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राम मनोहर लोहिया जयंती विशेष: जब जब लोहिया बोलता था, दिल्ली का तख़्ता डोलता था!

डॉ. राम मनोहर लोहिया की जयन्ती पर सलाम! उत्तर भारत में आज भी आप राजनीतिक रुझान रखने वाले किसी युवा से बात करें तो वो इस नारे का जिक्र ज़रूर करेगा:
जब जब लोहिया बोलता है

दिल्ली का तख़्ता डोलता है।

महज चार साल में भारतीय संसद को अपने मौलिक राजनीतिक विचारों से झकझोर देने का करिश्मा डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कर दिखाया था।

चाहे वो जवाहर लाल नेहरू के प्रतिदिन 25 हज़ार रुपये खर्च करने की बात हो, या फिर ये कहने की हिम्मत कि महिलाओं को सती-सीता नहीं होना चाहिए, द्रौपदी बनना चाहिए।

1962 के तीसरे लोकसभा चुनाव में ग्वालियर की महारानी विजयाराजे सिंधिया के ख़िलाफ़ डॉ. लोहिया ने मेहतरानी सुक्खो रानी को खड़ा किया था। पूरे देश में “महारानी बनाम मेहतरानी” का मुद्दा चर्चा का विषय बन गया। महारानी प्रतीक थीं राजे-राजवाड़ों की सोच, विलासिता, देश के अभिजात्य वर्ग, और धन-बल की।
मेहतरानी सुखोरानी हजारों वर्ष से देश की पिछड़ी-दलित-आदिवासी स्त्रियों की गुलामी के खिलाफ़ संपूर्ण बहिष्कृत समाज के लिए प्रतीक बन गयी थीं। “महारानी बनाम मेहतरानी” का डिबेट छेड़ कर उन्होंने कहा था, “हजारों वर्ष से जमी चट्टानें सुक्खो रानी के मुद्दे पर टूटेंगी नहीं, तो दरकेंगी ज़रूर”।

उन्होंने महारानी के ख़िलाफ़ मेहतरानी को और नेहरू के ख़िलाफ़ ख़ुद को चुनावी समर में झोंकते हुए कहा था, “लोहिया के जीतने पर राजनीतिक परिवर्तन होगा और सुक्खो के जीतने पर समाजिक परिवर्तन की बयार बहेगी”।

डॉ. लोहिया का सपना साकार हुआ जब बृंदा करात सामाजिक न्याय के दायरे में महिला आरक्षण का विरोध कर रही थीं, वहीं क़ोटे के अंदर क़ोटे की पुरज़ोर वकालत करते हुए पत्थर तोड़ते हुए देश की सबसे बड़ी पंचायत का सफ़र तय करने वाली भगवती देवी ने महिला आरक्षण पर बहस के दौरान अपने बेहतरीन सम्बोधन में कहा था, “मैं जाति से मुसहर हूं, मैं और हमारे लोग सुबह से लेकर शाम तक पत्थर तोड़ते, उसके बाद जब पैसे माँगते तो सामंत ज़मींदार हमें और हमारे लोगों को मारते-पीटते, क्या आप विश्वास करते हैं कि ऐसे लोग हमें न्याय देंगे? एयर कंडिशन घरों में रहने वाले शहरवासी मुझे जातिवादी कहते हैं। जब तक आप व्यक्तिगत रूप से अनुभव नहीं करते कि हम कैसे रहे हैं, आप हमारे दर्द को नहीं समझ सकते। हम तो भूख और ग़रीबी में बड़े हुए हैं, लेकिन जिन लोगों को भोजन को पचाने के लिए डाइजिन की ज़रूरत पड़ती है, उन्हें हमारी समस्याओं के बारे में क्या पता है? लेकिन आज वो लोग अचानक ग़रीबों के चैम्पियन बन गए हैं”।

इस लिहाज़ से भगवती देवी को 1996 में लोकसभा का टिकट देकर संसद भेजने वाले लालू प्रसाद ने लोहिया की परंपरा को आगे बढ़ाया।

डॉ राम मनोहर लोहिया ने कहा था, “भड़भड़ बोलने वाले क्रांति नहीं कर सकते, ज्यादा काम भी नहीं कर सकते। तेजस्विता की ज़रूरत है, बकवास की नहीं”।

डॉ राम मनोहर लोहिया वो पहले राजनेता रहे जिन्होंने अहंकारी सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान करते हुए कहा था, “ज़िन्दा कौमें पांच साल तक इंतज़ार नहीं करतीं”।

1962 में लोहिया फूलपुर में जवाहर लाल नेहरू के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने चले गए। उस चुनाव में लोहिया जी कहते थे, “मैं पहाड़ से टकराने आया हूं। मैं जानता हूं कि पहाड़ से पार नहीं पा सकता, लेकिन उसमें एक दरार भी कर दी तो चुनाव लड़ना सफल हो जाएगा”।

डॉ राम मनोहर लोहिया ने कहा था, “मार्क्सवाद एशिया के खिलाफ यूरोप का अंतिम हथियार है”। वो यह भी कहते थे, “सड़कें अगर सूनी हुईं, तो संसद आवारा हो जाएगी”।

वो नर-नारी सम्बन्ध को लेकर बहुत प्रगतिशील थे, “परस्पर सहमति से बनाया गया हर सम्बन्ध जायज़ है”।

“राजनीति सामाजिक बुराइयों से लड़ने का औजार है।”

इमरजेंसी में गांधी मैदान के प्रांगण से जब पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने लोकनायक से पूछा आपकी सम्पूर्ण क्रांति क्या है तो जेपी ने कहा डॉ राममनोहर लोहिया की सप्त क्रांति ही मेरी सम्पूर्ण क्रांति है।

कभी डॉ लोहिया ने कहा था इस देश के दिमाग पर ब्राह्मण का राज है और जेब पर बनिया का राज है। दिमाग पर से ब्राह्मण का राज खत्म करना है और जेब पर से बनिया का राज।

लालू जी अपने संबोधनों में लोहिया जी की पंक्ति कहा करते हैं, “जब वोट का राज होगा तो छोट का राज होगा”।

उन्होंने उस समय राजनीति में मौजूद ब्राह्मणवादी संस्कारों को भी खूब ललकारा। राष्ट्रपति के ब्राह्मणों के पैर धोने पर उन्होंने कहा था, “उस देश में जिसका राष्ट्रपति ब्राह्मणों के पैर धोता है, एक भयंकर उदासी छा जाती है, क्योंकि वहां कोई नवीनता नहीं होती; पुजारिन और मोची, अध्यापक और धोबिन के बीच खुलकर बातचीत नहीं हो पाती है। कोई अपने राष्ट्रपति से मतभेद रख सकता है या उसके तरीकों को विचित्र समझ सकता है,पर वह उनका सम्मान करना चाहेगा, पर इस तरह के सम्मान का अधिकारी बनने के लिए राष्ट्रपति को सभ्य आचरण के मूलभूत नियमों का उल्लंघन नही करना चाहिए…भाई भाई को मारने वाले इस अकाट्य काम से वे (डॉ.राजेंद्र प्रसाद ) अब मेरे आदर से वंचित हो गए हैं ,क्योंकि जिसके हाथ सार्वजनिक रूप से ब्राह्मणों के पैर धो सकते हैं, उसके पैर शूद्र और हरिजन को ठोकर भी तो मार सकते हैं।”

कभी डॉ राममनोहर लोहिया से लोगों ने पूछा था समाजवाद को कौन जीता है इस मुल्क में तो डॉ. लोहिया ने कहा था, “जाओ, मधेपुरा के गांवों में एक नेता रहते हैं, जो समाजवाद को जीते हैं, उसका नाम भूपेंद्र नारायण मंडल है”।

लोहिया कहते थे, “सच कहना अगर बगावत है तो समझो हम बागी हैं”।

डॉ. लोहिया ने नारा दिया था “संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़ा पावे सौ में साठ”।

डॉ. लोहिया और समाजवादी आंदोलन के कोख से पैदा हुआ था “विशेष अवसर का सिद्धांत” और पिछड़ा वर्ग आयोग।

लोग कहते हैं कि राजनीति ईर्ष्या-द्वेष का अड्डा है, कोई किसी को देखना नहीं चाहता, आप बढ़ते हैं, वैमनस्य भी बढ़ता जाता है। कोई लोहिया-जेपी आज नहीं है जो किसी नौजवान को तलाश कर लाए और तराश कर आगे बढ़ाए। पर इसी दौर में कुछ लोग ओएसिस की मानिंद भी हैं।

1954 में केरल में तनुपिल्लै की सरकार ने निहत्थे किसान प्रदर्शनकारियों पर गोली चलायी, तो लोहिया ने अविलंब घटना की न्यायिक जांच और सरकार से इस्तीफे की मांग की। अपनी ही सरकार से इस्तीफा मांगने की यह नायाब मिसाल है। खुली बहस हुई, पार्टी टूट गई, लोहिया का गुट हार गया, मधु लिमये को पार्टी से निकाल दिया गया। नई पार्टी बनी जिसमें एस एम जोशी अध्यक्ष और लोहिया महासचिव बने। लोहिया, लिमये, जोशी, राजनारायण, रामसेवक यादव, बीएन मंडल और ख़ुद वे पूरेे देश में एक साथ काम करने लगे। बिहार में बीएन मंडल पार्टी के अध्यक्ष और कमलनाथ झा सचिव बनाए गए।

मधु लिमए को एक बार “शानदार हार” के लिए बधाई का तार भेजा लोहिया ने।

लोकनायक ने कहा कि सम्पूर्ण क्रांति में लोहिया की सात क्रांतियाँ शामिल हैं— राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक क्रांति। इन सातों क्रांतियों को मिलाकर सम्पूर्ण क्रान्ति होती है।

लोहिया कहते थे, “लोकराज लोकलाज से चलता है”।

स्वतंत्रता सेनानी सीताराम सिंह जी 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के संसदीय बोर्ड के चेयरमैन और मधुबनी के रूद्रनारायण झा सचिव बने। फिर दोबारा सीताराम सिंह जी सचिव और बीएन मंडल संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष बनाये गए। 1970-76 तक राज्यसभा के सदस्य और पार्टी के उपसचेतक रहे। वो याद करते हैं, “जब मैं पार्लियामेंट्री बोर्ड का चेयरमैन था, तो ये पैसे ले-दे कर टिकट बेचने-ख़रीदने की बीमारी नहीं थी, न ही दरबारी कराने की लत नेताओं में थी। दारोगा राय के बारे में वो बताते हैं कि वो विधायकों-सांसदों को खाते वक़्त भी बुला लेते थे कि खाएंगे भी और बात भी करेंगे। पर, आज तो लोग दरवाज़ा तक नहीं खोलते। क्या देखने के लिए ज़िंदा रहें, मोदी का तमाशा या ज्युडिशियरी का पक्षपातपूर्ण रवैया? लालूजी को तंग किए जाने के सिलसिले में सिस्टम में लगे जातिवादी घुन पर चर्चा कर रहे थे कि ये तो पहले भी चलता था, अब कुछ महीन ढंग से हो रहा है। 1938 में रामवृक्ष बेनीपुरी ने इन्हें कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का सदस्य बनाया था।
इतनी लंबी दास्तान है कि एकाध घंटे में क्या कहें, क्या छोड़ें। लोहिया आए थे ढूंढते-ढूंढते, फिर हम उन्हीं के होके रह गए।

लोहिया के जबरदस्त उद्धरण

“आधुनिक अर्थव्यवस्था के माध्यम से ग़रीबी को दूर करने के साथ, ये अलगाव (जाति के) अपने आप ही ग़ायब हो जाएंगे।

“बहस करो, विमर्श करो, वोट करो।”

प्रकृति का नियम जो भी हो, मनुष्य का नियम होना चाहिए समता।

“बुराई को ख़त्म करने के लिए बुराई को पहचानना होता है”।

“नेताओं को कीमती मत बनाओ, क्योंकि कीमती नेता बेईमान होता है”।




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