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राहुल गांधी जब तक महात्मा गांधी का बचाव कर पाने लायक नहीं बन जाते, तब तक कांग्रेस की वापसी संभव नहीं है

कृष्णकांत

राहुल गांधी जब तक महात्मा गांधी जैसे महापुरुष का बचाव कर पाने लायक नहीं बन जाते, तब तक कांग्रेस की वापसी संभव नहीं है. एक आतंक की आरोपी गोडसे का नारा लगाकर, बापू का अपमान करके आपके एक पूर्व सीएम को हराकर चुनाव जीत लेती है और आप उस महापुरुष का बचाव नहीं कर पाते, जिसे पूरी दुनिया महान मानती है. यही कांग्रेस की त्रासदी है.

2014 और फिर 2019, यह सिर्फ एक चुनाव नहीं था, यह युग का अंत है और एक युग की शुरुआत है. पिछले कई चुनावों से साबित हुआ कि मंडलवाद अब कमंडलवाद की काट नहीं रह गया है. जाति खत्म नहीं हुई तो जाति की राजनीति खत्म नहीं होगी, लेकिन इस युग में विपक्षियों को नये तरह की राजनीति तलाशनी होगी.

राहुल गांधी कांग्रेस के सलाहकारों और बूढ़ों पर गुस्सा उतारकर लकीर पीट रहे हैं. सभी विपक्षी नेताओं को अपने अपने बाप दादों का इतिहास पढ़ना चाहिए. मुलायम सिंह और लालू यादव अच्छे थे या बुरे, लेकिन वे जुझारू थे, सड़क पर और जनता के बीच थे, इसलिए लोकप्रिय थे. इंदिरा गांधी की लड़ाकू, कड़क और जनवादी छवि ने उन्हें जनता का साथ दिलाया. आज जगनमोहन रेड्डी और नवीन पटनायक मोदी लहर में भी इतिहास रच रहे हैं, क्योंकि जनता के बीच थे. राहुल और तेजस्वी जैसों को लगा कि मोदी ने ट्विटर से चुनाव जीत लिया, सरकार चला ली तो हम भी जीत लेंगे, लेकिन इनको भाजपा के 11 करोड़ कार्यकर्ता कभी दिखे ही नहीं, जो हर दिन व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी पर प्रोपेगैंडा चलाते हैं कि गांधी चरित्रहीन था.

असली नेता को सिर्फ कारगर रणनीति ही बनानी होती है, विरोधी प्रोपेगैंडा को भी मात देना होता है, अपनी रणनीति का जनसमर्थन के सहारे अमल भी करवाना होता है, जैसा अमित शाह कुशलता से कर रहे हैं. कांग्रेस नेताओं को घर से निकलकर लोगों को अपने पक्ष में तो करना पड़ेगा. यह न्यूनतम शर्त है.

चुनावी आंकड़ों पर गौर कीजिए
भाजपा को इस बार मिले हैं 22.6 करोड़ वोट. भाजपा के कार्यकर्ताओं की संख्या है 11 करोड़. कांग्रेस को मिले हैं 11.86 करोड़ वोट. कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की संख्या का किसी को पता नहीं. यहां तक कि तमाम राज्यों में नेताओं का भी किसी को पता नहीं. भाजपा का एक कार्यकर्ता उसे दो वोट भी दिला पाया होगा तो उसके 22 करोड़ वोट हुए.

इसके उलट कांग्रेस के पास एक सुरक्षित ट्रंप कार्ड था, जिसे आप प्रियंका गांधी के नाम से जानते हैं. प्रियंका गांधी ने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान 38 लोकसभाओं में 44 रैलियां कीं. उनकी 26 रैलियां सिर्फ यूपी में हुईं. प्रियंका ने जिन 38 लोकसभाओं में रैली की थीं, उनमें से सिर्फ दो सीटों पर जीत मिल सकी. ये दोनों सीटें हैं उत्तर प्रदेश की रायबरेली और केरल की वायनाड, जहां से सोनिया गांधी और राहुल गांधी जीते. मतलब अगर प्रियंका यहां न जातीं तो भी कोई खास फर्क नहीं पड़ता. मतलब कांग्रेस ने जो ‘प्रियंका बम’ बुरे दिनों के लिए संभाल कर रखा था, वह फुस्स हो गया.

देश भर में भाजपा के साथ ज्यादा संख्या में लोग खड़े हैं, क्योंकि उन्हें एक पहचान मिली है, मसलन- जिला अध्यक्ष, ब्लॉक अध्यक्ष, बूथ प्रभारी, पन्ना प्रमुख आदि.

दलित और मंडलवादी नेताओं ने शायद अब तक यह सोचा ही नहीं होगा कि दलित पिछड़े समाज का कोई वोटर अपनी जाति के हिसाब से नेता चुनने की जगह, पद, प्रतिष्ठा, पैसा पाकर वोट देना और दिलवाना चुन सकता है. भाजपा ने यही किया. 11 करोड़ लोगों को अपनी भागीदारी का एहसास करा देना उसकी सफलता का राज है.
समय के साथ कांग्रेस का एकछत्र राज खत्म हो गया और तमाम क्षेत्रीय दल आए. उस समय कमंडल के विरोध में मंडल की राजनीति एक कारगर हथियार था. उसने लोगों में सामाजिक न्याय की आकांक्षा जगाई थी. लेकिन उसे अब शायद उससे कहीं आगे कुछ चाहिए जो उसे नहीं मिल सका. जहां उसे कुछ मिलता दिखा, वह आगे बढ़ गई.
जहां तक कांग्रेस के भविष्य की बात है तो इन आंकड़ों पर गौर करना चाहिए.

भाजपा की सीटें 303, कांग्रेस की 52. भाजपा को 2014 में मिले 17.1 करोड़ वोट. इस बार बढ़कर हुए 22.6 करोड़ वोट. कांग्रेस को मिले थे 10.69 करोड़ वोट. इस बार बढ़कर हुए 11.86 करोड़. दोनों के संयुक्त वोट 27.79 करोड़ से बढ़कर 34.46 करोड़ हो गए. भाजपा कांग्रेस का संयुक्त वोट 2014 में 50.3 प्रतिशत था, अब यह 57 प्रतिशत है. भाजपा का समर्थन खूब बढ़ा है, कांग्रेस का मामूली बढ़ा है. भाजपा, अभी कांग्रेस को हल्के में लेने की गलती नहीं करेगी. कांग्रेस खुद ही अपना लोड नहीं ले पा रही है.

कांग्रेस तीन महीने पहले चुनाव लड़ने उतरेगी तो फिर से हारेगी. कांग्रेस ट्वीटर से पार्टी चलाएगी तो फिर हारेगी. कांग्रेस को क्षेत्रीय स्तर पर तमाम जगनमोहन और नवीन पटनायकों की जरूरत है जिनके साथ जबरदस्त जनसमर्थन हो. कांग्रेस अभी गांधी जैसे महानायक का जोरदार बचाव तक नहीं कर पा रही है. लोगों में उसका आकर्षण कम नहीं हुआ है. मजा तो तभी आएगा जब सत्ता पक्ष को एक मजबूत विपक्ष का भय बराबर बना रहे, अन्यथा इंदिरा गांधी उदाहरण हैं कि कैसे एक निरंकुश तानाशाह के हाथ में लोकतंत्र बहक जाता है.

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