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राजनीति रिपोर्ट

न खाऊंगा न खाने दूँगा का नारा झूठा है, असली नारा तो यह है ‘न बताऊंगा न बताने दूँगा’

आप जानते हैं कि कल सुप्रीम कोर्ट के सामने मोदी सरकार के प्रतिनिधि अटॉर्नी जनरल ने क्या कहा? उन्होंने कहा कि ‘मतदाताओं को यह जानने का अधिकार नहीं है कि राजनीतिक दलों के पास कहां से पैसा आ रहा है’.

यानी कि चुनावी बॉन्ड जरिए उद्योगपतियों से जितना मर्जी आए उतना चन्दा ले लो ……..

उन्हें जी भर के देश के संसाधनो को लूटने खसोटने दो, लोन दे देकर बैंकों को डुबो दो, जमाकर्ताओं की बचत की कमाई पर डाका डलवा दो, खदानें पचासों साल की लीज पर दे दो। आदिवासियों के घरों, जंगलों पर कब्जा जमा लो। लेकिन यह मत बताओ कि हमने उस उद्योगपति से कितने रुपये का चन्दा लिया है ताकि हमसे कोई सवाल न पूछ सके।

वीडियोकॉन पर 90 हजार करोड़ का कर्ज है। उसके मालिक वेणुगोपाल धूत ने 2015 में शिवसेना को 85 करोड़ का चन्दा दिया था। लेकिन अब यह बात कभी नही जान पाएँगे।

अब समझिए सुप्रीम कोर्ट के सामने क्या मसला है

एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) ने एक याचिका सुप्रीम कोर्ट के सामने रखी है। ADR का कहना है कि चुनावी बॉन्ड्स जारी करने पर रोक लगे अथवा चंदा देने वालों के नाम सार्वजनिक हों ताकि चुनावी प्रक्रिया में शुचिता बनी रहे.

चुनावी बॉन्ड से मतलब एक ऐसे बॉण्ड से होता है जिसके ऊपर एक करेंसी नोट की तरह उसकी वैल्यू या मूल्य लिखा होता है. यह बॉण्ड; व्यक्तियों, संस्थाओं और संगठनों द्वारा राजनीतिक दलों को पैसा दान करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. 20 हजार से अधिक के राजनीतिक चंदे को बांड के रूप में बदल देने का यह निर्णय मोदीं सरकार ने लिया था।

चुनाव आयोग भी इसका एक पक्ष है। कल चुनाव आयोग सिर्फ नमो टीवी पर नहीं पलटा है। कल उसने सुप्रीम कोर्ट में भी पलटने की कोशिश की है।

जब यह मुकदमा पेश किया गया तब चुनाव आयोग इस चुनावी बॉन्ड के सख्त खिलाफ था, उसने सरकार को लिखे अपने पत्र में चुनावी बॉन्ड को प्रतिगामी कदम करार दिया था. लेकिन अब EC ने सुप्रीम कोर्ट को बता रहा है कि इलेक्टोरल बॉन्ड में कुछ भी गलत नहीं है, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को याद दिलाया कि क्या आयोग अपना रुख बदल रहा है?

फिर भी चुनाव आयोग यह मान रहा है कि यह व्यवस्था तो सही है लेकिन दान दाताओं के नाम सार्वजनिक किए जाने चाहिए क्योंकि लोगों और चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों की फंडिंग के बारे में जानने का अधिकार है।

पर मोदी सरकार पूरी बेशर्मी से अड़ी हुई हैं कि हम दानदाताओं की जानकारी नही देंगे। वह इसे काले धन के खिलाफ कार्यवाही बता रहे हैं जो न्यायालय को भी हास्यास्पद तर्क लग रहा है।

कल सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल से पूछा कि चुनावी बॉन्ड से काले धन पर किस तरह रोक लगाई जा सकती है ‘हम जानना चाहते हैं कि जब कोई बैंक किसी एक्स [x] या वाय [y] के आवेदन पर चुनावी बॉन्ड जारी करता है, तब क्या उसे यह जानकारी होगी कि कौन-सा बॉन्ड x को मिला और कौन-सा y को?’ इस पर अटॉर्नी जनरल ने इनकार किया, जिस पर सीजेआई ने कहा, ‘अगर ऐसा है, तो आपकी काले धन से लड़ने की यह पूरी कवायद बेकार जाएगी.’

इसके बाद जस्टिस संजीव खन्ना ने अटॉर्नी जनरल से सवाल किए. उन्होंने पूछा, ‘आप जिस तरह की केवायसी [KYC] की बात कर रहे हैं, यह सिर्फ खरीददार की पहचान के बारे में है. इससे यह नहीं पता चलता कि वह पैसा काला है या सफेद.’

इलेक्टोरल बॉन्ड योजना की कठोर आलोचना करते हुए पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने कहा कि इलेक्टोरल बॉन्ड ने ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ (सांठ-गांठ वाले पूंजीवाद) को कानूनी और वैध बना दिया है.

उन्होंने कहा कि पहले चुनाव आयोग को ये पता चलता था कि 20,000 रुपये के ऊपर का चंदा किसने और किस पार्टी को दिया है. लेकिन, इलेक्टोरल बॉन्ड की वजह से अब ये जानकारी पूरी नहीं मिलती है.

यह जानकारी पब्लिक डोमेन में भी उपलब्ध रहती थी पर अब यह सम्भव नहीं है. कुरैशी ने कहा कि सरकार द्वारा किए गए वादों के उलट ये कदम पूरी तरह से असंगत है.

बीजेपी शुरू से ही पूंजीपतियों को लाभ पुहचाने के काम मे लगे हुए हैं. हमारे वित्तमंत्री जेटली जी चुनावी बांड के समर्थन के लिए कमल सन्देश पत्रिका में लिखते हैं, ‘श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व वाली पहली एनडीए सरकार के दौरान एक बड़ा कदम उठाया गया था। आयकर अधिनियम को संशोधित किया गया, ताकि उसमें यह प्रावधान जोड़ा जा सके कि राजनैतिक दलों को दिया गया दान खर्च के रूप में माना जाएगा और दानदाता को कर में छूट का लाभ मिलेगा। यदि राजनैतिक पार्टी निर्धारित तरीके से अपने दान का ब्यौरा देगी, तो उसे भी कोई टैक्स नहीं देना होगा।’

साफ है कि शुरू से ही बीजेपी का रुख पूंजीपतियों को बचाने का रहा है आखिर इसका सारा लाभ उसे ही मिलता रहा। 2015-16 में 21 पंजीकृत चुनावी ट्रस्टों में योगदान की 90 फीसदी राशि, भाजपा के पास आई। 2016-17 में भाजपा को प्राप्त दान अन्य पांच राष्ट्रीय दलों को मिले दान का नौ गुना रहा. 2018- 19 की बात की जाए तो आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी से पता चला है कि इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री पिछले साल की तुलना में करीब 62 प्रतिशत बढ़ गई है. साल 2019 में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने 1,700 करोड़ रुपये से अधिक के इलेक्टोरल बॉन्ड बेचे हैं।

साफ है कि असलियत में भाजपा ही राजनीतिक चन्दे की मोटी मलाई काट रही है और इसीलिए वह हर तरह का तर्क सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश कर रही हैं चाहे वह सही हो या गलत।

यकीन मानिए चुनावी बॉन्ड की वर्तमान व्यवस्था स्वतंत्र और पारदर्शी चुनाव की अवधारणा के विपरीत है। आज सुबह सुप्रीम कोर्ट इस पर फैसला देने वाली है, देखते हैं क्या होता है।

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