लोकवाणी

मुख़्तलिफ़ आवाज़, निगाह और विचार

हास्य-व्यंग्य

“सावधान! आगे भावनाएँ आहत हो रही हैं!”

लेखक: रविन्द्र चौधरी उर्फ भगतराम

देश के सर्वश्रेष्ठ न्यूज़ चैनल (?) पर देर रात तक शनि और मंगल के घर में आ घुसने की ख़ौफ़नाक न्यूज़ देखने के बाद डरते-डरते मेरी आँख लगी ही थी कि अचानक कानों में ज़ोर की आवाज़ आई, “उठो…खड़े हो जाओ!” देखता क्या हूँ कि एक काली सी छाया मेरे सामने खड़ी है।

अपने जन्मजात संस्कारों की वजह से मैं तुरंत जान गया कि ये तो भगवान ही सकते हैं। मैं गिड़गिड़ाते हुए उनके पैरों में पड़ गया, “मुझसे क्या ग़लती हो गई प्रभु?” काली छाया रूपी भगवान बोले “ग़लती तो ऐसी हुई है कि तुम इस देश में रहने के लायक भी नहीं रहे!” मैंने जानना चाहा “मुझसे ऐसी क्या…” तभी भगवान ने बीच में टोककर कहा, “काफ़ी टाइम से तुम्हारी भावनाएँ आहत नहीं हो रही हैं, बोलो ये सच है कि नहीं?” मैंने याचना की “भगवन् मैंने तो पिछले महीने ही अपनी भावनाएँ आहत की थीं।”

यह सुनते ही भगवान कुपित हो उठे, “तुम सच्चे देशभक्त नहीं हो! एक सच्चे देशभक्त की भावनाएँ आहत होने में इतने दिन का ‘गैप’ नहीं लेती! जाओ और तुरंत अपनी भावनाएँ आहत करो!” मैं गिड़गिड़ाया, “प्रभु अचानक इतने शॉर्ट नोटिस पर…” तो भगवन् मुस्कराते हुए बोले “डॉन्ट वरी! तुम हमारी पार्टी ‘बीजेबीपी’ यानि ‘भारतीय जनभावना पार्टी’ के ऑफ़िस में जाओ, वे लोग जाते ही तुम्हारी भावनाएँ आहत करा देंगे।”

मुझे जिज्ञासा हुई, “लेकिन भगवन्, बीजेबीपी आपकी पार्टी कैसे हुई?” “तुम ये सब छोड़ो…ये आस्था का मामला है। याद रखो…अगर तुमने 24 घंटे के अंदर अपनी भावनाएँ आहत ना कीं तो तुम्हें ‘वाम-योनि’ में डाल दूंगा।” यह कहते ही भगवन् अंतर्ध्यान हो गए। ‘वाम-योनि’ की कल्पना करते ही मैं दाएँ से बाएँ तक सिहर उठा।

जैसे-तैसे रात काटी और सुबह होते ही बीजेबीपी के ऑफ़िस पहुंच गया। मैंने बाहर आते एक सज्जन से पूछा, “सर, मुझे भावनाएँ आहत करनी हैं, किससे मिलूं?” यह सुनते ही सज्जन बड़े उपहासपूर्ण लहजे में बोले, “भावनाएँ तो घर बैठे-बैठे ही आहत हो जाती हैं। खैर…अब आ ही गए हो तो प्रेमाजी से मिल लो। वो राइट साइड के चौथे कमरे में हैं।”

मैं कमरे में पहुँचा तो देखा कि प्रेमाजी एक मरियल से आदमी पर बरस रही हैं, “तुम हर बार भावनाओं को ‘इंपोर्टेड’ तरीके से आहत करके ले आते हो! क्या तुम ये काम ‘स्वदेशी’ ढंग से नहीं कर सकते? पिछली बार तुम ‘महँगाई’ और ‘किसानों की आत्महत्या’ जैसी फालतू बातों से भावनाओं को आहत कर लाए थे…और ये इस बार सांसद रिश्वत कांड! मेरे साथ आओ…मैं सिखाती हूं तुम्हें!”

जैसे ही वो पलटीं तो सामने मुझे देखकर बोलीं, “तुम कौन हो?” मैंने सकुचाते हुए कहा, “जी…रात मेरे सपने में भगवानजी आए थे और उन्होंने भावनाएँ आहत…” इतना सुनते ही वो बीच में टोकते हुए बोलीं, “अच्छा ठीक है…तुम भी आ जाओ!” वो मरियल व्यक्ति और मैं, दोनों उनके पीछे हो लिए।

वो हमें एक दूसरे कमरे में ले गईं। कमरे का सीन देखते ही मैं हैरान रह गया! पूरे कमरे में डीवीडी और वीसीडी बिखरी पड़ी थीं। कुछ नौजवान उकड़ूँ बैठे एक फ़िल्म देख रहे थे। प्रेमाजी को देखते ही वे सब खड़े हो गए। प्रेमाजी ने ऊँची आवाज़ में पूछा, “किस-किसकी भावनाएं आहत हुईं?” सब सिर झुकाकर चुपचाप खड़े रहे।

प्रेमाजी चिल्लाते हुए बोलीं, “चार घंटे से फ़िल्में देख रहे हो और एक बार भी भावनाएँ आहत नहीं हुईं!” कहते हुए उन्होंने एक नौजवान को परे धकेला और टीवी पर एक फ़िल्म लगाते हुए बोलीं, “देखो…तुम्हें पहले ही रील में दस बार भावनाएँ आहत करके दिखाती हूं।” थोड़ी सी फ़िल्म चलते ही सीन आया, जिसमें हीरोइन, हीरो से कह रही है- “इक़बाल…तुम लौटकर वापस तो आओगे ना!” सीन को वहीं पे पॉज करते हुए वो बोलीं- “बताओ, फ़िल्म हिंदी की है और हीरो का नाम क्या है…इक़बाल! रामचंद्र या सीताराम क्यों नहीं? क्या यही है हमारी कल्चर?”

सब आँखें फाड़कर उन्हें देखने लगे। “हुईं कि नहीं भावनाएं आहत?” यह कहकर उन्होंने वाणी को पॉज दिया और फ़िल्म प्ले कर दी। थोड़ी देर बाद सीन आया- “आज तू दारा के चंगुल से बचकर नहीं जा सकती।” प्रेमाजी ने इस सीन पर फ़िल्म फिर रोक दी और पूछा, “तुममें से भी तो किसी का नाम दारा है!” अब तक आवेश में आ चुका एक नौजवान बोला, “जी मैं हूँ दारा!” प्रेमाजी उसके चेहरे पर आँखें गड़ाकर बोलीं, “कैसे राष्ट्रवादी हो तुम! ख़ून नहीं खौला तुम्हारा? उस राष्ट्रद्रोही डायरेक्टर ने विलेन का नाम तुम्हारे नाम पर रक्खा है और तुम चुपचाप खड़े हो! अब भी तुम्हारी भावनाएँ आहत नहीं हुईं?”

अब सारे नौजवानों की भुजाएँ फड़कने लगीं थीं, उनकी आँखों में देश-प्रेम के डोरे तैरने लगे थे और उनकी भावनाएँ विशुद्ध राष्ट्रवादी तरीके से आहत हो चुकी थीं। यह देख प्रेमाजी ने आदेश दिया, “जाओ और तुरंत इस फ़िल्म को चलने से रोको!” मैंने भी जोश में आकर उनके साथ नारा बुलंद किया और आहत भावनाओं का जश्न मनाने उनके साथ हो लिया। मुझे खुशी थी कि मैं ‘वाम-योनि’ में जाने से भी बच गया था।

(यह लेख ‘सामयिक वार्ता’ के नवंबर 2008 अंक में प्रकाशित हो चुका है)

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