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रिपोर्ट

भोपाल गैस त्रासदी: जिनका कोई नहीं था उनके थे जब्बार भाई

महताब आलम

भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ित को इन्साफ़ दिलाने के लिए संघर्ष करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल जब्बार का जुमेरात (बृहस्पतिवार) को इंतिक़ाल हो गया। वो भोपाल गैस पीड़ित के हक़ में काम करने और उनको इज़्ज़त के साथ ज़िंदगी बसर करने लिए लड़ना सिखाने वाली की एक तंज़ीम,भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के रूह-ए-रवाँ थे। उनकी ज़िंदगी का मोटो था, ‘संघर्ष और निर्माण’ यानी, अपने हुक़ूक़ के लिए जद्द-ओ-जहद/ संघर्ष करने के साथ ऐसे काम भी करना जिससे आप ख़ुद-मुख़्तार बन सकें और किसे के सामने आपको हाथ ना फैलाना पड़े।

इसी मक़सद के तहत उन्होंने ‘स्वाभिमान केंद्र” के नाम से एक ट्रेनिंग सेंटर भी क़ायम किया था जहां लोगों को आर्थिक तौर पर अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया जाता था। वो हुकूमत से मुआवज़ा का मुतालिबा करते वक़्त ये वाज़िह कर देते थे कि मुआवज़ा पीड़ित का हक़ है ना कि कोई ख़ैरात। यही वजह है कि उनकी रैलीयों में ‘ख़ैरात नहीं ,रोज़गार चाहिए’ और ‘हम अपना अधिकार (हक़) मांगते, नहीं किसी से भीख मांगते’ के नारे लगाए जाते थे।

मामूली क़द-काठी और ग़ैरमामूली हिम्मत और बुलंद क़ुव्वत इरादी वाले अब्दुल जब्बार हर ख़ास-ओ-आम में जब्बार भाई के नाम से मक़बूल थे।वो ख़ुद दिसंबर 1984 में होने वाले गैस त्रासदी के पीड़ितों में से थे। इसी हादिसे की वजह से जब्बार भाई ने अपनी माँ, पिता और एक भाई को खो दिया था। ख़ुद उनके आँखों की 60 फ़ीसद बीनाई/रौशनी चली गई थी । लेकिन इन तमाम चीज़ों ने उनके अज़ाइम को कम नहीं होने दिया। वो पिछले 35सालों से बिना थके, बिना डरे काम कर रहे थे। उनकी मक़बूलियत का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि भोपाल में मशहूर था कि जिस गैस पीड़ित का कोई नहीं है इस के जब्बार भाई हैं। उन्होंने शायद ही कभी किसी गैस पीड़ित को मायूस किया हो।

इस के बावजूद उनसे और उनके काम से बहुत कम लोग ही वाक़िफ़ थे। इसकी बुनियादी वजह ये है कि वो सिर्फ और सिर्फ अपने काम में दिलचस्पी रखते थे और मीडिया से ज़रूरत भर वास्ता रखते थे। पैसा और शौहरत को वो दूर से ही सलाम करते थे। मुझे याद पड़ता है कि 2009 में जब भोपाल गैस ट्रेजडी की 25वीं बरसी मनाई जा रही थी और जगह जगह इसको लेकर प्रोग्राम्स हो रहे थे और दिल्ली में किसी हद तक मैं भी इस सिलसिले में सरगर्म था तो जब्बार भाई का नाम ना कि बराबर ही सुनाई देता था।हक़ीक़त तो ये है कि ज़्यादातर दिल्ली और दूसरे बड़े शहरों वालों की तरह मैं भी तब तक उनसे और उनके काम से नावाक़िफ़ था। कोई पाँच साल पहले मैं उनके काम से वाक़िफ़ हो पाया।

लेकिन जैसे-जैसे उनके बारे में पता चलता गया ऐसा महसूस होने लगा कि जब्बार भाई की शख़्सियत और अज़म-व-हौसले के सामने सब बौने हैं। ऐसा लगने लगा कि जितना जल्दी मुमकिन हो उनसे मुलाक़ात का सौभाग्य प्राप्त करना चाहिए। अपने इसी ख़्वाहिश के तहत मैंने दिसंबर 2017 में भोपाल का सफ़र किया। उनसे मुलाक़ात करवाने में हमारे दोस्त और सीनीयर सहाफ़ी, शम्सुर्रहमान अलवी ने मदद की। जब्बार भाई से मुलाक़ात से पहले मेरी उनसे सिर्फ एक दो बार फेसबुक पर बातचीत हुई थी। लेकिन जब उनसे मुलाक़ात हुई तो वो जिस वालहाना अंदाज़ में मिले ऐसा लगा मानो अपने किसी बहुत पुराने दोस्त से मिल रहे हूँ। बाद में मालूम हुआ कि यही उनका अंदाज़ है और शायद यही वजह है कि जो कोई भी उनसे एकबार मिल लेता उनका गरवीदा हो जाता।

अपने तीन दिन के भोपाल प्रवास के दौरान में उनसे कोई तीन मुलाक़ातें हुईं। पहली मुलाक़ात में उनसे गैस मुतास्सिरीन के मसाएल और दूसरे चीज़ों पर तफ़सील से बातें हुई। इस के बाद उन्होंने कहा कि हम लोग एक वक़्त खाना खाने जाऐंगे और तय पाया कि अगले दिन दोपहर का खाना साथ खाएँगे और वो उस दिन मुझे अपनी स्कूटी पर बिठाकर अपनी पसंदीदा बिरयानी की दुकान पर ले गए, साथ में शम्स भाई भी थे। यहीं बातचीत के दौरान पता चला कि उनका आबाई वतन पंजाब था।

वो कई दफ़ा अपने आबाई वतन जाने का प्लान बनाते लेकिन जाना मुमकिन नहीं हो पाता। इस की वजह ये थी कि ना तो उस के लिए उनके पास वक़्त था और ना ही वसाइल/ रिसोर्सेज। मगर ख़ुद्दारी का आलम ये था कि वो किसी से कह नहीं सकते थे कि अपनी ज़ाती ज़रूरीयात के लिए मुझे पैसा चाहिए। पिछले कुछ सालों में उनकी सेहत लगातार बिगड़ती रही, कई दफ़ा हॉस्पिटल में भर्ती हुए और माली तंगी के शिकार रहे लेकिन कभी किसी से मुतालिबा नहीं किया और ना ज़बान पर कोई हर्फ़-ए-शिकायत कि -लोग उनकी मदद क्यों नहीं करते। वो चाहते तो आसानी से अपने लिए, अपने घर वालों के लिए और अपने ईलाज के लिए पैसों का इंतिज़ाम कर सकते थे।लेकिन ऐसा करना उन्होंने मुनासिब नहीं समझा क्यों कि ये उनके उसूलों के ख़िलाफ़ था।

जब्बार भाई सिर्फ गैस मुतास्सिरीन के हुक़ूक़ के लिए संघर्षत नहीं थे। वो हर तरह के ज़ुलम-व-जबर के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने में यक़ीन करते थे। भोपाल में शायद ही कोई अवामी तहरीक हुई हो जिसमें वो शरीक नहीं हुए हूँ।बाबरी मस्जिद को तोड़े जाने के बाद जब भोपाल में सांप्रदायिक हुआ तो उन्होंने उस वक़्त घर-घर जा कर अमन-व-अमान की अपील की, सांप्रदायिक सद्भाव के लिए काम किया। उस वक़्त की हुकूमत, जिसके ख़िलाफ़ वो आए दिन मोर्चे निकालते थे, एहतिजाज करते थे, उनके साथ मिलकर शहर के हालात पर क़ाबू पाने की कोशिश की। वो ताहयात फ़िरक़ापरस्त ताक़तों से लड़ते रहे। उनके नज़दीक सबसे क़ीमती इंसानी जान थी। जिसको बचाने के लिए वो ज़िंदगी-भर काम करते रहे, यहां तक की अपने जान की वास परवाह नहीं की।

अभी 20 सितंबर की ही बात है कि उन्होंने अपने फेसबुक पर किसी का ये स्टेटस शेयर किया था :

जिस तरह लोग मुर्दा इन्सान को कंधा देना सवाब का काम समझते हैं, काश इसी तरह ज़िंदा इन्सान को सहारा देने को भी हम सवाब समझने लगे तो ज़िंदगी आसान हो जाएगी।

शायद, हमारे लिए जब्बार भाई का यही आख़िरी पैग़ाम था। उम्मीद है कि हम उनके इस पैग़ाम पर अमल करेंगे और उनके काम को आगे बढ़ाएंगे।

महताब आलम द वायर उर्दू के संपादक हैं। ये स्मृति लेख उनके उर्दू लेख का हिंदी/देवनागरी लिप्यांतरण है। मूल उर्दू लेख यहाँ द वायर उर्दू पर पढ़ा जा सकता है : http://thewireurdu.com/72669/remembering-abdul-jabbar-bhoal-gas-tragedy-activist/

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