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रिपोर्ट

INS विराट पर छुट्टी मनाने नहीं गए थे राजीव गांधी: पूर्व कमांडिंग ऑफिसर

उर्मिलेश

जिस दौर में (दिवंगत) प्रधानमंत्री राजीव गांधी अपने परिवार के साथ लक्षद्वीप केंद्र शासित क्षेत्र के एक द्वीप गए थे, वहां उस वक्त वजाहत हबीबुल्ला(अब सेवानिवृत्त) प्रशासक थे। हबीबुल्ला साहब ने साफ शब्दों में मौजूदा प्रधानमंत्री मोदी के उस आरोप-भरे दावे को ग़लत बताया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि राजीव गांधी ने अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ ‘सैरसपाटा और पार्टी’ करने के लिए ‘विराट युद्ध पोत’ का कई दिनों तक इस्तेमाल किया! (बताइए भला, किसी दिवंगत प्रधानमंत्री पर कीचड़ उछालने के लिए ऐसे मसले भी प्रयुक्त हो सकते हैं? अनेक युद्ध पोतों पर प्रधानमंत्री क्या, पत्रकारों को भी घुमाने-फिराने ले जाया जाता है! वहां सैन्य अफसर ब्रीफिंग करते हैं!)

भारत के मुख्य सूचना आयुक्त रह चुके लेखक और पूर्व प्रशासक हबीबुल्ला ने प्रधानमंत्री मोदी के बयान को निराधार साबित कर दिया. यह भी कहा कि प्रधानमंत्री चाहें तो तथ्यों को फिर से चेक कर लें। वे चाहें तो इसकी पुष्टि अमिताभ बच्चन से कर लें।

जल सेना के एडमिरल रहे रामदास ने भी प्रधानमंत्री के आरोपों को ग़लत बताया है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री के रूप में वह राजीव गांधी की आधिकारिक यात्रा थी। उस दरम्यान ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था, जैसा प्रधानमंत्री मोदी दावा कर रहे हैं। फिर सच क्या है? आखिर प्रधानमंत्री को और कोई मुद्दा नहीं मिल रहा है कि एक दिवंगत प्रधानमंत्री के किसी दौरे, आधिकारिक यात्रा और उसके बाद पारिवारिक छुट्टी मनाने को वह चुनावी मुद्दा बनाने में जुटे हैं?

अगर हबीबुल्ला और रामदास जैसे सेवानिवृत्त उच्चाधिकारी सही बोल रहे हैं तो पीएमओ को बताना चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी को उनके सलाहकारों और सहयोगियों में वह कौन है, जो ऐसी झूठी सूचना परोस रहा है? इससे प्रधानमंत्री के पद और कार्यालय, दोनों की छवि और गरिमा को गंभीर नुकसान हो रहा है।

मैं अपने कई मित्रों की इस बात से सहमत हूं कि प्रधानमंत्री मोदी चुनाव प्रचार में जान-बूझकर कभी दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बारे में कोई बेमतलब आरोप(चाहे वह निराधार ही क्यों न हो!) लगाते हैं, कभी ‘दीदी’ के किसी कथित थप्पड़ की बात करते हैं, कभी मायावती जी और अखिलेश के चुनाव-बाद अलग-अलग होने की बात करते हैं तो कभी पाकिस्तान की कोई बात करते हैं।

दरअसल, उनकी पूरी कोशिश है कि चुनाव प्रचार के दौरान समाज या मीडिया में कोई भी उनकी सरकार या शासन के बारे में सवाल नहीं करे! लोग अपने मसलों और आस-पास की समस्यायों पर बात नहीं करें! लोग रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, दलित आदिवासी और ओबीसी पर बढ़े हमलों व अत्याचारों, नोटबंदी, शासकीय भ्रष्टाचार के अनेक मामलों, पार्टी के रूप में भाजपा और उसके अनेक नेताओं के मालामाल होने, सरकारी कंपनियों की बेहाली, बैंकों की कारपोरेट लूट और संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर किये जाने जैसे मुद्दों की बात नहीं करें! लोग ऐसे मसलों में उलझे रहें, जो उनके लिए पूरी तरह बेमतलब हैं। क्या विपक्षी दल और आम लोग इस खेल को समझ रहे हैं?

अतिशी के खिलाफ़ निम्नस्तर की पर्चेबाज़ी

किसी उम्मीदवार के पक्ष या विपक्ष में लिखने की मेरी आदत नहीं! आमतौर पर मैं इस तरह के लेखन से बचता हूं। पर एक नागरिक और पत्रकार के रूप में किसी राजनीतिक सामाजिक-कार्यकर्ता को मैं सामाजिक-सरोकार विहीन किसी कथित सेलिब्रिटी के मुकाबले ज्यादा तरजीह देता हूं!

पूर्वी दिल्ली क्षेत्र में एक महिला उम्मीदवार, जो दिल्ली की जानी-मानी सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता हैं, दिल्ली सरकार के शिक्षा-सुधार प्रोजेक्ट में उनकी अहम भूमिका मानी जाती है, के खिलाफ कल बहुत निम्नस्तर की परचेबाजी की गई! पर्चे में लिखी बातें इतनी घटिया और शर्मनाक हैं कि उनका यहां उल्लेख करना भी वाजिब नहीं!

मुझे नहीं मालूम, वह घृणित किस्म की पर्चेबाजी किसने की या कराई। पर वो पर्चा आसमान से तो नहीं टपका होगा! बहुत संभव है वह उक्त महिला-प्रत्याशी के विरोधियों या निंदकों की तरफ से ही छापा और वितरित कराया गया हो।

निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता पर इन दिनों बहुत सवाल उठ रहे हैं! पर चुनाव कराने की जिम्मेदारी उसी की है। इसलिए आयोग को इस मामले में अविलंब हस्तक्षेप करना चाहिए। उसे फौरन मामले की उच्च स्तरीय जांच कराकर दोषी को दंडित करना चाहिए। और जांच किसी ऐसी समिति से कराई जानी चाहिए, जिस पर किसी पार्टी, सत्ता या नेता का प्रभाव नहीं हो।

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