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लोहिया याद आते रहेंगे लेकिन इस दौर के छुटभइए नेता उन्हें भुला देना चाहते हैं

आजादी के समय चारों तरफ रक्तपात मचा हुआ था. दिल्ली में एक मुसलमान लड़का डॉ. राममनोहर लोहिया से टकरा गया. वह समझता था कि लोहिया के साथ वो सुरक्षित है. लेकिन कम उम्र होने के कारण वह यह नहीं समझ पाया कि भीड़ क्या कर सकती है. जैसा कि अंदेशा था क्रुद्ध भीड़ ने चारों तरफ से घेर लिया. भीड़ का दावा था कि उस लड़के के पास हथियार है. इसलिए उन्हें उसकी तलाशी लेने दी जाए. ये एक बेहूदी मांग थी. इसका नतीजा कुछ भी हो सकता था. इसका अंदाजा लोहिया को भी था. वे अड़ गए. भीड़ में से कोई चीखा, ”जब लाहौर में घटनाएं हुईं, तब कहां थे?”

लोहिया चीखकर बोले. ”मैं भी लंबे समय तक लाहौर के किले में था. और जब ब्रिटिश काल में लाहौर के किले में सब हो रहा था. तब वे कहां थे?”

भीड़ का बड़ा हिस्सा शांत था. पर बिल्कुल सहज नहीं. वे लगातार लड़के की तलाशी की मांग कर रहे थे. लोहिया का अपनी जगह से हटना असंभव था. तीन चार लोगों ने आगे बढ़कर लोहिया को घसीटना चाहा. लेकिन असफल रहे. अच्छी बात ये थी कि पूरी भीड़ ने बल प्रयोग नहीं किया. खींचा तानी चलती रही. भीड़ कितनी भी क्रुद्ध हो, यदि प्लॉन्ड न हो तो गुंडों की संख्या कम ही होती है. बाकी केवल उत्तेजित दर्शक ही होते हैं. और कोई भी भला आदमी अकेले उनका मुकाबला कर सकता है. लोहिया कहते हैं, मैंने गांधीजी से यही सीखा था.

एक प्रसंग और है,
कलकत्ता भयानक दंगों की चपेट में था. गांधीजी ने लोहिया को वहां भेजा. लोहिया को ये नहीं पता था कि क्या करना है? न ही गांधीजी ने उन्हें ये बताया था. जब कुछ समझ न आया तो लोहिया ने सोचा कि जो पुराने मुसलमान मित्र हैं कलकत्ता में उन्हीं से मिला जाए. और बात की जाए. यह छोटा और आसान काम लगता है, लेकिन था नहीं. सारा शहर दो युद्ध स्थल में बंटा था. एक मुसलमानों का, दूसरा हिंदुओं का. एक दूसरे के मुहल्लों में जाना असंभव था.

पूरे एक साल तक दोनों मुहल्लों की सीमा पर बाजार लगते. इससे कोई मतलब नहीं कि वे किस हद तक दंगा करते थे. उन्हें आपस में व्यापार करना ही पड़ता था. हिंदू मुसलमान दोनों बाजार में आकर अपनी-अपनी टोकरी छोड़ जाते थे. दोनों के समय निश्चित थे. एक दल आता अपनी टोकरियां बटोरता, और दूसरे सामान छोड़ जाता. फिर दूसरा आता. यह कितना अजीब है. वे भले ही एक दूसरे के गर्दन पर छुरियां चलाते लेकिन व्यापार पूरी ईमानदारी और सच्चाई से करते.

कलकत्ता में कई मित्र तो थे, लेकिन जिससे भी संपर्क की कोशिश करते पता चलता कि वो शहर में नहीं है. लगभग सभी जगह से यही जवाब मिला. पांच छह दिन बाद जब लोहिया उकता गए तो खुद ही निकल पड़े. बिना किसी पूर्व सूचना के, पूर्व निश्चय के.

जब लोहिया मुस्लिम मोहल्ले में घुसे तो एक अजीब सी उत्तेजना महसूस की. उन्हें चारों तरफ हिंसक उत्तेजना से भरे चेहरे दिख रहे थे. अगर कोई मुसलमान किसी हिंदू मोहल्ले में जाता तो उसे भी इस स्थिति का सामना करना पड़ता. लोहिया गुस्साए चेहरों को देखकर मुस्करा देते. यदि वह व्यक्ति और भी गुस्सा करता तो उससे किसी का घर पूछ लेते. एक छोटा सा लड़का उन्हें एक ऐसे घर में ले गया जो मुस्लिम छात्रों का केंद्र था. वहां के छात्रों ने लोहिया से लगभग दो घंटे तक बहस की. इस वाद विवाद में गर्मी उत्तेजना और सब-कुछ रहा. लेकिन यह साधारण बहस ही थी. जिसमें बात करते हुए छात्र अपने से 15-20 साल बड़े व्यक्ति के लिए बराबर सम्मान भी व्यक्त कर रहे थे.
जब लोहिया वापस आए तो मोहल्ले की सीमा पर लगभग दो-तीन सौ हिंदू इकट्ठा थे. वे प्रतीक्षा कर रहे थे कि लोहिया का क्या हुआ.

आज 70 साल बाद भी देश अक्सर दंगों में झुलसता रहता है. आज भी सड़कों पर किसी निहत्थे को घेरकर भीड़ त्वरित निर्णय कर देती है. अपने आसपास तलाशिएगा किसी लोहिया को. उन को भी देखिएगा जो खुद को लोहिया का अनुयायी/उत्तराधिकारी घोषित करते हैं. और उनको भी जो सत्तानशीं हैं. क्या उनके अंदर कूव्वत है किसी दंगे को शांत कराने की.

क्या है ऐसा कोई जो मुजफ्फरनगर को रोक सकता?

कोई नहीं मिलेगा. कोई भी नहीं. चाहे वो मुजफ्फरनगर वाले हों या गुजरात वाले. ये बस 23 मार्च के दिन ब्लॉग लिखकर और फूल माला चढ़ाकर उन्हें श्रद्धांजलि देते रहेंगे. दंगे होते रहेंगे.

हर दंगे में लोहिया याद आते रहेंगे और शायद गांधी भी.

लेकिन एक सवाल यह भी है कि क्या लोहिया को उनके नाम पर राजनीति करने वाले याद करते हैं? इस सवाल के जवाब में मेरे दोस्त गर्वित गर्ग लिखते हैं, राममनोहर लोहिया कहकर गए थे कि लोग मुझे याद तो करेंगे लेकिन मेरे मरने के बाद. ऐसा लगता है कि वो भ्रम में थे.

पर वो कौन लोग हैं जो लोहिया को याद करते हैं? जो लोग उनके नाम की राजनीति करते हैं, वो तो बिल्कुल नहीं करते. समाजवादियों से लेकर जनता पार्टी के टुकड़ों तक. कभी-कभार जिक्र कर देते हैं, संकट के क्षणों में, या फिर जब उन्हें याद करने के सिवाए कोई रास्ता ही न बचा हो. पर उनकी भी मजबूरी है. शायद उनकी सोशल मीडिया संभालने वालों को पता ही न हो कि लोहिया कौन थे और उन्हें क्यों याद रखा जाए.

लोहिया को कांग्रेस भी याद नहीं करती, और न ही कम्यूनिस्ट पार्टी के लोग. उन दो विचारधाराओं के लोग, जिनकों साथ में लेकर उन्होंने एक नया भारत बनाने की कल्पना की थी. लोहिया को अब नरेंद्र मोदी भी याद नहीं करते. एक समय में किया था, पर तब उनको लोहिया गैर-कांग्रेसवाद का चेहरा लगते थे. अब लगता है कि वो भी ‘लोहिया की तर्ज पर हो महागठबंधन’ और ‘माया-अखिलेश का साथ आना लोहिया और अंबेडकर की राजनीति के आगे लेकर जाएगा’ जैसे लेख पढ़ने लगे हैं.

लोहिया को बुद्धिजीवी भी याद नहीं करते, और न ही बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों के छात्र. लोहिया के लोग न ही कोई फाउंडेशन चलातेे हैं जो उन्हें ग्रांट या फैलोशिप दे सकें और न ही उनकी विचारधारा के लोग विश्वविद्यालयों पर कब्जा करके बैठे हैं. लोहिया को गांधीवादी भी याद नहीं करते.शायद वो उस गांधी को याद नहीं रखना चाहते जो आजादी की रात कलकत्ता में दंगे रोकने की कोशिश कर रहा था, तो उनके साथ लोहिया ही थे ये भी उन्हें कैसे याद रहेगा.

लोहिया को उत्तर प्रदेश के लोग भी याद नहीं करते, जो उनकी कर्मभूमि रही. और न ही गोवा के लोग, जिन्हें पुर्तगाल से आजादी दिलाने में लोहिया ने अहम योगदान दिया. लोहिया को अमेरिका में भी कोई याद नहीं करता, जहां पर वो रंगभेद नीतियों का विरोध करने के लिए गिरफ्तार किए गए.

लोहिया को नारीवादी भी याद नही करते, क्योंकि वो भी लोहिया की उस सोच को नहीं पचा पाते जिसमें वो कहते हैं कि एक स्त्री और पुरुष के बीच वादाखिलाफी को छोड़ सभी रिश्ते जायज हैं. लोहिया को अंग्रेजी वाले लोग भी नहीं याद करते क्योंकि उन्होंने अंग्रेजी का विरोध किया, और उन्हें भारतीय भाषाओं के लोग भी याद नहीं करते क्योंकि वे सिर्फ उन्हें याद करते हैं जिन्हें अंग्रेजी वाले लोग याद करते हैं.

लोहिया को उनकी पीढ़ी की तरह ही भुला दिया गया. एक ऐसी पीढ़ी जो शायद गलत समय पर पैदा हुई. जब तक लोहिया बड़े हुए, तब तक जवाहरलाल नेहरू जैसे लोग अपने आप को स्थापित कर चुके थे. और जब तक लोहिया का समय आया, तब तक वो खुद हमें छोड़कर जा चुके थे.

पर लोहिया को क्यों याद रखा जाना चाहिए? क्योंकि उनकी हर बात मान ली गई. क्योंकि वो एक शाताब्दी पहले पैदा हो गए. क्योंकि वो सब लोगों को साथ में लेकर एक ऐसा रास्ता बनाना चाहते थे, जिसमें हमेशा कुछ नया करने की गुंजाइश रहे. क्योंकि वो आजाद भारत के एकमात्र बुद्धिजीवी थे, और क्योंकि वो कहने के साथ-साथ करने में विश्वास करते थे. क्योंकि भले ही उन्हें भुला दिया गया पर कालांतर में उनकी सब बातें सच हुई.

एक बार अलबर्ट आइंस्टाइन ने लोहिया से पूछा था कि आप जो करना चाहते हैं उसे नेहरू क्यों नहीं कर पा रहे हैं? लोहिया का जवाब था, ‘Some men can write admirably, but act miserably.’ यही उनके और हमारे युग की त्रासदी है.

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