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रिपोर्ट

इंदिरा गांधी के पीएन हक्सर, राहुल गांधी के संदीप सिंह और कांग्रेस में वामपंथी विचारधारा

कृष्ण कांत

1967 के चुनाव में कांग्रेस की सीटें घट गईं और पार्टी पहले से कुछ कमज़ोर हो गई. पार्टी में सिंडीकेट गुट की अगुआई कर रहे के कामराज, जो उस वक्त कांग्रेस के अध्यक्ष थे और कांग्रेस के भीतर किंगमेकर की हैसियत में थे, चुनाव हार गए. कामराज के कई करीबी… जैसे… अतुल्य घोष, एसके पाटिल जैसे सिंडीकेट के दिग्गज नेता चुनाव हार गए. इसका नतीजा यह हुआ कि अब सिंडीकेट गुट उस तरह सरकार को नियंत्रित करने की हालत में नहीं रहा, जैसा इसके पहले कर रहा था. इस चुनाव में एक तरफ कांग्रेस कमजोर हुई, लेकिन वह अब भी सत्ता में बनी हुई थी और इंदिरा गांधी खुद कमजोर होने की जगह और मजबूत नेता बन गई थीं.

नेहरू और शास्त्री की कैबिनेट में अहम रोल अदा कर चुके मोरारजी देसाई उस समय कांग्रेस के ताकतवर और वरिष्ठ नेता थे. नेहरू के बाद वे प्रधानमंत्री बनना चाहते थे लेकिन सिंडीकेट ने उन्हें रोक दिया और लालबहादुर शास्त्री को प्रधानमंंत्री बनाया गया. जब शास्त्री का देहांत हुआ तब भी प्रधानमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार मोरारजी देसाई ही थे, लेकिन सिंडीकेट ने फिर से उन्हें रोक दिया और नेहरू की बेटी को इंदिरा को प्रधानमंत्री बनाया गया. लेकिन 1967 के चुनाव में सिंडीकेट भी कमजोर हो गया और कांग्रेस भी. इस मौके को देखते हुए मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदारी ठोंक दी. हालांकि, इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री पद के लिए चुनाव नहीं चाहती थीं क्योंकि वे हार भी सकती थीं. खैर… बीचबचाव और बातचीत के बाद मोरारजी ने प्रधानमंत्री बनने की जिद छोड़ उपप्रधानमंत्री और वित्त मंत्री बनने के लिए राजी हो गए.

इंदिरा गांधी के साथ पीएन हक्सर

प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गांधी ने मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित पीएन हक्सर को अपना निजी सचिव बनाया था और बड़े बड़े फैसले ले रही थीं. ये फैसले गरीबों आम आदमी के नजरिये से बेहद अहम थे. पार्टी और सरकार में उनकी ताकत बढ़ने लगी. दूसरी ओर सिंडीकेट गुट के ही एस निजलिंगप्पा कांग्रेस के अध्यक्ष बनाए गए. इंदिरा की बढ़ती ताकत से घबराए सिंडीकेट गुट ने उन्हें कमजोर करने की साजिशें शुरू कीं. सिंडीकेट गुट पूरी तरह चाहता था कि इंदिरा गांधी को कांग्रेस नेतृत्व से हटा दिया जाए.

इस बीच अपने को लोकप्रिय बनाने के लिए इंदिरा गांधी पीएन हक्सर की सलाह पर तरह तरह के उपाय करती रहीं. बैंकों का राष्ट्रीयकरण इसी तरह का एक फैसला था, जिसके इसके बाद बड़े प्राइवेट बैंक सरकारी नियंत्रण में आ गए. प्रिवी पर्स के तहत रजवाड़ों के विशेषाधिकार खत्म करना अथवा गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम के पीछे वामपंथी पीएन हक्सर का ही दिमाग था. हालात यह थे कि विरोधी कहने लगे कि इंदिरा गांधी कम्युनिस्ट तानाशाही लाना चाहती हैं. बाद में इंदिरा गांधी और इस गुट का झगड़ा इतना बढ़ा कि पार्टी टूट गई और इंदिरा गांधी सर्वेसर्वा बन गईं. खैर, हम यह बताना चाह रहे हैं कि इंदिरा गांधी की जनपक्षधरता के पीछे हक्सर थे, जिसके कारण वे लोकप्रिय हुईं।

अब करीब पांच दशक बाद समय ने करवट बदली है. इंदिरा के पोते राहुल पार्टी अध्यक्ष हैं, सत्ता के लिए भाजपा से संघर्ष कर रहे हैं और उनका एजेंडा सेट कर रहे हैं जेएनयू से निकले युवा वामपंथी संदीप सिंह. आइसा में रहे संदीप सिंह जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके हैं. वे आजकल न सिर्फ राहुल गांधी के भाषण लिख रहे हैं, बल्कि कहा जा रहा है कि राहुल और प्रियंका के भाषणों में कॉर्पोरेट विरोध व गरीब समर्थन के रुझान के पीछे संदीप का ही दिमाग है. यह भी सही है कि राहुल गांधी जिस तरह कॉरपोरेट विरोध कर रहे हैं, या जिस तरह खुल कर संघ पर हमले कर रहे हैं वह कांग्रेसी परंपरा के उलट है. यूपी में प्रियंका की लॉन्चिंग से लेकर जनपक्षधर मुद्दों की ओर कांग्रेस को मोड़ने में उनकी भूमिका बताई जा रही है. प्रियंका गांधी के अभी तक दो यूपी दौरे में भी वह साथ ही थे.

इन दोनों उदाहरण से मेरे दिमाग में एक बात आ रही कि क्या भारत में वामपंथ को कामयाब होने के लिए एक उदार दक्षिणपंथ की ज़रूरत है? अगर ऐसा नहीं है तो तमाम दिग्गज विचारकों और रणनीतिकारों के बावजूद वामपंथ भारत में अपना प्रसार क्यों नहीं कर सका? भारत में वामपंथी विचार और विचारकों ने वाम दलों से ज़्यादा दक्षिणपंथी दलों का कल्याण किया. जिन नेहरू को आज वामपंथी कहने का मूर्खतापूर्ण चलन शुरू हुआ है, वे भी तो वामपंथ के प्रभाव में होते हुए भी वामपंथियों के लिए दक्षिणपंथी ही थे.

बहरहाल, संदीप सिंह की भूमिका और राहुल की सफलता या हार की कहानी चुनाव के बाद लिखी जाएगी.

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