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रिपोर्ट

बुनियादी जरूरतों व कर्ज़ के कारण फांसी झूलते किसान और नेताओं की बेशर्मियाँ

कविता

पंजाब के संगरूर जिले के गांव मौड़ा में 41 वर्षीय किसान बिक्रम जीत ने 12 लाख का सरकारी और गैर सरकारी कर्ज नहीं चुका पाने के कारण जहर पी लिया। किसान के पास दो एकड़ जमीन थी। गांव के सरपंच ने सरकार से पीड़ित परिवार का कर्ज माफ करने और उनके लड़के के लिए सरकारी नौकरी की मांग की है।

पिछले आठ नौ महीने से मैं एक अख़बार के साथ काम कर रही हूँ। पंजाब में लगभग हर हफ्ते एक या दो किसान सिर्फ कर्ज के कारण ख़ुदकुशी कर रहें है। इसके बाद गांव के सरपंच उनके परिवार के लिए सरकारी नौकरी और कर्जा माफ़ करने की डिमांड कर लेते है। जो की पूरी नही होती है। शायद मुमकिन भी न हो। क्योंकि हर कोई कर्ज लेगा ऐसे, अगर सब माफ़ होने लग जाए।

सवाल ये है कि इतनी ज़्यादा संख्या में किसान मर रहे हैं। जिसकी वजह आर्थिक तंगी और उसके बीच घर चलाने और बच्चों को बुनयादी जरूरतें मुहैया करवाने की है। जो की नहीं हो पा रहा है। छोटे किसान ही नहीं बड़े किसान भी इसी तरह कर्ज के नीचे दबे हैं। इनके सबके कारण जो मुझे लगते हैं वो निम्नलिखित हैं –

1) अगर कोई किसान समझदार है और अपने बच्चे पढ़ा रहा है तो वो उस शिक्षा का खर्च नहीं उठा सकते। क्योंकि अच्छे प्राइवेट स्कूल व सरकारी और गैर सरकारी कॉलेज की सालाना फीस एक लाख या इस से ऊपर जाती है। (सरकारी स्कूल भी सिर्फ बड़े शहरों के अच्छे हैं, जहां लोग जागरूक है) इसके लिए किसान कर्ज लेता है।

2) दूसरी सबसे बड़ी दिक्कत जो आती है, वो चिकित्सा की है। गांव में सरकारी अस्पताल ही नही है। अगर कहीं हैं तो वहां डॉक्टर नहीं है। इलाज के लिए सबको दूर दराज के जिलों में जाना पड़ता है। या प्राइवेट डॉक्टरों से माथा पच्ची करते हैं।

3) तीसरी जो की समस्या नहीं होनी चाहिए, फिर भी हमारे पूरे समाज की ही सबसे बड़ी समस्या है। जिसमे माँ बाप के उम्र भर की कमाई तो लगती ही है, साथ में कर्जदार भी हो जाते हैं वो है शादी। लड़के की हो तो फिर भी थोड़ा ठीक है, लड़की की हो तो घर साफ़ ही होता है। इसमें सब अपनी हैसियत से दोगुना करते हैं। क्योंकि लोगों की ऐसी अपेक्षा होती है। जिसे हम पूरा करते हैं।

4) ये हरियाणा और पंजाब की शायद ज्यादा है बाकी का मुझे पता नही है। जमींदारों में बड़ी कोठियों और गाड़ियों का क्रेज। पंजाब में एक और जोड़ लीजिए विदेश जाने का भूत सवार। जिनके लिए ज़मीनें बिक जाती हैं।

– ये सब वो कारण थे जिनके कारण ज्यादा कर्ज हो रहा है। जिसके उतरने की उम्मीद शायद कम ही होती है। क्योंकि मेरे 18 साल के भाई ने भी मुझे बोल दिया था कि मांडा (baby) किसान मतलब कर्जा और कर्जा मतलब किसानी। इसका कारण ये है कि किसान परिवार की पूरे साल में की गई मेहनत की कमाई खेतिहर मजदूर की कमाई के लगभग बराबर ही रहती है। मेरे इलाके में पूरे परिवार की मिलाके 20-25 हजार महीना। जो की दिन रात किए गए शारीरिक श्रम की कमाई हैं। जिसमें आप बीमारी का बहाना लगाके छुट्टी भी नही ले सकते। किसान को बस ये फायदा है कि उसे जमीन पर कर्ज आसानी से मिल जाता है। यही कारण है कि किसान का बेटा किसानी नहीं करना चाहता और अच्छी शिक्षा के अभाव में जो नौकरी नही मिल पाती सो अलग।

किसानों को अपनी बुनयादी चीज़ों बच्चों की शिक्षा, चिकित्सा, सड़क, बिजली, पानी इन सबमें सुधार चाहिए। जिससे उनके परिवारों की परेशानियां थोड़ी कम हो सकें। रिवाज के नाम पर हो रहे मानसिक शोषण से निजात चाहिए। जिनके लिए ये सब सरकारें कुछ नहीं कर रही हैं। साल के 6000 या 72000 से किसानों का कर्ज नही उतरेगा न ही कम होगा। हमें इन सब तरह के पैंतरों जो की सत्ता हासिल करने के चक्कर में दिए जाते हैं, से आगे बढ़कर अपने हक़ की मांग करनी है।

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