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ऐ लड़की समाज

ऐ लड़की: तुम्हें लिखता-पढ़ता, आगे बढ़ता देखकर मर्दवादी अहंकार जहरीली फुंकारे क्यों मारने लगता है

ऐ लड़की, तुम्हारे विचार मायने नहीं रखते, मैं कहता हूं तुम्हारे पास अपने विचार
हो ही नहीं सकते। अगर तुम्हारे पास विचार हैं भी तो वे ज़रूर किसी मर्द साथी
से ही प्रभावित होंगे। अगर तुम वामपंथ, समाजवाद, मार्क्सवाद और भी कई वादों
को मानती हो तो ये भी किसी पुरुष साथी ने ही खैरात में दिए होंगे। इतना ही
नहीं, अगर तुम खुद को नारीवादी कहती हो तो ये भी तुम्हें कोई मर्द ही
बताएगा कि तुम्हारा नारीवाद कितना गलत, कितना सही है। अगर तुम कोई
लेख लिखती हो, कोई रिपोर्ट करती हो तो उसमें पाठक तुम्हारे पुरुष साथी की
झलक देखते हैं। कई लोग कहते मिल जाते हैं, अरे ज़रूर उस फलां लड़के ने ही
उसके नाम पर लिख दिया होगा। अगर तुम्हें कोई सराहना मिलती है, सम्मान
मिलता है तो लोग कहते हैं, लड़की समझकर दे दिया होगा।

अगर तुम महिला केंद्रित मुद्दों पर लिखती हो तो तुम्हें उन्हीं मुद्दों के आस-
पास समेटने की कोशिश की जाती है। लोग कहते हैं, आप महिला मुद्दों पर ही
लिखा करें। यह मर्दवादी सोच यह समझती ही नहीं कि नोटबंदी, जीएसटी, गरीबी,
बेरोज़गारी, चुनाव, सरकार, सत्ता इनसे जुड़े मुद्दें भी महिलाओं के ही मुद्दे हैं।
तुमसे बार-बार उम्मीद की जाती है कि तुम इन मुद्दों पर लिख/बोल नहीं
सकती। अगर तुम इन मुद्दों पर लिख/बोल भी दो तो तुम्हें एहसास दिलाया
जाता है कि तुमसे बेहतर कोई पुरुष ही इन मुद्दों पर लिख देता।

गलती से अगर तुम पितृसत्तात्मक मीडिया का हिस्सा हो तो किसी दिन कोई
मर्द यूं ही टहलता आएगा और कहेगा, तुम ज्यां द्रेज को जानती हो जो इस
मुद्दे पर लिख रही हो? तुम्हारा संपादक सबसे पहले आकर आपको इंटरटेनमेंट,
हेल्थ, राशिफल जैसी बीट्स की ओर धकलने की कोशिश करेगा। अगर लड़कर
तुम हार्ड बीट्स ले भी लो तो तुमसे बिजली, पानी, सड़क, हादसे जैसी खबरें
करवाई जाएंगी। राजनीतिक, आर्थिक मुद्दों की खबरें तुरंत तुम्हारे बगल में बैठे
मर्द को दे दी जाएंगी। तुम्हें पता होगा कि तुम उससे बेहतर कर सकती हो.

लेकिन मर्दवादी अहंकार तुम्हें ऐसा करने नहीं देगा। तुम रिपोर्टिंग मांगोगी, वे
सुरक्षा की दुहाई देकर किसी पुरुष रिपोर्टर को भेज देंगे। तुम खुद से कोई
अच्छी रिपोर्ट लेकर आओगी, तो आश्चर्य जताते हुए कहेंगे- यह सच में तुमने
लिखा है? गलती से तुम्हारा कोई पुरुष साथी इसी फील्ड से होतो वे तुम्हारे
फेसबुक पोस्ट में भी उसकी झलक खोजने लगेंगे। कई लोग तो यह भी कह
देंगे, अरे तुम तो फीमेल (अपने पार्टनर का नाम यहां लगा लें) हो। तुम्हारे
व्यक्तित्व, तुम्हारे विचारों को एक मर्द की परछाई के भीतर ढकने की कोशिश
की जाएगी। अगर वह कोशिश कामयाब न हो पाई, तो लोग तुम्हारे अस्तित्व को
ही खारिज करने की जुगत में लग जाएंगे।

तुम्हारी कामयाबी, तुम्हारे, विचार और तुम्हें स्वीकारने में ये मर्दवादी अहंकार
बहुत ना-नुकुर करेगा। तुम्हारे रास्ते में यह मर्दवादी अहंकार बार-बार आएगा।
तुम्हें राजनीतिक, आर्थिक मुद्दों से दूर रखने की यह पितृसत्ता की राजनीति है।
तुम किसी भी मुद्दे पर बोलो, ये मर्द उसमें कमी निकालेंगे ही। ये कहेंगे, अरे
तुम शहरी नकली नारीवादियों के चोंचले हैं ये। तब तुम उन्हें याद दिलाना कि
एक मर्द मज़दूर को अगर 20 रुपये मिलते हैं तो वहां महिला मज़दूर को 10
रुपये दिए जाते हैं और जब वह बोलती हो तो कहते हैं महिला हो, शुक्र मनाओ
10 मिल रहे हैं।

इस मर्दवादी अहंकार से भरे माहौल के बीच में तुम्हें लिखता-पढ़ता, आगे बढ़ता
देखकर ही शीशे सा मर्दवादी अहंकार चकनाचूर हो जाता है। इसे आग-बबूला
होकर वह तुम्हारे अस्तित्व को नकारने की पुरजोर कोशिश में लग जाता है। वह
हमें नकारता जाएगा और हम उसके अहंकार को हर पल, हर कदम पर तोड़ेंगे
क्योंकि हमारे विचारों की अहमियत है, हमारे विचारों में हमारी ही छवि है किसी
मर्द की नहीं।

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