल एवं संचार राज्य मंत्री मनोज सिन्हा का मुकाबला इस बार समाजवादी पार्टी-बहुजन समाज पार्टी-राष्ट्रीय लोक दल के उम्मीदवार अफजाल अंसारी से है जो वहा 2004 में सपा प्रत्याशी के रूप में जीते थे।

देश के तीन ही राज्य, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार ऐसे हैं जहां मतदान के सातों चरण में अलग-अलग सीटों के लिए वोटिंग कराई जा रही है। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार में सातों चरण में वोटिंग क्यों कराई गई?

प्रश्न यह भी है कि वाराणसी में अंतिम चरण में ही मतदान क्यों है? उत्तर प्रदेश के मामले में त्वरित उत्तर तो यही होना चाहिए कि इस राज्य में सर्वाधिक 80 सीटें हैं, जहां सुरक्षा आदि के आवश्यक प्रबंध करने के वास्ते अन्य राज्यों की तुलना में अधिक समय लग सकता है।

यही बात पश्चिम बंगाल और बिहार के मामले में कही जा सकती है। पश्चिम बंगाल में 42 और बिहार में 40 लोक सभा सीटें हैं। लेकिन महाराष्ट्र में तो 48 लोक सभा सीटें है जहां मतदान चार चरण में ही तय किये गए। तो फिर उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार के मामले में मतदान के चरण पसारने के कोई और कारण भी हो सकते हैं? संभव है कि इसके पीछे कोई राजनीतिक कारण न हो। लेकिन संभव है कि ऐसा ही हो।

2019 के चुनाव के देश के भविष्य की दिशा-दशा तय करने के लिए महत्वपूर्ण साबित होने में कोई संदेह नहीं हैं। इस चुनाव में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाले नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) की 26 मई 2014 से कायम नरेंद्र मोदी सरकार को दूसरी बार राजसत्ता संभालने का जनादेश मिलेगा या नहीं, इस बारे में अभी कुछ भी कहना कयासबाजी होगी। मोदी जी भारत के 14 वें प्रधानमंत्री है और वह इस पद के लिए प्रमुख दावेदार हैं। विपक्षी दलों की तरफ से प्रधानमन्त्री पद के लिए दावेदार की औपचारिक घोषणा चुनाव परिणाम के बाद ही संभव है. वैसे, लोक सभा के 2014 के चुनाव के वक़्त और फिर उसके बाद केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के गठन के उपरांत एनडीए में कुल मिलाकर 43 दल शामिल हो गए थे। इनमें से राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी) समेत करीब एक दर्जन दल एनडीए से बाहर निकल चुके है।

खबरिया टीवी चैनलों, कुछ प्रिंट मीडिया और ख़ास कर सोशल मीडिया में चुनाव परिणामो को लेकर सर्वे आदि क़यासी ख़बरों की बाढ़ सी आ गई है। निर्वाचन आयोग के स्थाई आदेश के अनुसार अंतिम चरण का मतदान खत्म होने तक कोई भी एग्जिट पोल प्रकाशित-प्रसारित नहीं किया जा सकता है।

सियासी और मीडिया के हल्कों में चर्चा है कि इस बार के चुनाव में 2014 में हुए आम चुनाव में नज़र आई ‘मोदी लहर ‘ जैसा कुछ भी नहीं है. मतदाताओं के बीच मोटे तौर पर केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और उसके नेतृत्व वाले नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस के प्रति रोष ही है जो अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में कम या ज्यादा हो सकता है। कयास लग रहे हैं कि इस बार किसी भी पक्ष और उनके मतदान-पूर्व के गठबंधन को नई लोक सभा में स्पष्ट बहुमत मिलना मुश्किल होगा।

ऐसे में नई सरकार के गठन में भाजपा और कांग्रेस के गठबंधन से अभी तक बाहर क्षेत्रीय दलों की अहम् भूमिका हो सकती है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री नारा चंद्रा बाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी, ओडिसा के मुख्यमंत्री बीजू पटनायक का बीजू जनता दल, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के सी आर की तेलंगाना राष्ट्र समिति, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी, उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी और इसी प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव की समाजवादी पार्टी में से कोई भी भाजपा या कांग्रेस के गठबंधन में अभी शामिल नहीं है। चुनाव के बाद इन पार्टियों का राजनीतिक महत्व इस पर निर्भर करेगा कि वे कितनी सीटें जीतती है. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी की अलग ही राय है। उनका कहना है कि अब तक औपचारिक रूप से विपक्षी दलों के गठबंधन का प्रधानमन्त्री चुनाव के बाद ही तय हुआ है, और वही इस बार भी होगा।

जनवरी से अप्रैल तक के 13 सर्वे में इंडिया टीवी -सीएनएक्स, टाइम्स नाउ-वीएमआर और जान की बात को छोड़ सभी ने विखंडित जनादेश की संभावना व्यक्त की है इनमे से जिन तीन के सर्वे में एनडीए को बहुमत मिलने का आंकलन है वे भी ज्यादातर बहुत कम सीटों के अंतर से है।

वैसे इन सर्वे के आंकड़े बहुत भ्रम पैदा करते है। जैसे टाइम्स नाउ वीएमआर के जनवरी के सर्वे में त्रिशंकू लोकसभा की संभावना व्यक्त की गई थी लेकिन उसके अप्रैल के नवीनतम सर्वे में एनडीए को सात सीटों का बहुमत दर्शाया गया है। कुछ और सर्वे में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस को भी बहुमत नहीं मिलने की संभावना व्यक्त करते हुए कहा गया है कि यूपीए को अधिकतम 210 सीटें ही मिल सकती है और भाजपा हर हाल में लोक सभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरेगी। लेकिन भाजपा और कांग्रेस के गठबंधन से बाहर की पार्टियां को कुल मिलाकर कांग्रेस से ज्यादा सीटें मिल सकती हैं। ऐसे में इन क्षेत्रीय दलों में से अधिकतर को साथ लिए बगैर कोई नई सरकार का गठन संभव नहीं होगा। बहरहाल, एक बात तय सी लगती है इस आम चुनाव के बाद देश में किसी एक दल का एकछत्र शासन संभव नहीं होगा और क्षेत्रीय दलों का महत्व बढ़ेगा।

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