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लोकतन्त्र के ढहते स्तम्भ, मरते बच्चे और बढ़ता विकास

सीमा आजाद

विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और प्रेस-इन चारों को लोकतन्त्र का चार स्तम्भ माना गया है, जो आज एक-एक कर ढहता हुआ साफ दिखाई दे रहा है। खासतौर पर पिछले महीने में पत्रकारों पर जिस तरीके के हमले किये गये हैं, उसे देखते हुए यह स्तम्भ लोकतन्त्र को संभाले रहने में अक्षम ही दिख रहा है। लेकिन क्या वजह है कि मजबूत बताये जाने वाले ये स्तम्भ आज दरकते नजर आ रहे हैं और इन स्तंभों पर टिके लोकतन्त्र के झाजन के नीचे खड़ी जनता किंकर्तव्यविमूढ़ जैसी स्थिति में नजर आ रही है? जबकि इसके गिरने से चोटिल यह जनता ही होगी। ऐसे समय में यह सोचना जरूरी है, कि ऐसा क्यों हुआ और क्या वजह है कि ये स्तम्भ इतनी आसानी दरकने लगे।

मार्क्सवाद के वैज्ञानिक विजन से देखें, तो ये स्तम्भ लोकतन्त्र के नहीं, बल्कि सत्ता के स्तम्भ हैं, और ये चारों मिलकर लोकतन्त्र को नहीं, बल्कि सत्ता को बनाये रखने का काम करते हैं, इसलिए जैसी सत्ता वैसा स्तम्भ। लेकिन हमने मान लिया कि ये ‘लोकतन्त्र के चार स्तम्भ’ हैं, ये स्तम्भ साफ तौर पर ढहते दिखाई दे रहे हैं। इसे हम क्या मानें? लोकतन्त्र का ढहना, सत्ता का ढहना या सत्ता का तानाशाह होते जाना और चारों स्तम्भों का एक स्तम्भ में बदलते जाना- ‘मनुवादी कॉरपोरेटी स्तंभ’.

इसी के मुताबिक सभी स्तम्भों के लोकतान्त्रिक पहलुओं को समाप्त कर सत्ता केन्द्रित या तानाशाही के पहलू को मजबूत बनाना। पिछले साल की शुरूआत ही इस सच्चाई को उजागर करने वाली महत्वपूर्ण घटना से हुई थी। 10 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट के सर्वोच्च चार जजों ने प्रेस वार्ता बुलाकर कहा कि भारत की न्यायपालिका खतरे में है। मार्क्सवादी समाज वैज्ञानिक तो यह बात पहले से ही कह रहे थे, लेकिन उनकी संस्था से ही जब इस बात का खुलासा हो तो वह बात खतरनाक भी होती है। उसके पहले और बाद में आये बहुत सारे फैसले और उनके तरीके दोनों ने ही इस बात के सुबूत बार-बार पेश किये और करते जा रहे हैं।

‘लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ यानि प्रेस- यह जिस कदर सत्ता का मुख बनकर उसकी ही भाषा बोल रहा है, वह इस चुनाव में खुलकर सामने आ चुका है। लेकिन इस तथाकथित मुख्यधारा के पत्रकारों से अलग वो पत्रकार, जो सत्ता का मुख बनने की बजाय उसका विरोध कर रहे हैं वो सरकारी हमलों का शिकार हो रहे हैं, भले ही वह विरोध बेहद छोटा सा हो। हर छोटे बड़े विरोधों के कारण वे जेलों में डाले जा रहे हैं, उनके मुंह पर थूका जा रहा है, लॉकअप में उनके मुंह में पेशाब किया जा रहा है। यह स्तम्भ तो लोकतंत्र के नजरिये से पूरी तरह ढह चुका है, वैकल्पिक मीडिया यानि ‘दस्तक’ जैसी तमाम पत्रिकायें और सोशल मीडिया अपनी सीमित क्षमता के साथ इसका हरसंभव मुकाबला कर रही हैं।

लेकिन इसकी ताकत इतनी है कि इसी विरोध के चलते झारखण्ड के पत्रकार रूपेश कुमार सिंह ‘विस्फोटक’ रखने के झूठे आरोप में सत्ता द्वारा जेल भेजे जा चुके हैं। विरोध का हर बोला और लिखा गया स्वर भी सत्ता के लिए विस्फोटक ही है, इससे ही वह अधिक डरती है।

लोकतन्त्र के दूसरे स्तम्भ कार्यपालिका- जो कि साफ तौर पर हमेशा सत्ता का ही मजबूत स्तम्भ रहा है, उसे कॉरपोरेट के पक्ष में और मजबूत बनाये जाने के लिए नरेन्द्र मोदी की नयी वाली सरकार ने नया फैसला किया है। वो ये, कि अब इसके उच्च पदों के 60 प्रतिशत हिस्से पर भारतीय सिविल सेवा परीक्षा से नहीं, बल्कि सीधे निजी क्षेत्रों से भर्ती की जायेगी। इसका क्या मतलब है, यह समझना मुश्किल नहीं है। देश का मुस्तकबिल अब संसद में कानून बनाकर नहीं, कार्यपालिका में बैठे कॉरपोरेट के दलालों द्वारा सीधे लिखा जायेगा, हालांकि दोनों ही स्थितियों में यह एक ही होगा।

दलितों आदिवासियों पिछड़ों के 27 से 5 प्रतिशत तक आरक्षण का विरोध करने वाले सवर्णों ने निजी क्षेत्र के इस 60 प्रतिशत आरक्षण पर चुप्पी साध ली है। ये आरक्षित लोग अपने पदों पर बैठ देश के संसाधनों को बेचने की दलाली करेंगे और उसे गुलामी की ओर और ढकेल देंगे।

लोकतन्त्र के पहले स्तम्भ विधायिका की भी बात कर लेनी चाहिए। खुलेआम इंसान-इंसान को बांटने की बात करने वाले, राजनीति करने वाले, हिंसक कार्यवाही का समर्थन करने वाले, ऐसी आतंकी कार्यवाही में शामिल रहने वाले लोग, महिलाओं को टिकट देते हुए भी उनके खिलाफ विचार बांटने वाले लोग विधायिका का हिस्सा बन चुके हैं। संसद में इनकी बढ़ती आबादी लोकतन्त्र की नहीं, साम्प्रदायिक मनुवाद की अभिव्यक्ति है, यानि जन्म के आधार पर व्यक्तियों को गैरबराबर मानना और उसी के आधार पर उनके अधिकार की बात करना। आज इन चारों स्तम्भों की जो स्थिति है, उससे ये साफ नजर आता है कि ये अपने कंधे पर लोकतन्त्र का झाजन नहीं, मौजूदा एकाधिकारी सत्ता की तानाशाही का महल उठाये हुए हैं, जिसके नीचे यह जनता कतई सुरक्षित नहीं है।

अंग्रेजों के जाने के बाद अंबेडकर ने संविधान के माध्यम से इस लोकतन्त्र के झाजन को छाने की कोशिश और भविष्य में इसके मजबूत होने की उम्मीद की थी, लेकिन क्योंकि इसकी आर्थिक बुनियाद ही लोकतन्त्र की नहीं थी, इसलिए इसके दरकने में समय नहीं लगा। दरअसल लोकतन्त्र का मुख्य स्तम्भ उसकी अर्थव्यवस्था होती है। इस स्तम्भ की बुनियाद यदि समाज की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनायी जाती है, तो इसके लोकतन्त्र की ओर बढ़ने की संभावना 90 प्रतिशत रहती है, लेकिन यदि यह पूंजीपतियों के मुनाफे को ध्यान में रखकर बनायी जाती है, तो इसके लोकतन्त्र
की ओर बढ़ने की संभावना बिल्कुल नहीं रहती है, बल्कि पहले से मिले जनवादी अधिकार भी छिनने की संभावना बन जाती है।

पूरी दुनिया में जब सामंतवादी अर्थव्यवस्था से बाहर निकल पूंजीवाद आया, इस नयी अर्थव्यवस्था ने कारखानों में श्रम प्राप्त करने के लिए लोगों को कुछ लोकतान्त्रिक अधिकार भी दिये। जैसे वंश और युद्ध से राजा बनने की जगह जनता के मत से सरकार बनाने का, सरकार के कामकाज में जनता की भागीदारी बनाने के लिए कार्यपालिका बनाकर, सामंती व्यक्ति केन्द्रित न्याय व्यवस्था के बरक्श लिखित और कथित रूप से समान न्याय पाने का अधिकार, और सरकार की आलोचना के लिए स्वतंत्र प्रेस की स्थापना। लेकिन चूंकि यह व्यवस्था मुनाफाकेन्द्रित पूंजीपतियों की व्यवस्था थी, इसलिए इसकी विधायिका में जाने का रास्ता अमीरों यानि पूंजीपतियों की थैली से होकर जाता था, कार्यपालिका पूरी तरह विधायिका की कृपापात्र बनी रही, और जिसमें वहीं जा सकता था, जिसके पास शिक्षित होने के लिए धन और भारत के सन्दर्भ में अधिकार भी हो।

न्यायपालिका को जाति-धर्म, अमीर-गरीब की मानसिकता से परे मान भी लें, तो भी वह उन्हीं कानूनों का पालन करने के लिए बाध्य है, जिसे उस विधायिका ने बनाया है, जो पूंजीपतियों के पूंजी के प्रवाह से बनी है। आज भारत में देशद्रोह, यूएपीए, अफ्स्पा, विभिन्न राज्यों के कोका कानून, राजकीय सुरक्षा कानून, कम्पनी सुरक्षा कानून जैसे जितने अधिक गैरलोकतान्त्रिक कानून मौजूद हैं, उसे देखते हुए ये पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि न्यायपालिका यदि पूरी तरह ईमानदारी से काम करे, तो भी वह लोकतन्त्र के खिलाफ ही जायेगी।

चौथे स्तम्भ प्रेस की लम्बे समय तक लोकतन्त्र की दिशा में आगे बढ़ने वाली भूमिका रही, लेकिन पूंजी के मुनाफाखोर चक्र ने प्रेस को भी अपने कब्जे में कर लिया, अब ये कॉरपोरेट घरानों के आंगन से काम करने वाली सत्ता का मुख बन चुकी है। यानि ये चार स्तम्भ जिसे अपने कंधे पर लिये आगे बढ़ रहा था, वो लोकतन्त्र नहीं, पूंजी या मुनाफातन्त्र है। अपनी जरूरतों को देखते हुए इसने पहले इसे लचीला बनाया, और अब जरूरत के अनुरूप ही इसे अपने पक्ष में सख्त करता जा रहा है। भयानक मंदी में डूबी पूंजी की आज की जरूरत ज्यादा आक्रामक होने की है ज्यादा एकाधिकारी होने की है, इसलिए यह हो रहा है। हमें यह लग रहा है कि लोकतन्त्र के स्तम्भ दरक रहे हैं, लेकिन वास्तव में सत्ता इन स्तम्भों पर अपनी पकड़ पहले से अधिक मजबूत बना रही है। इसे इसी दिशा में जाना था, हमारा काम इस दिशा के खिलाफ खड़े होना है, ताकि लोकतन्त्र को सही मंजिल तक पहुंचाया जा सके।

मरते बच्चे, बढ़ता विकास

जिस देश में बच्चे हर साल एक ही बीमारी से मरते आ रहे हों, जिस देश में बच्चे ऑक्सीजन सिलिण्डर के अभाव में मर जा रहे हों, उस देश की ऊंची विकास दर की छाती ठोंकना उदंडता, बेशर्मी और अश्लीलता है, लेकिन इसे ‘वे’ किये जा रहे हैं। किसी का तर्क है कि इन महीनों में तो बच्चे मरते ही हैं, किसी का तर्क है कि इसके लिए बच्चे खुद जिम्मेदार हैं कि वे गंदगी में रहते हैं, लीची खाकर भूखे सो जाते हैं, किसी का ये कि गर्मी ही इतनी ज्यादा है कि बच्चे तो मरेंगे ही। इनके अलावा कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनकी संवेदना को बच्चों की मौतें छू भी नहीं सकीं, उन्होंने कोई भी तर्क देने की बजाय इसमें रूचि दिखाई कि भारत पाकिस्तान के मैच में भारत पाकिस्तान को हरा रहा है या नहीं। इन मंतरी, संतरियों के अलावा जो भी इस वक्त भारत के बढ़ते विकास दर से गौरवान्वित हो रहा है, वे सभी इन बच्चों की मौत के लिए जिम्मेदार हैं, क्योंकि यह विकास इन बच्चों की लाशों पर हो रहा है।

इस विकास को लाने वाला विज्ञान इतना सक्षम है कि सालों से सैकड़ों बच्चों को मौत देने वाले ‘इन्सेफेलाइटिस बुखार से लड़ा जा सके, उसे खतम कर बच्चों को बचाया जा सके, लेकिन विज्ञान का यह विकास इन बच्चों के लिए नहीं है। सच्चाई ये है कि विज्ञान का विकास समाज की स्थिति नहीं बनाता, बल्कि विज्ञान किसके हाथ में है, इससे किसी समाज की स्थिति तय होती है। इस रूप में दोनों बातें हमारे समाज में एक साथ उपस्थित हैं। पहली ये कि आज विज्ञान इतना आगे बढ़ गया है कि वह जन्म और मृत्यु को प्रभावित कर सकता है, लेकिन यह कड़वी सच्चाई भी उपस्थित है, कि इस वैज्ञानिक विकास के दौर में भी सालों से हर साल सैकड़ों बच्चे एक बुखार से मरे जा रहे हैं, क्योंकि वे गरीब बच्चे उनका मुनाफा बढ़ाने में मददगार नहीं है।

आज विज्ञान इतना सक्षम है कि इस बात पर शोध कर सके कि हर साल होने वाले इस बुखार की क्या वजह है और इसका क्या इलाज है, लेकिन आज विज्ञान बाजार की जरूरतों से संचालित हो रहा है और ये मरने वाले बच्चे और उनके परिवार इसके उपभोक्ता वर्ग नहीं है, इसलिए उन्हें इस पर शोध कराने में कोई रूचि नहीं। यहां तक कि भारत में बच्चों को मारने वाले इस बुखार की दवा सालों से चीन भेज रहा है, भारत में इसकी दवा तक नहीं बनायी जा सकी है।

मंत्री जानते हैं कि ‘अगस्त में बच्चे मरते हैं’, फिर भी अस्पतालों में अनिवार्य तौर पर होने वाले ऑक्सीजन सिलिण्डर जैसे मामूली यंत्र का भी प्रबन्ध ठीक नहीं रखा जाता। यही इस विकास का मॉडल है, जिसमें गरीब इलाज के अभाव में छोटी सी बीमारी से भी दम तोड़ने के लिए अभिशप्त है और अमीर धन खर्च कर भारत के निजी बड़े अस्पताल या विदेशों में इलाज के लिए आजाद है.

विकास के इस मॉडल में गरीबी से पैदा हुई बीमारियों के प्रति घनघोर उपेक्षा का भाव मंत्रियों के बयानों से जाहिर ही हो जाता है। मुजफ्फरपुर के दिमागी बुखार में यह कॉमन है कि मरने से पहले सभी बच्चों का ब्लड शुगर लो हो जा रहा है और इसका एक कारण बच्चों का भूखे सोना या कम खा कर सोना है। भूखे सोना गरीब बच्चों का शौक नहीं, यह उनकी मजबूरी है, जो इस विकास के मॉडल से उपजी है। उनके मां-पिता मेहनत करने के बाद भी भरपेट भोजन नहीं जुटा पा रहे हैं, मंहगे निजी अस्पतालों में उनका इलाज तो बहुत दूर की बात है। यह विकास एक बड़े तबके से उनके जीने-खाने के हर संसाधन छीन रहा है, और कुछ लोगों के हाथों में केन्द्रित कर रहा है। यह ‘विकास’ भारत के उस भविष्य को लाश बना रहा है, जो कल बड़े होने पर अपने हिस्से की धरती आसमान हड़पने वालों के खिलाफ खड़े हो सकते थे। यह ‘विकास’ इनकी लाश पर आगे बढ़ रहा है। इसलिए इस ‘विकास’ के लिए अपनी छाती चौड़ी करने वाली व्यवस्था ही इन बच्चों की हत्या की दोषी है।
सीमा आज़ाद

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