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गोडसे को देशभक्त कहना या उसके अपराध का महिमामण्डन क्यों ख़तरनाक़ है?

यह इसलिए हो रहा है, क्योंकि यह कॉन्शंस के क्राइसिस का दौर है!

त्रिभुवन

गोडसे या गोडसे जैसे अन्य लोगों के कृत्य बहस करने के लायक भी नहीं हैं। गोडसे और कसाब में कोई फ़र्क नहीं। कोई गांधी या दयानंद सरस्वती की हत्या करता है तो वह किसी एक व्यक्ति की हत्या नहीं, ऐतिहासिक आंदोलनों के सृजन करने वाले महान लोगों की हत्या है। किसी लेखक, कलाकार या किसी साहित्यकार की हत्या भी इसी श्रेणी में आती है। हम किसी को पसंद करें या न करें, लेकिन अगर कोई आरएसएस को सांप्रदायिक मानता है या किसी कम्युनिस्ट आंदोलन को देशद्रोही मानता है और उसके शीर्ष नेता की हत्या की सोच भी रखता है तो वह जघन्य है। ऐसी सोच वाले लोगों की सही जगह मनोचिकित्सकों के अस्पताल हैं, संसद, विधानसभा, अख़बार या सामाजिक स्थल नहीं। ऐसे लोगों के लिए इस देश का कोई कोना नहीं होना चाहिए।

अगर कोई समझता है कि गांधी की हत्या पर बहस हो सकती है तो वह व्यक्ति मानसिक रूप् से परिपक्व नहीं है। वह अपनी मानसिक अबोधता के चलते ऐसा मान रहा है या बता रहा है। वह विवेकहीन भर नहीं है। वह नासमझी की पराकाष्ठा को लांघकर आपराधिक मानसिकता के दायरे में है, क्योंकि यह मानवीय नैतिकता से जुड़ा प्रश्न है। मोरैलिटी की समझ के बिना इस तरह की बातें समझ नहीं आ सकतीं। नैतिकता के आत्मबोध से रिक्त मस्तिष्क ही किसी हत्यारे में देशभक्त या किसी हत्या में देशभक्ति तलाश सकता है। अगर इस तरह की मानसिकता लाेगों में फैल रही है या फैलाई जा रही है तो इसका सीधा सा मतलब ये है कि यह देश बहुत बीमार होने जा रहा है या बीमार हो चुका है। हम अपनी पांच हजार साल से भी पुरानी संस्कृति की जड़ों में तेज़ाब डालने जा रहे हैं।

एक मानसिकता होती है जीवन की। एक है हत्या की। हत्या यानी हिंसा का चरम भाव। भारतीयता, जिसकी आधारशिला वेदों के ऋषियों से लेकर भगवान बुद्ध और महावीर तक महान मनीषियों ने रखी और ईश्वरचंद्र विद्यासागर, केशवचंद्र सेन, राजा राममोहन राय से लेकर दयानंद सरस्वती जैसे लोगों ने जिसमें ज्ञानोदय का प्रकाश किया, और गांधी और अंबेडकर ने जिसे एक इमारत में बदला, जिसमें सरदार भगतसिंह जैसे मरजीवड़ों ने अपने रक्त, मांस और मज्जा से सुदृढ़ता दी, वह गर्वीली हुई ही इसलिए कि उसमें सदाचरण मूल चीज़ है।

और सदाचरण की अनिवार्य शर्त है कि वह किसी भी तरह की हिंसा से बिलगाव रखता है। हमारे यहां भगवान महावीर से लेकर गांधी-दयानंद तक हिंसा को मनसा, वाचा और कर्मणा निषिद्ध बताया गया है। हमारे सदाचरण का आधार हिंसा है ही नहीं। सदाचरण की कोंपलें धर्म से भी निकलती रही हैं। इसलिए इस तरह की बातें करने वाले लोग गेरुवा वस्त्र भले पहन लें या भगवा से अपने आपको भले जोड़ें, लेकिन इनकी असलियत कुछ और है।

क्या यह कम हैरानी की बात है कि एक ही विचारधारा के लोग पहले दिन ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसे पुनर्जागरणवादी की प्रतिमा तोड़ते हैं और अगले ही दिन गांधी जैसी पांच हजार साल पुरानी संस्कृति की जीवंत प्रतिमा को तोड़ने वाले घृणास्पद नाथूराम गोडसे की तारीफ़ों की पुल एक स्वर में अलग-अलग जगहों से बांधने लगते हैं! क्या यह सिर्फ़ संयोग भर है कि कोलकाता की कॉलेज स्ट्रीट से लेकर भोपाल तक, बंगलौर के किसी पार्टी दफ्तर से लेकर उदयपुर के एक पार्टी ऑफिस में एक ही जैसी बातें सोशल मीडिया के माध्यम से गर्वीले अंदाज़ में कही जा रही हैं?

यह साफ़ तौर पर मॉरेलिटी के क्राइसिस का मामला है। किसी भी राजनीतिक दल या विचारधारा में जिस समय मॉरेलिटी का हनन होता है तो वह देशभक्ति, मानवभक्ति या साम्यवादिता की बातें करें, लेकिन ऐसे आंदोलन पतित हो जाते हैं। घृणास्पद राहों पर निकल पड़ते हैं। सच बात तो ये है कि अगर गोडसे की राह या मानसिकता सही होती तो श्यामाप्रसाद मुखर्जी जैसा प्रबुद्ध व्यक्ति वीर सावरकर और नाथूराम गोडसे वाली हिन्दू महासभा से अलग होकर भारतीय जनसंघ का निर्माण नहीं करता। वह एकात्म मानववाद की विचारधारा का प्रणयन नहीं करता। वह गोडसे और सावरकर के साथ ही खड़ा होता। गांधी जी की हत्या भले 30 जनवरी 1948 को हुई हो, लेकिन मानसिकता तो बहुत पहले से अंकुरित हो रही होगी। इसका आभास श्यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे प्रबुद्ध व्यक्ति को नहीं रहा हो, यह संभव नहीं है। मुखर्जी बहुत कम उम्र में कुलपति ऐसे ही नहीं बन गए थे।

मुखर्जी और उपाध्याय में जो मॉरेलिटी थी, उससे उनका दल बहुत पहले ही मुक्त हो गया था। कांग्रेस तो गांधी की हत्या के साथ ही मॉरेलिटी छोड़ चुकी थी, क्योंकि उसके सब नेता सत्ता की लिप्सा में पले-बढ़े थे। चाहे वे नेहरू हों या पटेल। उनकी व्यक्तिगत सफलताएं अलग बात है, लेकिन मॉरेलिटी कुछ अलग है।

मारैलिटी दरअसल दो चीज़ों से जुड़ी होती है। वह किसी मनुष्य की इंडिविजुअल कॉन्शंस का हिस्सा भी होती है और किसी समाज, देश या राष्ट्र की उस व्यवस्था का भी अभिन्न अंग है, जिस पर विधि, विधान और संविधान टिके होते हैं। एक होती है पॉजिटिव मॉरेलिटी और एक पर्सनल मॉरेलिटी। पॉजिटिव मॉरेलिटी कहीं पुरानी है। कानून, सरकार और धर्म से भी पुरानी। धर्म आया तो इसी मॉरेलिटी की आधार पर खड़ा हो सका। यही मनुष्य को मनुष्य बनाती है। मनुष्य का पशु से मनुष्य होने का सफर सिर्फ़ मनुष्यता की यात्रा भर नहीं है। वह मॉरेलिटी की यात्रा भी है। हम सभ्य या सिविलाइज्ड कहलाते ही इसलिए हैं कि हम मॉरेलिटी के साथ जीते हैं। इसी से सिविल सोसाइटी आकार लेती है और इसी से मनुष्य सभ्य और सुसंस्कृत होता है।

हिंसा का भाव रखने वाला मनुष्य अगर पांच बार नमाज़ पढ़ता हो या त्रिकाल संध्या करता हो, वह रक्तस्नान संस्कृति का वाहक भी हो सकता है।

आपने आज तक इस तथ्य की तरफ नहीं देखा कि गांधी की हत्या हुई कहां? गांधी जी की हत्या मंदिर में की गई। गांधी के हत्यारों ने पुस्तक लिखी, गांधी वध और मैं या गांधी वध क्यों? यानी उन्होंने एक मंदिर को वध स्थल बनाया। आप कल्पना कर सकते हैं कि क्या ऐसे लोग हिन्दू या सनातन धर्मी हो सकते हैं, जो एक मंदिर में हत्या करें? क्या ऐसे लोग हिन्दू या सनातन धर्मी कहलाने के अधिकारी हैं, जो एक मंदिर में बलात्कारियों के लिए आंदोलन करें?

सनातन धर्म की मॉरेलिटी पर हजार प्रश्न उठ सकते हैं; लेकिन यह धर्म बताता है कि मनुष्य तो दूर, चींटी से लेकर गाय तक की हत्या पाप है। यानी हमें अपनी नानी, दादी या मां के माध्यम से जिस धर्म के संस्कार मिलते हैं, वह अहिंसा के मूल्यों का वाहक है। और मॉरेलिटी की चट्‌टतान पर खड़ा है।

मॉरेलिटी की अंतिम परिणति सामाजिक जीवन में विद्रोह भी हो सकती है। वह व्यक्तिगत विद्रोह भी हो सकता है और सामाजिक विद्रोह भी। जैसा कि सरदार भगतसिंह ने किया। जैसा कि दयानंद सरस्वती ने किया। डंका बजाकर किया। एक ने अंगरेज के खिलाफ और दूसरे ने ब्राह्मणवाद के खिलाफ ब्राह्मणवाद की मांद में जाकर। काशी में। और विद्रोहों की बहुत कहानियां हैं। बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य आदि से लेकर दयानंद, गांधी या भीमराव अंबेडकर तक। विद्रूपताओं पर जैसा प्रहार इन लोगों ने किया, वैसा शायद ही किसी और ने किया होगा।

विद्रूपताओं के ख़िलाफ़ विद्रोही ही मान्य और मूल्यवान है। विद्रूपताओं काे स्थापित करने की कोशिशें नाथूराम गोडसे समर्थक कर रहे हैं। हमने जिस महान संस्कृति से विज़डम पाई, उसमें अब कुछ भटकाव भरे लोग अब अपने आपको देवदूत बनाकर प्रस्तुत करने की कोशिशें कर रहे हैं। दरअसल वे पावर लवर हैं। इसलिए उन्हें हर उस चीज़ का विध्वंस करना है, जो उनकी राहों में दिक्कत दे रही है। इसलिए वे जस्टिस, युनिवर्सल लव, ब्रदरहुड, देवदूत, ऋषि आदि शब्दों काे अपने ही सांचे में ढालने की कोशिशें कर रहे हैँ।

कॉशंस क्राइसिस के इस दौर को बहुत गंभीरता से समझने की ज़रूरत है।
गोडसे को देशभक्त कहने या उसकी तारीफ करने के कुतर्क देश के किसी भी नेता को सुरक्षित नहीं रहने देगा। इस तरह के अविवेकी किसी भी विचारधारा या किसी भी दल में हो सकते हैं। इसलिए गोडसे को देशभक्त कहना आपराधिक मानसिकता के लोगों को मूर्खतापूर्ण कुतर्क और विकृत आैचित्य मुहैया करवाता है। मेरी दृढ़ मान्यता है कि गोडसे को देशभक्त कहने वाले या गांधी या किसी भी हत्या के पीछे औचित्य की तलाश करने की मानसिकता रखने वाले तमाम लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हिंसा के विकृत समर्थक हैं। ऐसे लोगों की गोडसे समर्थक पोस्ट, उनके बयान या ऑडियो-विडियो प्रथम दृष्टया देशविरोधी माने जाने चाहिए। ऐसे लोगों के ऐसे कुतर्क इस देश के प्रमुख नेताओं की सुरक्षा के लिए बेहद ख़तरनाक़ हैं। ऐसे लोगों काे तत्काल प्रभाव से मनोचिकित्सकों के संरक्षण में भेजा जाना बेहद लाजिमी है। मेरा विनम्र भाव से कहना है कि अमित प्रेम की इस धरती पर अगर चींटी की हत्या को भी गंभ्रीरता से लिया जाता है तो जिस भारत का जन मन गंगा जैसा पवित्र है, वहां गोडसे को देशभक्त या सही ठहराने वालों के मस्तिष्क की चिकित्सा अवश्य होनी चाहिए। यह पावन बलिदानों की भूमि है, हत्यारों की नहीं। यह मानव इतिहास को संवारने वाले लोगों की भूमि है, न किसी संस्कृति और इतिहास को कलंकित करने वालों की।

इसलिए मेरी चिंता यह है कि गोडसे प्रशंसकों को तत्काल प्रभाव से साइकियाट्रिस्टों की चिकित्सा उपलब्ध करवाई जाए। उनसे पूर्ण सहानुभूति के साथ।

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