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रिपोर्ट

झारखंड में 14% मुस्लिम आबादी होने के बावजूद किसी मुस्लिम को नहीं मिला लोकसभा टिकट

झारखंड में भारत ही नहीं बल्कि दुनिया की 7 प्रतिशत खनिज संपदा मौजूद है। यहां की मिट्टी देश को अरबों का राजस्व प्रदान करती है। लेकिन एक स्वतंत्र राज्य बनने के बाद भी झारखंड दशकों से राजनीतिक रूप से एक निर्वात की स्थिति में रह रहा है।

राज्य में धार्मिक और जातिगत प्रतिनिधित्व दिशाहीन दिखाई पड़ती है। यहां 14 लोकसभा सीट हैं, जिनमें से 6 सीटें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए सुरक्षित रखी गई हैं। ये आरक्षित सीटें राजनीतिक पार्टियों की मजबूरी है। राजनीतिक पार्टियों के लिए इन सभी सीटों पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार को मैदान में उतारना अनिवार्य है। इन आरक्षित सीटों के अलावा बचे आठ सीटों पर किसी भी दल ने (मुख्य रूप से राजग और महागठबंधन) ने किसी भी दलित और आदिवासी चेहरे को अपना उम्मीदवार घोषित नहीं किया है।

झारखंड विकास मोर्चा के संस्थापक बाबूलाल मरांडी इसमें अपवाद हैं, बाबूलाल मरांडी राज्य के एक मात्र ऐसे आदिवासी नेता हैं जो आरक्षित सीट के बिना जनता के बीच हैं। बाबूलाल की अपनी पार्टी है और कोडरमा ज़िला में उनका अपना जनाधार है। यही कारण है कि वो खुद कोडरमा से चुनावी मैदान में हैं। आरक्षित सीटों के कारण दलित और आदिवासी प्रत्याशी तो मैदान में देखने को मिल भी रहे हैं, लेकिन राज्य में सबसे खराब स्थिति 14 प्रतिशत जनसंख्या वाले मुसलमानों की है।

झारखंड की 14 सीटों के लिए राजग और महागठबंधन ने 27 उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर दी है। लेकिन इन 27 उम्मीदवारों में सूबे की 14 प्रतिशत जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक भी मुस्लिम चेहरा चुनावी रण में मौजूद नहीं है।

राज्य के 14 लोकसभा सीट में से जिस हजारीबाग लोकसभा सीट पर कांग्रेस द्वारा प्रत्याशी के नाम का इंतज़ार था, वह भी अब साफ हो गया है। कांग्रेस ने हजारीबाग सीट से गोपाल साहू को अपना उम्मीदवार घोषित किया है।

देश में हुए साल 2011 की जनगणना के बाद झारखंड में मुसलमानों की जनसंख्या 14 प्रतिशत से कुछ अधिक बताई गई थी। झारखंड के गिरिडीह ज़िले में पूरे राज्य के सर्वाधिक लगभग 5 लाख मुसलमान रहते हैं। वहीं पाकुड़ में 35 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की है। मगर प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर वो शून्य दिखाई पड़ते हैं।

राज्य के 81 विधानसभा सीटों में केवल 2 मुसलमान विधायक हैं। जामताड़ा से इरफान अंसारी और पाकुड़ से आलमगीर आलम, दोनों ही कांग्रेस की टिकट पर जीत दर्ज कर विधानसभा पहुंचे।

ऐसा नहीं है कि झारखंड में मुस्लिम नेता कभी जीतते नहीं आए हैं। गिरिडीह से सरफराज अहमद गोड्डा से फुरकान अंसारी कई बार चुनाव जीत चुके हैं। इसके अलावा भी राज्य में कई ऐसे नेता हैं जो टिकट की दौड़ में शामिल रहे हैं।

धनबाद से राज्य सरकार के पूर्व मंत्री मन्नान मल्लिक, गोड्डा से झामुमों के नेता हाजी हुसैन अंसारी, गिरिडीह से सरफराज अहमद, सबा अहमद जैसे नेता लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं और लड़ने की ताकत भी रखते हैं।

हालांकि बीजेपी के पास झारखंड में कभी मुस्लिम चेहरा नहीं रहा, न ही बीजेपी ने कभी किसी मुस्लिम प्रत्याशी को चुनाव में खड़ा करने का प्रयास किया। लेकिन विधानसभा चुनाव में झामुमों ने लगभग आधे दर्जन और कांग्रेस ने चार मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में उतारा था जो कि उनके आबादी से काफी कम थी।

चल रहे लोकसभा चुनाव में महागठबंधन की तरफ से एक भी मुस्लिम प्रत्याशी को टिकट नहीं मिलने के बाद झारखंड भी गुजरात जैसा प्रदेश बनता जा रहा है, जहां वर्ष 1984 के लोकसभा चुनाव के बाद से अबतक एक भी मुस्लिम सांसद नहीं बन पाए।

पिछले यानी की 2014 के लोकसभा चुनाव में मात्र 23 मुस्लिम सांसद चुनकर संसद पहंचे थे। मगर 17 वीं लोकसभा चुनाव में यह आंकड़ा और कम होने की संभावना देखी जा रही है। इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जेक्टिव स्टडीज की रिपोर्ट भले ही यह दावा करे कि मुस्लिमों के विधायिका में कम हो रही संख्या का कारण परिसीमन है, लेकिन समाज विज्ञानी शफीक रहमान का यह तर्क, कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को अनुसूचित जाति और जानजाति के लिए सुरक्षित कर देने के कारण ऐसी समस्या हो रही है। राजनीति के चाल चरित्र को देखकर कागजी लगता है।

राजनीतिक दल मुस्लिमों के प्रतिनिधित्व के मुद्दे को लेकर अगर सच में गंभीर होते तो 1 प्रतिशत ब्राह्मण मतदाता वाले क्षेत्र “धनबाद” में यदि ब्राह्मण उम्मीदवार खड़ा कर सकते हैं तो फिर मुस्लिम बहुल क्षेत्र में मुस्लिम उम्मीदवार देने में आखिर उन्हें क्या परेशानी है?

जब भी मुस्लिमों के टिकट की बात आती है तो सबसे पहले मुस्लिम बहुल क्षेत्र की तरफ ध्यान जाना, देश की एकता और अखंडता के लिए काफी खतरनाक साबित हो सकता है। अगर आबादी को ही आधार मान कर टिकट बांटा जाएगा तो फिर आर्थिक रूप से प्रभुत्व जाति के लोगों की तरफ से प्राप्त की जाने वाली लगभग 25-30 प्रतिशत टिकट का क्या आधार है?

झाऱखंड के साथ-साथ देश भर में टिकट बंटवारे में मुस्लिमों की उपेक्षा एक बात साफ-साफ बता रही है कि विपक्षी पार्टी भी कहीं न कहीं संघ परिवार के सेट किए गए एजेंडे में फंसती जा रही है। सभी दलों को इस बात का डर है कि अगर वो मुस्लिम प्रत्याशी देते हैं तो उनके विरोध में हिन्दू मतों का ध्रुवीकरण होगा।

अगर लगातार ऐसे ही हालात बने रहे तो भारतीय संसद में मुसलमानों की संख्या शून्य पर पहुंच जाएगी। तो फिर मुस्लिमों के लिए भी आरक्षित सीटों की मांग किसी राजनीतिक दलों द्वारा उठाया क्यों नहीं जा रहा है?

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