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आटा मिल की पर्ची थी क्या जो राफेल के दस्तावेज चोरी हो गए!

दिसंबर में राफेल सौदे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई थी. उस समय सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में झूठ बोला था. बाद में सरकार ने कहा कि पूरे एक पैराग्राफ की टाइपो एरर हो गई. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के उस झूठ के आधार पर अपना फैसला सुना दिया था.

खैर, जब यह बात सामने आई कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में झूठ बोला है तो फैसले के ऊपर पुनर्विचार याचिकाएं डाली गईं. एक सरकार की तरफ से भी डाली गई. इन्हीं पुनर्विचार याचिकाओं पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. इस बीच दि हिंदू ने एक के बाद एक खुलासे कर सरकार को परेशान कर दिया.

आज जब सुनवाई शुरू हुई तो सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल ने कहा कि रफाल से जुड़े दस्तावेज रक्षा मंत्रालय से चोरी हो गए हैं. इस आधार पर उन्होंने मांग की पुनर्विचार याचिकाओं को रद्द कर दिया जाए. अटॉर्नी जनरल ने ये भी कहा कि चोरी हुए दस्तावेजों को लेकर जांच चल रही है और वे दस्तावेज बहुत संवेदनशील थे, उन्हें उजागर करना ‘आफिसियल सीक्रेट एक्ट’ के तहत जुर्म है. इस आधार पर अटॉर्नी जनरल ने कहा कि दि हिंदू अखबार ने इन दस्तावेजों को पब्लिक में लाकर ‘आफिसियल सीक्रेट एक्ट’ का उल्लंघन किया है.

कुल मिलाकर अटॉर्नी जनरल का कहना है कि चूंकि राफेल से जुड़े अतिसंवेदनशील दस्तावेज चोरी हो गए हैं और क्योंकि वे देश की सुरक्षा से जुड़े हुए हैं इसलिए पुनर्विचार याचिकाओं को रद्द कर दिया जाए. और तो और दस्तावेजों को पब्लिक में लाने के लिए दि हिंदू पर कार्रवाई की जाए. मतलब ये इस सरकार की जानी पहचानी नीति है.

वैसे आज द हिन्दू में एन राम ने आज रफाल सौदे पर फिर एक खुलासा किया है. पहले पन्ने पर सात कॉलम में टॉप पर छपी खबर का शीर्षक है, “बैंक गारंटी नहीं होने का मतलब हुआ महंगा नया सफाल सौदा”. खबर के मुताबिक इंडियन नेगोशिएटिंग टीम (यानी सौदे के लिए बनी मोल भाव करने वाली भारतीय टीम संक्षेप में आईएनटी) ने अपनी अंतिम रिपोर्ट में खुलासा किया है कि समानांतर सौदेबाजी से उसकी स्थिति कैसे कमजोर कर दी गई थी और फ्रेंच स्थिति मजबूत हो गई थी. यह रिपोर्ट 21 जुलाई 2016 को रक्षा मंत्रालय को सौंपी गई थी. बैंक गारंटी नहीं होने से 36 विमानों का सौदा यूपीए के सौदे की तुलना में 246.11 मिलियन यूरो महंगा है.

जब इनके ऊपर प्रश्न खड़े होते हैं तो उत्तर देने की जगह ये प्रश्न पूछने वाले को ही राष्ट्रद्रोही बोल देते हैं. राफेल मामले में भी यही हो रहा है. रक्षा मंत्रालय से अति संवेदनशील दस्तावेज चोरी हो गए. मतबल सच में. ये बात पच नहीं रही है.

अगर ऐसा है तो फिर आप रक्षा मंत्रालय में कर क्या रहे हैं? रक्षा मंत्रालय अगर अपने दस्तावेज नहीं बचा पा रहा है तो बाकी देश की क्या सुरक्षा करेगा? असल में ये सरकार राफेल पर बुरी तरह से फंस गई है.

राफेल डिफेंस का घोटाला है, जिसको लेकर ये सरकार बहुत ज्यादा मोरल हाई ग्राउंड लेती है. अब चूंकि फंस गई है तो भागने के लिए कोई रास्ता नहीं मिल रहा है. इसलिए कभी टाइपो एरर हो जाता है तो कभी अतिसंवेदनशील दस्तावेज चोरी हो जाते हैं. खीझ में चोरी पकड़ने वालों को देशद्रोही और उनके ऊपर कार्रवाई की बात कही जाती है.

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश लिखते हैं, “सरकार की तरफ से सर्वोच्च न्यायालय को सूचना‌ दी गई कि रफाल के कुछ दस्तावेज रक्षा मंत्रालय स्थित किसी दफ्तर से चोरी हो गए. दैय्या रे, ये क्या हो गया? चलो, थोड़ी राहत की बात, कम से कम मंत्रालय के उस दफ्तर में आग तो नहीं लगी. 
कई बार अखबारों में पढ़ने को मिलता रहता है: अमुक दफ्तर में आग लगी. आग अक्सर वहां ज्यादा लगती है, जहां कुछ ज्यादा गोलमाल हुआ होता है. रफाल वाले दफ्तर के बारे में मैं ऐसा कुछ नहीं कह रहा हू. मुझे तो ये भी नहीं मालूम कि रफाल में चोरी का कितना सच है और रफाल के दस्तावेजों की चोरी का कितना सच है?”

 पर एक बात कोई समझाए. अभी तक सरकार और उसके बड़े-बड़े मंत्री रफाल घोटाला विवाद पर ‘द हिन्दू’ में छपने वाली खबरों पर सौदे के बचाव में जो भी बयान दे रहे थे, क्या वे दस्तावेज देखे बगैर सिर्फ अपनी याददाश्त के आधार पर बयान दे रहे थे?

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