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संसद में धार्मिक नारेबाजी करने वालों ने पटेल, नेहरू, अम्बेडकर के सपनों पर आघात किया है

कृष्णकांत

संसद में धार्मिक नारेबाजी करने वालों ने पटेल, नेहरू, अम्बेडकर के सपनों पर आघात किया है. यह आघात भारत और भारतीय संविधान की मूल आत्मा पर हुआ है.

आज दो दिन से भारतीय संसद में जो हो रहा है वह अम्बेडकर, नेहरू और पटेल तमाम राष्ट्र निर्माताओं के भारत के विचार को कुचलने जैसा है. सांसदों की शपथ के दौरान संसद में जय श्रीराम, जय काली और अल्लाह हो अकबर नारा लग रहा है.

हर किसी की आस्था सम्माननीय है, लेकिन संसद को धर्मस्थल बनाना खतरनाक है। जो इतने बड़े पुजारी और भक्त हैं तो वे संसद में गए क्यों हैं? संसद लंपटता की सैरगाह नहीं है, वह 137 करोड़ भारतीयों का प्रतिनिधित्व करती है.

नेहरू के बारे में भगत सिंह ने लिखा है, ‘प्रान्तीय कान्फ्रेंस की विषय समिति में मौलाना जफर अली साहब के पांच-सात बार खुदा-खुदा करने पर अध्यक्ष पण्डित जवाहरलाल ने कहा कि इस मंच पर आकर खुदा-खुदा न कहें. आप धर्म के मिशनरी हैं तो मैं धर्महीनता का प्रचारक हूं.’

नेहरू जैसा साहस तो आज किसी में है नहीं, लेकिन पिछले 70 साल से चली आ रही संसदीय मर्यादा को भी भंग किया जा रहा है.

आजादी मिलने के बाद कट्टर हिंदूवादियों ने गांधी की हत्या कर दी. इसके बाद सरदार पटेल ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया. इस पर नेहरू सरदार पटेल को पत्र लिखते हैं कि ‘जनता में ऐसा संदेश नहीं जाना चाहिए कि हम दमन का सहारा ले रहे हैं. गिरफ्तारियां कम से कम होनी चाहिए.’ वे लोकतंत्र के निर्माण की प्रक्रिया में कोई व्यवधान नहीं चाहते लेकिन वे धर्मांधता बर्दाश्त नहीं करने के लिए प्रतिबद्ध थे. धर्मांधता ने ही इस देश को तोड़ा था. अब जब गांधी नहीं थे, तब नेहरू और पटेल अपने लाव-लश्कर के साथ धर्मांधता और सांप्रदायिकता से लड़ रहे थे.

आजादी और गांधी की हत्या के बाद नेहरू बार-बार दोहरा रहे थे कि ‘धर्मनिरपेक्ष राज्य के अतिरिक्त अन्य कोई राज्य सभ्य नहीं हो सकता’, जिस समय नेहरू कह रहे थे कि ‘यदि सांप्रदायिकता को खुलकर खेलने दिया गया, तो यह भारत को तोड़ डालेगी’ उसी समय सरदार पटेल कांग्रेस के जयपुर अधिवेशन में घोषणा कर रहे थे कि ‘कांग्रेस और सरकार इस बात के लिए प्रतिबद्ध हैं कि भारत एक सच्चा धर्मनिरपेक्ष राज्य हो.’

जवाहरलाल नेहरू, 1951 में गांधी के जन्मदिवस पर अपनी एक सभा में कहते हैं, ‘यदि कोई व्यक्ति धर्म के नाम पर किसी अन्य व्यक्ति पर प्रहार करने के लिए हाथ उठाने की भी कोशिश करेगा, तो मैं उससे अपनी जिंदगी की आखिरी सांस तक सरकार के प्रमुख और उससे बाहर दोनों ही हैसियतों से लडूंगा.’

जिस धर्मनिरपेक्षता को नेहरू आगे बढ़ा रहे थे, उसे गांधी और कांग्रेस समेत सभी प्रमुख क्रांतिकारियों का समर्थन प्राप्त था. धर्मनिरपेक्षता हमारी राष्ट्रीय विरासत है, जिसे इंदिरा गांधी ने मजबूत करने की जगह कमजोर किया. बाद की कांग्रेस और अन्य कथित धर्मनिरपेक्ष दलों ने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर तुष्टिकरण को हवा देकर इस शब्द को कलंकित किया. भाजपा ने इसका लाभ लिया और मुस्लिम तुष्टिकरण के जवाब में बहुसंख्यक हिंदू तुष्टिकरण की चाल चली. कल कांग्रेस सफल हुई, आज भाजपा सफल है, लेकिन राष्ट्रीय आंदोलन की भावना असफल ही रही है. तुष्टिकरण से न मुसलमानों का कोई लाभ हुआ, न हिंदुओं का होगा. क्योंकि नेहरू के शब्दों में कहें तो धर्मनिरपेक्ष राज्य के अतिरिक्त अन्य कोई राज्य सभ्य नहीं हो सकता. इस भावना को कमजोर करना ‘आइडिया आॅफ इंडिया’ को कमजोर करना है.
नेहरू को गाली देने से आगे जाकर अब एक धर्मनिरपेक्ष राज्य जो हमें विरासत में मिला है, उसे लिंचिंग तंत्र और धर्म सभा में तब्दील किया जा रहा है.

नरेंद्र मोदीजी प्रचंड बहुमत के साथ इस देश को संवारने की जगह ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ को ध्वस्त कर रहे हैं.

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