लोकवाणी

मुख़्तलिफ़ आवाज़, निगाह और विचार

रिपोर्ट

फासीवाद अलर्ट: आरएसएस अब मुसोलिनी के तर्ज पर सैनिक स्कूलों की श्रृंखला खोलेगी

संघ अपने मंसूबों को अंजाम देने के लिए अब जो ऐतिहासिक कदम उठाने जा रहा है, वे शायद भारत में फासिस्ट उभार के एक नए खूनी दौर का आग़ाज़ करेंगे! संघ की शिक्षा शाखा विद्या भारती अबतक पूरे देश में 17,396 सरस्वती शिशु मंदिरों का संचालन कर रही थी, पर अब वह मुसोलिनी के ‘द बलीला’ और ‘अवाँगार्दिस्त’ के तर्ज पर सैनिक स्कूलों की श्रृंखला खोलेगी। इस ‘सैनिक विद्या मंदिर’ की पहली शाखा 40 करोड़ की लागत से बुलंदशहर के शिकारपुर में खुलेगी। जाहिर है कि संघ के प्रचारकों, भाजपा के कार्यकर्ताओं और उन्मादी भीड़ के बूते हिन्दुत्ववादी फासिस्ट अपने सारे मंसूबों को साकार नहीं कर सकते, ख़ास तौर पर तब, जबकि अर्थ-व्यवस्था की तबाही के चलते उन्हें आने वाले दिनों में मज़दूरों और आम मेहनतक़शों के व्यापक उभारों का भी सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में उन्हें ऐसे अर्ध-सैनिक दस्तों की ज़रूरत पड़ सकती है, जैसे हिटलर की नात्सी पार्टी के मातहत एस.एस. के दस्ते हुआ करते थे। जाहिर है कि उनकी तैयारियाँ एकदम सुव्यवस्थित ढंग से जारी हैं। गिरीश मालवीय के इस लेख को ध्यान से पढ़िए और देश के भविष्य और आने वाली पीढ़ियों के बारे में संजीदगी से सोचिए। – कविता कृष्णपल्लवी

गिरीश मालवीय

आरएसएस 2020 से सैन्य स्कूल की श्रृंखला सैनिक विद्या मंदिर के नाम से खोलने जा रहा है, इसकी पहली शाखा उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के शिकारपुर में खोली जा रही है। इस स्कूल का नाम रज्जू भैया सैनिक विद्या मंदिर होगा। इन स्कूलों को आरएसएस की शिक्षा शाखा विद्या भारती चलाएगी।

RSS की इस सैन्य स्कूल की योजना से संघ के एक भूले बिसरे लेकिन बहुत प्रभावी नेता याद आते है जिनका नाम था, डॉ बालकृष्ण शिवराम मुंजे। दरसअल मुंजे को हिंदुस्तान के राजनीति में फासीवाद के बीज बोने के लिए जाना जाता है।

एक समय मुंजे कांग्रेस में बाल गंगाधर तिलक के सहयोगी भी रहे लेकिन 1920 में ‌तिलक की मृत्यु के बाद मुंजे कांग्रेस से अलग हो गए। वह महात्मा गांधी की नीतियों से शुरू से वह असहमत रहे और बाद में हिंदू महासभा के अध्यक्ष बन गए 1930 और 1931 के गोलमेज सम्मेलनों में वे हिन्दू महासभा के प्रतिनिधि के रूप में गए थे। गोलमेज सम्मेलन के बाद उन्होंने यूरोप का भ्रमण किया वो कुछ समय तक इटली में भी रुके। वहाँ वे उस शख्स से मिले जिसके कारण संघ के बड़े से बड़े नेता उनका जिक्र करने से बचते हैं वह था इटली का तानाशाह मुसोलिनी।

इतालवी लेखिका मार्जिया कोसालेरी ने ‘Hindutva’s foreign tie-up in the 1930s: Archival evidence’ शीर्षक से लिखे एक आलेख में लिखा है कि बीएस मुंजे पहले हिंदूत्ववादी नेता थे, जो ‌द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले की इटली की फासीवादी सरकार के संपर्क में आए।

मुसोलिनी को विश्व राजनीति में फासीवाद का संस्‍थापक माना जाता है। मुंजे शुरू से ही उसके मुरीद थे। इटली में मुंजे ने कई महत्वपूर्ण मिलिट्री शिक्षण संस्‍थानों का दौरा किया जिसमे द बलीला और अवांगार्दिस्त ऑर्गेनाइजेशन प्रमुख थी। ये दोनों ही संस्‍थान फासीवादी राजनीति के केंद्र थे, जहां युवाओं को फासीवादी विचारधारा का प्रशिक्षण दिया जाता था।

भारत वापस आने पर मुंजे नें ‘द मराठा’ को साक्षात्कार में कहा, “वास्तव में, नेताओं को जर्मनी के युवक आन्दोलन और इटली के बलिला और फासीवादी संगठनों का अनुसरण करना चाहिए। मैं सोचता हूँ कि विशेष परिस्थितियों को अनुकूल बनाकर भारत में लागू किए जाने के लिए वे बहुत उपयुक्त हैं।” (‘द मराठा’, 12अप्रैल, 1931)

1934 में मुंजे ने अपनी एक संस्था “भोंसला मिलिट्री स्कूल” की नींव रखी उसी साल मुंजे ने “केन्द्रीय हिन्दू सैन्य शिक्षा समाज’, जिसका मुख्य उद्देश्य हिन्दुओं के सैन्य उत्थान और हिन्दू युवाओं को अपनी मातृभूमि कि रक्षा करने योग्य बनाना था, की बुनियाद भी रखी।

मुंजे को हेडगेवार का मेंटॉर भी माना जाता है। दोनों गहरे दोस्त भी थे उन्हीं की सलाह का अनुसरण करते हुए पहले सरसंघचालक हेगड़ेवार ने संघ के सांगठनिक ढांचा को मुसोलिनी और हिटलर की पार्टी की तरह से आकार दिया। जैसे फ़ासीवादी पार्टी में ‘ड्यूस’ के नाम पर तथा हिटलर की नात्सी पार्टी में ‘फ़्यूहरर’ के नाम पर ऐसे ही संघ में हर पदाधिकारी को सरसंघचालक के प्रति पूर्ण कर्मठता और आदरभाव से हर आज्ञा का पालन करने की शपथ दिलाई जाती है। कोसालेरी ने भी लिखा हैं कि फासीवादी संस्‍थानों की प्रशिक्षण पद्घति और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रशिक्षण पद्घति में अद्भुत समानताएं हैं।

मुंजे एक जगह लिखते है ‘फासीवादी का विचार स्पष्ट रूप से जनता में एकता स्‍थापित करने की परिकल्पना को साकार करता है। भारत और विशेषकर ‌हिंदुओं को ऐसे संस्‍थानों की जरूरत है, ताकि उन्हें भी सैनिक के रूप में ढाला जा सके। नागपुर स्थित डॉ हेडगेवार का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ऐसा ही संस्‍थान है।’

मुंजे और आर.एस.एस. की करीबी और इनकी फ़ासीवादी विचारधारा की पुष्टि 1933 में ब्रिटिश सूत्रों में छपी खुफ़िया विभाग की रिपोर्ट से हो जाती है। इस रिपोर्ट का शीर्षक था “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर टिप्पणी” जिसमें संघ के मराठी भाषी क्षेत्रों में पुर्नगठन का ज़िम्मेदार मुंजे को ठहराया गया है। इस रिपोर्ट में आर.एस.एस. के चरित्र, इनकी गतिविधियों के बारे में कहा था कि – “यह कहना सम्भवतः कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा कि संघ भविष्य में भारत के लिए वह बनना चाहता है जो फ़ासीवादी इटली के लिए हैं और नात्सी लोग जर्मनी के लिए हैं।”

एक बार फिर RSS मुंजे की विरासत को सहेजती हुई दिख रही है। मुंजे के “भोंसला मिलिट्री स्कूल”की तर्ज़ देश भर में सैन्य स्कूल खोलने जा रही है। लगता है निकट भविष्य में ब्रिटिश शासन के खुफिया विभाग की रिपोर्ट सच साबित होकर रहेगी।”

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *