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प्रिय रवीश, राहुल गांधी से रवीश के अंदाज़ में बातचीत नहीं हो पाई!

अजय कुमार

हिंदी टीवी की दुनिया में रवीश मेरे प्रिय एंकर हैं। इसकी बड़ी वजह यह है कि जिस तरह के मुद्दे वह उठाते हैं। वह आम जन से जुड़े हुए होते हैं। जिस तरह से वह अपनी बात रखते हैं उसमें जन पक्षधरता की आवाज सुनाई देती है, उन शब्दों का सहारा होता है जिससे किसी भी आम इंसान तक पहुंचा जा सके। उस लहजे का इस्तेमाल होता है जिससे आम आदमी छूटता हुआ न दिखे।

अब प्रिय एंकर हैं तो अपनी जिम्मेदारी भी बनती है कि कभी -कभार थोड़ी बहुत असहमति भी जता दी जाए। अभी राहुल गाँधी के साथ उनके इंटरव्यू के चर्चे सोशल मीडिया की गलियों में पसरते देखा। थोड़ा अजीब लगा। मोदी जी के इंटरव्यू के चर्चे सुनकर पत्रकारिता के विद्यार्थी होने के नाते पहला सवाल तो यही उठता था कि पांच सालो में कोई इंटरव्यू नहीं और अचानक से चुनाव के अंतिम समय पर इंटरव्यू , आखिकराकर यह मामला है क्या?

मामला साफ़ है कि सवाल-जवाब चाहे जो मर्जी हो दिन भर टीवी पर मोदी जी दिखते रहे। यही बात राहुल गांधी पर भी लागू हुई। सवाल-जवाब चाहे जैसे हो राहुल गाँधी अब टीवी पर दिखना चाहते हैं। यह बात रवीश जैसे पत्रकार ने सेकंडो में पकड़ ली होगी। इसलिए शायद अंतिम समय में यह सवाल पूछ ही लिया कि इतने लेट से इंटरव्यू क्यों?

आसान भाषा में अंतिम समय में इंटरव्यू वाले इस पहलू को ऐसे समझिये कि राहुल गांधी राजनीति की वजह से हमारे चर्चा का विषय बने रहते हैं। सब लोग में एक तरह की जिज्ञासा है कि वह राहुल गांधी को सवाल जवाब के जरिये सुने और समझने की कोशिश करे। लेकिन ऐसा होता नहीं है।

जिसका साफ़ मतलब है कि एक लम्बे समय के बाद जब भी वह इंटरव्यू देंगे तो उन से बहुत कम समय में बहुत सारे सवाल पूछे जाएंगे। जिसमें काउंटर सवाल का स्कोप पूरी तरह से गायब हो जाएगा। इसका फायदा यह है कि कोई भी लफ्फाजी बिना बोरियत के उस वक्त मंत्रमुग्ध ढंग से चलेगी, जब मजबूरन एक बहुत बड़ी जमात राहुल गाँधी में संभावनाएं देखने की कोशिश करे। कहने का मतलब यह है कि जनता की बात करने वाले रवीश जैसे पत्रकार नेता से बात करे और काउंटर सवाल का स्कोप खो जाए तो बात तो खलती है।

रवीश को सुनने वाले यह जरूर जानते होंगे कि वह कुछ ऐसी बातें भी करते हैं जिससे यह समझा जाए कि राजनीतिक व्यक्ति से किस तरह के सवाल करने हैं? जैसे उनका बड़ा फेमस डायलॉग है कि जनता को पूछना चाहिए कि कि वह हेलीकाप्टर से उड़ने के पैसे आते कहाँ से हैं?

यह भारतीय राजनीति का एक ऐसा सवाल है जिसका सिरा पकड़कर आप किसी भी नेता की चमड़ी के भीतर घुस सकते हैं। आपके पास एक मिनट का समय हो और किस भी बड़े नेता से सवाल पूछना हो तो इस सवाल से शुरुआत कीजिये कि पांच साल तैयारी करने के लिए और चुनाव लड़ने के लिए आपके इनकम का सोर्स क्या है? राहुल गांधी जी आपने वायनाड और अमेठी से लड़ने के लिए अपने पैसे का इंतज़ाम कैसे किया? आपकी पार्टी पांच साल किस तरह के पैसे से चलती है। कोई बहुत समय बाद इंटरव्यू दे रहा हो और रवीश जैसा पत्रकार सामने हो ,जिसे यह पता हो कि इस दुनिया की हर परेशानी की जड़ में यह है कि एक फीसदी लोगों के पास दुनिया के सारी सम्पति अटक जा रही है, और वह राहुल गांधी से यह सवाल ना पूछे कि चुनाव लड़ने के लिए पैसा आता कहाँ से है? तो बात खलती है।

अब रवीश के सवालों पर चलते हैं पहला सवाल इसके इर्द गिर्द कि आप किस विचारधारा के खिलाफ लड़ रहे है? राहुल गांधी का जवाब कि हमें संविधान बचाना है। कोई दूसरा पत्रकार होता तो कोई बात नहीं होती लेकिन रविश हैं इसलिए उम्मीद थी कि वह पूछेंगे कि संविधान बचाने के नाम पर आपकी पार्टी का ढांचा क्या है? आपकी पार्टी की इंटरनल डेमोक्रेसी क्या है?

क्या आपलोग किसी संविधान या विधान से चलते भी हैं या नहीं। कैसे राहुल गांधी के खिलाफ भीतर से कोई आवाज नहीं उठती? प्रियंका गांधी अचानक से जनरल सेक्रेटरी कैसे बन जाती हैं? क्या आपकी पार्टी के पास योग्य लोगों को बर्दाश्त करने की सभावनाएं हैं या सारी पार्टियों की तरह आपकी पार्टी को भी पिछलगू लोगों की जरूरत है। बस दो सवाल संविधान बचाने वाली सारी नियत का पोल खुल जाता। अगर इस सवाल का कोई जवाब नहीं है या राहुल गांधी खुद इसका उल्लेख नहीं करते हैं तो एक छोटे से इंटरव्यू में राहुल गांधी से नेहरू या गाँधी की विरासत संभालने की चर्चा की क्यों की जाए?

यह बात समझ में नहीं आयी। इसके बाद के कुछ सवालों में ऐसा लगा कि मोदी जी ने नेहरू और गांधी के नाम पर जनता के बीच जो जाल बिछाया है, रवीश कुमार उसी जाल से जनता के बीच मनोरंजन करवाने की कोशिश कर रहे हैं। यह बात कभी नहीं समझ में आएगी कि नेहरू और गांधी से जुड़े सवालों का जवाब देने की जिम्मेदारी केवल आज की खोखली हो चुकी कांग्रेस के पास क्यों होनी चाहिए? जबकि आज की कांग्रेस में आजादी की लड़ाई वाले कांग्रेस जैसा कुछ भी नहीं है।

राहुल गाँधी के जवाब में कई बार यह बात सुनाई दी कि ‘जनता जवाब देगी’। नेताओं का यह सबसे प्यारा जुमला है। वह अपनी जिम्मेदारी से भागने के लिए ऐसे जवाब अक्सर दिया करते हैं। इस जवाब से यह साफ़ सुनाई देता है कि जनता ने अगर हमें जीत दिला दी तो हमारे सारे गुनाह माफ़। रवीश ने तो कई बार यह बात कही है कि जीत की आड़ में नेता अपनी गुनाह छीपा लेते हैं। शायद भाजपा के प्रवक्ताओं के साथ ऐसी बात पर कुछ तीखी बहस भी की है। लेकिन राहुल गांधी से नामदार वाली बात करते हुए यह नहीं पूछा कि आप जैसे बहुत सारे नेता नामदार होते हैं, अपने परिवार के विरासत के दम पर आगे बढ़ते हैं, इनके चुनाव जीतने से यह परेशानी कैसे दूर हो जाएगी?

बाकी और भी सारी बातें हैं, जो उस इंटरव्यू में उस रवीश के अंदाज़ वाली नहीं थी, जिसे मैं पसंद करता हूँ। जैसे रवीश ने इस पूरे इंटरव्यू का खाका ऐसा बना दिया कि मौजूद सत्ता के विपक्ष में केवल कांग्रेस और राहुल गाँधी है. जबकि असलियत यह है कि इन पांच सालों के दौरान किसानी और बेरोजगारी जैसे विषयों पर असली लड़ाई सड़क के लोगों ने की है जिसका सबसे अधिक वामपंथी और समाजवादी रुझान वाले लोगों ने साथ दिया है। भारत के लोकतंत्र को बचाने के लिए संसदीय प्रणाली में विकेन्द्रीकरण और सांसदों की अहमियत पर बात करने वाले रवीश को राहुल गांधी से यह सवाल जरूर पूछना चाहिए था कि वह संविधान की किस भावना से वायनाड से चुनाव लड़ने जा रहे हैं और इन पांच सालों के दौरान उन्होंने अमेठी के लिए क्या किया?

इतना सब कहने के बाद भी मैं कहूंगा कि रवीश आज की टीवी की दुनिया में सबसे शानदार नाम हैं। मेरे जैसा विद्यार्थी उनसे सबसे अधिक सीखता है। साथ में प्रिय भी हैं, इसलिए असमहति भी जता दी।

राहुल गांधी और रवीश कुमार की बातचीत का वीडियो

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