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रिपोर्ट

पत्रकारिता के नाम पर मुझसे औरतों, विपक्षी दलों और मुसलमानों के खिलाफ़ खूब नफ़रत फैलवाई गई

अनुराग आनंद

सोचा था नहीं लिखूंगा लेकिन ऑपइंडिया में काम करने वाले कुछ दो कौड़ी के दलालों ने लिखने के लिए मजबूर किया।

ऑपइंडिया में मैंने एक महीने कुछ दिन काम किया था। मैंने यहाँ सिर्फ इसलिए ज्वाइन किया था क्योंकि मैं जयपुर दैनिक भास्कर से किसी निजी वजह से नौकरी छोड़ कर आया था तो मैंने यहाँ ज्वाइन कर लिया। नौकरी करने से पहले मुझे बताया गया कि भाजपा समर्थन वाली खबर ही हम सिर्फ लिखेंगे। बाद में साम्प्रदायिक और हिंसक व समाज में नफरत फैलाने वाली खबरों को लिखने का दवाब और अजीबों गरीब भाषा में हैडिंग दिया जाने लगा। जैसे- अरुंधति रॉय के बारे में लिखे लेख का हैडिंग- कह के लूँगा, कह के लूँगा, कह के लूँगा… तेरी कह के लूँगा!

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इस दो कौड़ी के वेबसाइट के लिए लिखित और मौखिक परीक्षा देने के बाद सेलेक्ट हुआ था। पहली बार यहाँ आकर देखा कि लिखने वाले के साथ ही साथ किसी संस्थान ने ट्रोल करने वालों को भी नौकरी दिया है। इनका काम गाली गलौज देना और वेबसाइट पर विरोध में कमेंट करने वालों को ट्रोल करना था।

इसके बाद काम करने के दौरान मैंने महसूस किया कि इस वेबसाइट में एडिटर से लेकर अफवाह फैलाने वालों की पूरी टीम का पत्रकारिता से दूर तक कोई संबंध नहीं है। हाँ एक दो लोगों को छोड़कर।

इसका परिणाम ये हुआ कि हमें मुस्लिमों के द्वारा की गई घटना को खोज खोज कर लिखने के लिए कहा जाने लगा। इन घटनाओं के अभियुक्त को जान बूझकर हेडिंग में लिखने में लिए कहा जाने लगा।

यही नहीं रविश कुमार और शेखर गुप्ता जैसे पत्रकारों के खिलाफ लिखने का दवाब बनाया जाने लगा। इस वेबसाइट को हीट जब कभी कम मिलता, ये पत्रकारों को गरिया कर ट्रैफिक जुटाती थी और आज भी जुटाती है। पत्रकारों के खिलाफ लिखने के लिए तमाम लोगों पर दवाब बनाया जाता था।

यही नहीं भाजपा के समर्थक एडिटर से लेकर इस क्षेत्र में आने वाले नए- नए टाइपराइटर के लिए आपस में मुस्लिमों के लिए मुल्ला शब्द इस्तेमाल करना आम बात थी।

इससे पहले भी भाजपा समर्थन वाली वेबसाइट प्रवक्ता डॉट कॉम में मैंने दो महीने काम किया, मुझे वहां काम करते हुए कभी नहीं लगा कि मैंने समाज में नफरत को मजबूती देने का काम किया। लेकिन ऑपइंडिया में मुझे एक महीना खत्म होते होते खुद से अजीब लगने लगा था। सबसे बुरी बात तो ये थी कि इस वेबसाइट को शुरू होते ही कुछ ट्रोल करने वालों को बहाल किया गया था।

मैंने वहां जब तक काम किया ईमानदारी से करने का प्रयास किया। जब सर से पानी ऊपर निकल गया तो दिल पर हाथ रख कर खुद से पूछा और नौकरी छोड़ दी। नौकरी छोड़ने के बाद मैंने अपने रिज्यूम में ऑप इंडिया का जिक्र कभी नहीं करने का भी फैसला किया।

यह संयोग की बात है कि नौकरी छोड़ने से पहले मुझे ‘कच्चा चिट्ठा’ ने बुलाया इसके बाद भी दो अच्छे जगहों से ऑफर आया। मैंने कम पैसे में ‘कच्चाचिट्ठा’ ज्वाइन की। लेकिन मैं काम को लेकर खुश था। मुझे कोई घुटन महसूस नहीं हुई।

ये बात अलग है कि ऑप इंडिया की तरफ से मुझे नमामि गंगे पर खबर लिखने के लिए सरकारी खर्चे पर काशी और प्रयागराज ले जाया गया। वहां होटल में कैसे खबर लिखना है यह समझाया गया। वापस आकर मैंने जो लिखा उसे एडिटर द्वारा अलग रूप दिया गया। मैं संस्थान में जब तक रहा ईमानदारी से काम किया। बदले में संस्थान ने पैसा देकर कोई उपकार नहीं किया बल्कि यह हमारी मजदूरी थी।

ऑप इंडिया में पैसे लेकर नफरत फैलाने का काम हो रहा है। ग्राउंड रिपोर्ट के नाम पर केबिन में बैठ कर खबर लिखी जाती है। खैर अब ऑप इंडिया से काफी अच्छी सैलरी और सुविधा वाली कंपनी से ऑफर है।

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