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राहुल गांधी को सफलता-असफलता की बातें छोड़ संघर्ष जारी रखना होगा

कृष्णकांत

विभाजन की असफलता के बाद भी गांधी, पटेल, नेहरू आधुनिक भारत के नायक बने. मात्र 23 साल की उम्र में जिस बच्चे ने माफी की ​जगह फांसी चुनी, वह इस देश का हीरो है. पोरस, महाराणा प्रताप, रानी लक्ष्मीबाई, बीर अब्दुल हमीद आदि हार के बावजूद भारतीय मानस में नायक के रूप में मौजूद हैं. यह लिस्ट बहुत लंबी बनेगी. कहने का मतलब सिर्फ ​इतना है कि नायक सिर्फ विजेता नहीं होते. सिर्फ हासिल करने वाला नायक नहीं है. नायक हारता भी है, गंवाता भी है, लेकिन जूझता भी है. एक हार से सबक लेकर दूसरी रणनीति बनाता है. गांधी गद्दीनशीन न होकर भी राष्ट्रपिता हैं.

अब एक हैं राहुल गांधी और वे एक ही हैं. उनके बारे में देश के एक बड़ी आबादी में यह धारणा व्याप्त है कि वे अच्छे इंसान हैं, लेकिन उनमें नेता के गुण थोड़े कम हैं. वे प्रधानमंत्री बनने लायक नहीं हैं. उन्होंने इस धारणा को फिर से सही साबित किया.

जब यूपीए की सरकार थी उस दौरान यानी दस साल तक राहुल अखबारों और चैनलों की जगह सिर्फ इस बात के लिए घेरते रहे कि ‘अब राहुल गांधी संभालेंगे बड़ी जिम्मेदारी’. यह खबर पढ़ पढ़कर हम पक चुके थे. लंबे समय तक चले इस तमाशे ने उनकी छवि एक नकारा नेता की बना दी, जो मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुआ है और बिना कुछ किए धरे एक पार्टी का अध्यक्ष बन गया. कम से कम राजीव गांधी की तरह एक एशियाई खेलों के आयोजन का भी श्रेय उनके खाते में नहीं आया.

2014 और 2019 का चुनाव वे लड़े और हारे तो तीन राज्य जीते भी. पांच दस साल का समय राजनीति में बेहद छोटा होता है. उन्हें खुद को और मजबूत नेता के रूप में पेश करना चाहिए था. लेकिन फिलहाल तक ऐसा नहीं हुआ.

सत्ता के दौरान राहुल गांधी ने अपनी जो छवि पेश की थी कि ‘अब राहुल गांधी संभालेंगे बड़ी जिम्मेदारी’, वही वे चुनाव हारने के बाद कर रहे हैं. बीजेपी चुनाव जीतकर अगले चुनावों की तैयारी में लगी है, तेलंगाना और बंगाल की तै​यारियां चल रही हैं. हर राज्य में सदस्यता अभियान लॉन्च हो गया, राहुल का यही तय नहीं हो पाया कि अध्यक्ष रहेंगे कि नहीं रहेंगे. सभी बड़े राज्यों में कांग्रेस मृतप्राय है. स्थानीय नेता और कार्यकर्ता के बगैर समर्थन आएगा कहां से? लेकिन ऐसा लगता है कि कांग्रेस अभी इतनी सी बात समझ पाने के योग्य नहीं हो सकी है.

तुर्रा यह कि आज से बीजेपी ने यह भी कहना शुरू कर दिया है कि राहुल गांधी कायर हैं, वे जुझारू नहीं हैं, जिम्मेदारी से भाग खड़े हुए.

अगर राहुल गांधी यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि वे सिर्फ हासिल करेंगे तो यह संभव नहीं है. इस दुनिया में बुढ़ापे तक असफल होने वाले लोगों ने सफलता के कीर्तिमान कायम किए हैं और दुनिया के नायकों में उनकी गिनती होती है. राहुल गांधी अगर महात्मा गांधी से न सीखें तो नरेंद्र मोदी से ही सीख लेते.

लोकतंत्र सिर्फ सत्ताधारी पार्टी से नहीं बनता. जितनी आवश्यकता एक चुनी हुई सरकार की है, उतनी ही आवश्यकता एक ऐसे विपक्ष की भी है जो सरकार को गाहेबगाहे झकझोरता रहे.

दुर्भाग्य से सत्ता में डेढ़ आदमी की सरकार है और विपक्ष इस तरह है कि होकर भी नहीं है. यह सही है कि ‘जम्हूरियत में बंदों को तौला नहीं, गिना जाता है’ लेकिन जम्हूरियत में यह भी जरूरी है कि जिनकी गिनती कम हो, उनकी ज़बान और ज़ेहन वज़नदार हों.

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