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शमशेर बहादुर सिंह: सरकारें पलटती हैं जहाँ हम दर्द से करवट बदलते हैं !

आज हिंदी के इस अनूठे कवि शमशेर बहादुर की बरसी है। नामवर सिंह ने उन्हें ‘सुंदरता का कवि’ और मलयज ने ‘मूड्स के कवि’ कहा था। लेकिन वे इन सबसे बहुत अधिक थे। शमशेर बहादुर सिंह 13 जनवरी 1911 -12 मई 1993 आधुनिक हिंदी कविता की प्रगतिशील त्रयी के एक स्तंभ हैं। हिंदी कविता में अनूठे माँसल एंद्रीए बिंबों के रचयिता शमशेर आजीवन प्रगतिवादी विचारधारा से जुड़े रहे। ‘तार सप्तक’ से शुरुआत ‘कर चुका भी नहीं हूँ मैं’ के लिए साहित्य अकादमी सम्मान पाने वाले शमशेर ने कविता के अलावा डायरी लिखी और हिंदी उर्दू शब्दकोश का संपादन भी किया।

शमशेर बहादुर सिंह

हमारे दिल सुलगते हैं 
लगी हो आग जंगल में कहीं जैसे,
हमारे दिल सुलगते हैं।

हमारी शाम की बातें
लिये होती हैं अक्‍सर जलजले महशर के; और जब
भूख लगती है हमें तब इन्कलाब आता है।

हम नंगे बदन रहते हैं झुलसे घोंसलों में,
बादलों-सा
शोर तूफानों का उठता है –
डिवीजन के डिवीजन मार्च करते हैं,
नये बमबार हमको ढूँढ़ते फिरते हैं…

सरकारें पलटती हैं जहाँ हम दर्द से करवट बदलते हैं!

हमारे अपने नेता भूल जाते हैं हमें जब,
भूज जाता है जमाना भी उन्‍हें, हम भूल जाते हैं उन्‍हें खुद।

और तब
इन्कलाब आता है उनके दौर को गुम करने।

पूरा आसमान का आसमान

पूरा आसमान का आसमान
      एक इन्द्रधनुषी ताल
नीला साँवला हलका-गुलाबी
      बादलों का धुला
            पीला धुआँ…
मेरा कक्ष, दीवारें, किताबें, मैं, सभी
इस रंग में डूबे हुए-से
मौन।

और फिर मानो कि मैं
एक मत्‍स्‍य-हृदय में
       बहुत ही रंगीन,
       लेकिन
बहुत सादा साँवलापन लिये ऊपर,
देखता हूँ मौन पश्चिम देश :
लहरों के क्षितिज पर
एक
बहत ही रंगीन हलकापन,
बहुत ही रंगीन कोमलता।

कहाँ है
वो किताबें, दीवारें, चेहरे, वो
बादलों की इन्द्रधनुषाकार लहरीली
                   लाल हँसियाँ
                   कहाँ है?

एक आदमी दो पहाड़ों को कोहनियों से ठेलता

एक आदमी दो पहाड़ों को कोहनियों से ठेलता
पूरब से पच्छिम को एक कदम से नापता
बढ़ रहा है

कितनी ऊंची घासें चांद-तारों को छूने-छूने को हैं
जिनसे घुटनों को निकालता वह बढ़ रहा है
अपनी शाम को सुबह से मिलाता हुआ

फिर क्यों
दो बादलों के तार
उसे महज उलझा रहे हैं?

काल तुझसे होड़ है मेरी

काल,
तुझसे होड़ है मेरी: अपराजित तू-
तुझमें अपराजित मैं वास करूं ।
इसीलिए तेरे हृदय में समा रहा हूं
सीधा तीर-सा, जो रुका हुआ लगता हो-
कि जैसा ध्रुव नक्षत्र भी न लगे,
एक एकनिष्ठ, स्थिर, कालोपरि
भाव, भावोपरि
सुख, आनंदोपरि
सत्य, सत्यासत्योपरि
मैं- तेरे भी, ओ’ ‘काल’ ऊपर!
सौंदर्य यही तो है, जो तू नहीं है, ओ काल !

जो मैं हूं-
मैं कि जिसमें सब कुछ है…

क्रांतियां, कम्यून,
कम्यूनिस्ट समाज के
नाना कला विज्ञान और दर्शन के
जीवंत वैभव से समन्वित
व्यक्ति मैं ।

मैं, जो वह हरेक हूं
जो, तुझसे, ओ काल, परे है

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