लोकवाणी

मुख़्तलिफ़ आवाज़, निगाह और विचार

रिपोर्ट

जंग मसलों का हल नहीं / खून अपना हो या पराया हो – साहिर लुधियानवी

साहिर लुधियानवी

ख़ून अपना हो या पराया हो
नस्ले-आदम का ख़ून है आख़िर
जंग मग़रिब में हो कि मशरिक में
अमने आलम का ख़ून है आख़िर

बम घरों पर गिरें कि सरहद पर
रूहे-तामीर ज़ख़्म खाती है
खेत अपने जलें या औरों के
ज़ीस्त फ़ाक़ों से तिलमिलाती है

टैंक आगे बढें कि पीछे हटें
कोख धरती की बाँझ होती है
फ़तह का जश्न हो कि हार का सोग
जिंदगी मय्यतों पे रोती है

इसलिए ऐ शरीफ इंसानो
जंग टलती रहे तो बेहतर है
आप और हम सभी के आँगन में
शमा जलती रहे तो बेहतर है।

(अग्रणी प्रगतिशील शायरों में शामिल। मशहूर फ़िल्म गीतकार)

उपनाम :’साहिर’

मूल नाम :अब्दुल हई फ़ज़ल मुहम्मद

जन्म :08 Mar 1921, लुधियानाभारत

निधन :28 Oct 1980

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *