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धनतंत्र में तब्दील होता लोकतंत्र: क्या हमारी संसद करोड़पति सांसदों का क्लब बन गई है?

आम लोगों में ये एक आम धारणा है कि सामान्य आदमी के लिए चुनाव नहीं होता। कोई हिम्मत हिमाकत करके लड़ भी ले तो चुनाव जीतना तो दूर वो अपनी जमानत तक नहीं बचा सकता। अमूमन गांव पंचायत के चुनावों में जीतने वाला प्रत्याशी 7-15 लाख रुपए खर्च करता है। लोकसभा चुनावों के लिए प्रचार सामग्री तो और भी मँहगी हो गई है। सवाल उठता है कि क्या मौजूदा वक़्त में, मौजूदा व्यवस्था में मजदूर मेहनतकश वर्ग का कोई गरीब आदमी संसदीय चुनाव लड़कर जीत सकता है। 5-7 हजार रुपए मासिक की आमदनी वाले मजदूर को तो चुनाव में खड़े होने के लिए ही सौ बार सोचना पड़ेगा। क्या किसी गरीब ईमानदार, दल-विहीन व्यक्ति के लिए इस लोकतंत्र में कोई जगह बची है।

ऊँची जमानत राशि
चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव 2019 में नामांकन पत्र दाखिल करने वाले सामान्य श्रेणी के प्रत्याशियों को 25 हजार रुपए जबकि एससी-एसटी वर्ग के प्रत्याशियों के लिए 12.5 हजार रुपये की जमानत राशि जमा करवाना निर्धारित किया है। निजी कंपनियों के मजदूरों की औसत आय 7-12 हजार रुपए मासिक होती है। जबकि NSSO रिपोर्ट के मुताबिक किसानों की औसत मासिक आय 10 हजार रुपए से भी कम है।

इसके साथ ही निर्दलीय प्रत्याशियों को दस प्रस्तावक भी देने होगें, जबकि राजनीतिक दलों के प्रत्याशी को एक प्रस्तावक की ही आवश्यकता होगी। चुनाव आयोग का ये कदम दलीय राजनीति को प्रोत्साहित और निर्दलीय राजनीति को हतोत्साहित करने वाला है।

टिकटों का व्यापार
टिकटों का व्यापार होने लगा है। टिकट खरीदे बेंचे जाने लगे हैं। अधिकतर पार्टियां ये देखती हैं कि वो ऐसे चेहरे को टिकट दें जो अपना भारी भरकम चुनावी खर्चा खुद उठा सके। वहीं दूसरी ओर जिन पार्टियो को समुचित फंडिंग नहीं हो पाती वो इसकी भरपाई टिकटों को बेंचकर पूरी करती हैं। बहुजन समाज पार्टी पर हमेशा से ये आरोप लगता रहा है। बसपा से निकाले जाने के बाद मायावती सरकार में मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी ने खुलेआम ये बात कही थी कि बसपा सुप्रीमो करोंड़ो रुपए लेकर टिकट बेंचती हैं। जबकि राज्यसभा के लिए तीन सांसद भेजने के मुद्दे पर आम आदमी पार्टी में भी इस तरह की चीजें देखी गई हैं। जब पार्टी ने कुमार विश्वास का पत्ता काटकर दो पूंजीपति सुशील गुप्ता और एन डी गुप्ता को राज्यसभा भेजा था।

लोकसभा पहुंच रहे करोड़पति सांसद
एसोसिएशन डेमोक्रेटिक रिफार्म्स के आंकड़ो के मुताबिक 2014 के लोकसभा चुनाव में जीतकर 16वीं लोकसभा में पहुंचे 541 सांसदों में से 442 सांसद करोड़पति थे। इनमें से 15 सांसद अरबपति थे। यानि पिछले लोकसभा चुनाव में जीते हुए करोड़पति सांसदों का प्रतिशत 82 प्रतिशत था। जबकि 18 प्रतिशत सांसद लखपति थे। जबकि 2009 में चुनकर 15 वीं लोकसभा में पहुंचे करोड़पति सांसदों की संख्या 300 थी। उपर्युक्त आंकड़ों से स्पष्ट है कि कथित लोकतंत्र मुख्य स्तंभ विधायिका में किस तरह पूंजीपतियों और अमीरों का कब्जा होता जा रहा है।

2019 लोकसभा चुनाव में करोड़पति प्रत्याशी
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (एडीआर) ने लोकसभा चुनाव के विभिन्न चरणों में नामांकन करनवाले प्रत्याशियों के हलफनामे से बताया है कि 11 अप्रैल 2019 को हुए लोकसभा के पहले चरण चे चुनाव में कुल 410 प्रत्याशी करोड़पति हैं। जबकि 18 अप्रैल को दूसरे चरण में 13 राज्यों 97 लोकसभा सीटों/ लिए हुए मतदान में 427 उम्मीदवार करोड़पति हैं। वहीं तीसरे चरण के 115 लोकसभा सीटों के लिए होने वाले चुनाव में नामांकन करनेवाले लोगों में से 392 प्रत्याशी करोड़पति हैं।

पहले तीन चरणों के चुनावों में करोड़पतियों की संख्या से स्पष्ट अनुमान लगता है कि 17वीं लोकसभा में चुनकर जाने वाले माननीय किस वर्ग के लोग होंगे।

पूंजीपति हित बनाम लोकतंत्र
पूंजीपति अलग अलग तरह से अपने हितों के मुताबिक चुनाव प्रक्रिया को बाधित प्रभावित और संचालित करते रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में सत्ताधारी दल कांग्रेस को बुरी तरह से हराने में पूंजीपतियों की बहुत बड़ी भूमिका रही थी। दरअसल कांग्रेस द्वारा लाए गए जनकल्याणकारी योजना ‘मनरेगा’ ‘वन अधिकार अधिनियम 2006’, ‘संशोधन नियम 2012’ और ‘सूचना का अधिकार’ से पूंजीपतियों के हितों में बड़ी बाधा पहुंची थी। मनरेगा योजना के लागू होने के बाद से ही लगातार पूंजीपति इस योजना खिलाफ़ थे। यही कारण था कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटर, कोल ब्लॉक आवंटन जैसे मसलों को बड़ा घोटाला बताकर प्रचारित प्रसारित किया गया। बाद में 2जी केस सुप्रीम कोर्ट में बेबुनियाद बताकर खारिज कर दिया गया। सिर्फ इतना ही नहीं लोकपाल कानून की आंड़ में ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ जैसे एनजीओ को फंडिंग करके राजधानी दिल्ली में जन आंदोलन की तर्ज पर एक बड़ा इवेंट आयोजित किया गया। करप्शन को राष्ट्रीय मुद्दा बनाकार राष्ट्रवाद को खड़ा किया गया। इस कार्पोरेट प्रायोजित एनजीओ आंदोलन की विवेकहीन व असंवेदनशील मीडिया रिपोर्टिंग द्वारा एक कांग्रेस विरोधी जनमत तैयार किया गया। जिसका प्रत्यक्ष फायदा 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी और भाजपा को मिला।

चुनाव के दौरान गिफ्ट बाँटने का चलन
राजनीति की बारीक समझ रखने वाले गुलाब चंद सरोज कहते हैं- “ये खेल तमिलनाड़ु से शुरु हुआ जहां दो प्रमुख दलों के मुखिया फिल्मी बैकग्राउंड के लोग थे। तमिलनाड़ु में तो बाकायदा मिक्सर टीवी मंगलसूत्र तक बांटे गए हैं। जबकि अन्य जगहों पर शराब और नगदी का इस्तेमाल धड़ल्ले से होता रहा है। पिछले चुनाव में भी पीएम कैंडीडेट द्वारा 15 लाख रुपए प्रत्येक व्यक्ति के खाते में डालने की बात ने मतदाताओं के मनो-मस्तिष्क में क्लिक कर गई थी। मतदाताओं कों रुपए और गिफ्ट का ऑफर देना सीधे सीधे वोट खरीदने जैसा है। हर चुनाव में चुनाव आयोग भारी मात्रा में शराब और नगदी बरामद करता है। लेकिन वो चुनाव में इस्तेमाल होने वाले कुल धन का कितना प्रतिशत पकड़ पाता है इसका कोई आँकड़ा नहीं है।”

पूँजी का केंद्रीकरण
इंटरनेशनल राइट्स ग्रुप ऑक्‍सफैम ने अपने सर्वे रिपोर्ट 2018 में बताया है कि भारत की कुल संपत्ति के 73 फीसदी हिस्‍से पर देश के 1 फीसदी अमीरों का कब्‍जा है। जबकि देश के शीर्ष नौ अमीरों की संपत्ति पचास प्रतिशत गरीब आबादी की संपत्ति के बराबर है। यही 9 लोग चुनावों में दखल देकर देश की राजनीति की दशा और दिशा तय करते हैं। पूंजीवादी कोर्पोरेट हाउस लेफ्ट पार्टियों को फंडिंग नहीं करती हैं। आज देश में हालात ये है कि लेफ्ट पार्टियां फंड की कमी से बहुत बुरी तरह से जूझ रही हैं। क्योंकि उन्हें कोई भी कार्पोरेट हाउस फंडिंग नहीं करते हैं। त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के वक़्त तत्कालीन मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने कहा था कि पार्टी के पास फंड की कमी है। चुनाव बाद बिना जमीन वाली भाजपा ने महज पूंजी के दम पर त्रिपुरा में जबर्दस्त चुनावी जीत दर्ज की थी।

राजनीतिक पार्टियो कें चंदे से पता चलता है कब किसे प्रमोट करता है कार्पोरेट

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने देशभर के राजनीतिक दलों द्वारा दाखिल किए गए आयकर रिटर्न से आंकड़े जुटाये। इस रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2016-17 में देश के सात राष्ट्रीय दलों ने कुल 1,559.17 करोड़ रुपये की आय घोषित की। इनमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की आय सबसे ज्यादा 1,034.27 करोड़ रुपये रही। जो कुल राशि का 66.34 प्रतिशत है।’जबकि कांग्रेस को कुल राशि में से 225.36 करोड़ रुपये यानी 14.45 प्रतिशत राशि मिली है। और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) को इस दौरान सबसे कम 2.08 करोड़ रुपये यानी 0.13 प्रतिशत की आय हुई है।

अवैध धन को राजनीति में इनवेस्ट करने का नाम है- ‘इलेक्टोरल बांड’
मार्च 2018 से जनवरी 2019 के बीच राजनीतिक दलों को इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिये जो चंदा मिला उनमे 99.80 % चंदा 10 लाख और एक करोड़ रुपये मूल्य के थे। करीब दस महीनों में डोनर्स ने राजनीतिक दलों के लिए कुल 1407.09 करोड़ के इलेक्टोरल बांड्स खरीदे, जिनमें से कुल 1403.90 करोड़ के बांड्स सिर्फ 10 लाख और एक करोड़ रुपये मूल्य के थे। बता दें कि मध्यप्रदेश के सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ ने एसबीआई से आरटीआई के जरिये ये जानकारी हासिल की है।

चंचल देबनाथ

चुनाव आयोग क्यों नहीं करता प्रत्याशियों की फंडिंग
मजदूर एक्टीविस्ट चंचल देबनाथ कहते हैं ये चुनाव सिर्फ पूंजीपति सांसदों के 5 साल के टर्म को रिन्युवल कराने के लिए होते हैं। आज पार्टियों के प्रत्याशी तक कार्पोरेट तय करता है। नीरा राडिया फाइल से पता चलता है कि सरकार के किस विभाग का मंत्री कौन होगा ये भी कार्पोरेट तय करता है। चंचल आगे कहते हैं- पहले भी सबको मतदान का अधिकार नहीं था। सिर्फ 28 प्रतिशत आबादी ने संविधान सभा के प्रत्याशियों अपरोक्ष रूप से चुना था। 28 प्रतिशत लोगों का तय किया गया संविधान कभी 100 प्रतिशत लोगों के हितों का प्रतिनिधित्व कर सकता है क्या। संविधान बनने के शुरु से ही पैसा और संपत्ति के द्वारा ये तय होता आया है। आज ये और खुले रूप से इसलिए हो रहा है क्योंकि आज पैसे और कार्पोरेट का बोलबाला है। पैसे और संपत्ति के दखल को खत्म किए बिना सामाजिक रूप से जनवाद को लागू नहीं किया जा सकता। सचमुच जनवाद चाहिए तो पैसा और संपत्ति खत्म करके ही हो सकता है। इसी कारण से संसद में मजदूर किसान तबके का प्रतिनिधित्व बिल्कुल भी नहीं है। चुनाव आयोग को चाहिए कि पूंजी के इस्तेमाल पर, पूँजीपतियों के दखल पर सख्ती से रोक लगा दे।
राजनीतिक पार्टियों की फंडिंग खत्म करके जब तक प्रत्याशियों की फंडिंग का जिम्मा खुद चुनाव आयोग के जिम्मे नहीं किया जाता तब तक लोकतंत्र की स्थापना नहीं हो सकती। और न ही तब तक इसे लोकतंत्र कहा जाना चाहिए।

गुलाब चन्द्र

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