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रिपोर्ट

दलित बेटी का दुष्कर्म कर हत्या करने वाले दरिंदों को सजा दिलवाने के लिए भटक रहा परिवार

बेटी की मौत और बलात्कार के गुनहगारों को सज़ा दिलवाने के लिए दर-दर की ठोकरें खाने के बाद जब मायूसी हाथ लगती है तो दिल पर क्या बीतती है, यह सुक्रमपाल ही महसूस कर सकते हैं। पिछले साल 6 दबंगों ने उनकी बेटी से सामूहिक दुष्कर्म किया, जिसके कारण अगले ही दिन 8 मई को उनकी बेटी ने दम तोड़ दिया था। बेटी की मौत के बाद इंसाफ मांगने वाले सुक्रमपाल को हर रोज़ मौत की धमकियों और प्रशासन की अनदेखियों का सामना करना पड़ रहा है।

उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के भुराहेड़ी गांव में पिछले साल 8 मई को जो हुआ, वह दिल दहला देने वाला था। करीब 8 महीने बीत जाने के बाद भी मुख्य आरोपी संदीप और चार अज्ञातों की अभी तक गिरफ्तारी नहीं हुई है। पीड़ित परिवार से बातचीत करने के लिए 16 जनवरी को मुजफ्फरनगर से पुरकाज़ी होकर हमारी टीम “कारवां ए मोहब्बत” भुराहेड़ी पहुंची। भुराहेड़ी की भीड़ी सी(तंग) गली में पीड़ित परिवार का सिर्फ एक कमरे का आधा-अधूरा सा घर है जिस पर न अभी लिपाई हुई है, न पुताई। घर में खिड़कियां, जंगले, दरवाजे लगने अभी बाकी हैं। घर के आंगन में पीड़ित परिवार, औरतें और कुछ नौजवान  पहले से ही हमारा इंतज़ार कर रहे थे। हमें देखकर लड़की के पिता सुक्रमपाल की आंखों में हल्के से आंसू आ जाते हैं, जिन्हें वह कई देर तक बहने नहीं देते। सुक्रमपाल से घटना के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया,

“मेरी बेटी की मौत से एक दिन पहले 8 मई की सुबह मैं तो रेहड़ा चलाने के लिए घर से चला गया था। मेरे जाने के बाद नेहा(काल्पनिक नाम) घर पर अकेली थी। हमारी पड़ौसन मालती उसे बहला-फुसलाकर अपने साथ खेतों में मज़दूरी के लिए ले गई। इससे पहले मेरी बेटी कभी मज़दूरी के लिए नहीं गई थी और न ही मैं उसे कभी भेजना चाहता था। नेहा जब मालती के साथ मज़दूरी करने के लिए खेतों में पहुंची तो वहां कुलदीप, संदीप और चार अज्ञात लोग पहले से ही मौजूद थे। कुलदीप और संदीप समेत इन चारों अज्ञात लोगों ने दिनभर नेहा के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया और शाम को उसे घर फेंककर लापता हो गए। शाम को जब मैं दिहाड़ी कर वापस घर आया तो मैंने देखा कि मेरी बेटी कमरे में चारपाई के नीचे पड़ी हुई है, उसके कपड़े मिट्टी में सने हुए हैं और वह पेट को पकड़कर रो रही है। नेहा को नीचे पड़ा देख मैंने उसे उठाकर खाट पर लेटा दिया और रोने का कारण पूछा। नेहा ने बताया कि उसका पेट दुख रहा है। मैंने उससे कपड़ों पर मिट्टी लगे होने का कारण भी पूछा तो नेहा ने बताया कि वह दिन में मालती के साथ मज़दूरी करने खेतों में गई थी, इस वजह से उसके कपड़े सने हुए हैं। थोड़ी देर तक चुप रहने के बाद नेहा ने हल्की सी आवाज़ में मुझे फिर बताया कि जब वह खेत के गई तो वहां कुलदीप, संदीप और चार अनजान लोगों ने उसके साथ छेड़छाड़ की थी।”

इतना बताकर सुक्रमपाल की आंखों से आंसू छलक गए। आंसू पोंछकर सुक्रमपाल ने दोबारा बोलना शुरू किया,

“मैं तो यह सब सुनकर चुपचाप कमरे से बाहर आकर सो गया। मुझे लगा कि उन लोगों ने लड़की को कुछ उल्टा-सीधा बोल दिया होगा। पेट दर्द के लिए सुबह डॉक्टर के पास ले जाऊंगा। पर सुबह जब मैंने नेहा को आवाज़ लगाई तो उसका कोई जवाब ही नहीं आया। वह चारपाई पर बेसुध होकर पड़ी हुई थी। उसे इस हालत में देखकर मैं दौड़कर पड़ौस की महिलाओं को बुला लाया। पड़ौस की औरतों ने मुझे बताया कि मेरी बेटी पूरी(मर) हो चुकी है। इतना कहकर औरतें उसका अंतिम संस्कार करने की तैयारियां करने लगीं। मैंने उसके मृत शरीर को देखा तो मुझे उसकी गर्दन पर कई निशान दिखाई दिए। उसके हाथों पर भी कई निशान थे। शरीर के निशान देखकर मुझे शक हुआ। इसलिए मैंने उसका अंतिम संस्कार रुकवा दिया और पुलिस को बुला लिया। पुलिस से सारी बात बताने के बावजूद भी पुलिस हमारे ऊपर अंतिम संस्कार का दबाव डालने लगी। लेकिन हम सब नहीं माने और पुलिस से काफी लड़ने-झगड़ने के बाद बेटी का पोस्टमार्टम हुआ।”

इतना कहकर सुक्रमपाल की आंखों से दोबारा आंसू बह निकले। सुक्रमपाल सुन्न होकर नीचे देखने लगे। इसी बीच वहां खड़े नौजवानों में से एक नौजवान ने बताया कि गांव के सभी दलित परिवार उस रात इकट्ठा हो गए थे। लेकिन गांव में भारी मात्रा में पुलिस फ़ोर्स आ गयी और लोगों के साथ मारपीट कर नेहा का जबरदस्ती दाह संस्कार करवा दिया। सुक्रमपाल 3 बार सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ से मिलने जा चुके हैं लेकिन हर बार इन्हें खाली हाथ वापस लौटना पड़ा है। इस घटना के 5 आरोपियों की अभी तक गिरफ्तारी नहीं हुई है और पुलिस इन पर बार-बार समझौते का दबाव बनाती रहती है।

एनसीआरबी द्वारा साल 2018 में जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार पिछले एक दशक में दलित उत्पीड़न के मामलों में 66% बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा हर रोज 6 दलित महिलाओं के साथ देश में दुष्कर्म के मामले सामने आते हैं और यह साल 2007 की तुलना में दोगुना है। पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे “कारवां-ए-मोहब्बत” के हमारे साथी सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मन्दर बताते हैं,
“हिंदुस्तान में आज भी सवर्ण जाति के लड़के दलित लड़कियों को अपने इस्तेमाल की चीज़ समझते हैं, दलित लड़कियों को छेड़ने और हिंसा करने को अपना हक़ मानते हैं। शर्म की बात है कि अभी तक इस मानसिकता को खत्म नहीं किया जा सका है। उस 15 साल की लड़की के पिता के सीने में कई तरह के दर्द पल रहे हैं। अपनी बेटी के दुखद अंत का दर्द, गरीबी का दर्द और उनकी लाचारी का दर्द। हमारे लिए यह भी शर्म की बात है कि अभी तक पीड़ित परिवार को न्याय नहीं मिला है। ऐसे में हम सभी को मिलकर उस परिवार की हर संभव कोशिश करने की जरूरत है।”

देश में दलित महिलाओं के प्रति इस तरह के जघन्य अपराध अक्सर देखने में आते हैं। दलित महिलाओं के मामले में सरकार की उदासीनता पर सवाल उठाने वाला कोई नहीं बचा है। अक्सर देखने में आता है कि जहां भी इस तरह की घटनाएं होती हैं, वहां के नेता और प्रशासन आरोपी के पक्ष में खड़े हो जाते हैं। पीड़ितों को समझौते करने के लिए थाने से लेकर हमारा समाज खूब तंग करता है।

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