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शीला तो राजनीति में दीक्षित हैं, लेकिन पत्रकारिता में दीक्षित क्यों कांग्रेस की शीला होने को आतुर हैं?

 इस समय कांग्रेस की नेता शीला दीक्षित कुछ ऐसे पत्रकारों के निशाने पर आ चुकी हैं, जो भाजपा-आरएसएस या नरेंद्र मोदी विरोधी हैं। वजह है उनका एक इंटरव्यू, जिसमें उन्होंने कह दिया, “मनमोहन सिंह… शायद मोदी जैसे मज़बूत और दृढ़ नहीं थे; लेकिन यह भी धारणा है कि उन्होंने यह सब राजनीति के लिए किया है, न कि वो ऐसा ही करना चाहते थे।”

दरअसल, मामला ये है कि दो दिन पहले एक टीवी चैनल पर प्रिंट और टेलीविजन जर्नलिस्ट, कॉलमिस्ट और टॉक शो हॉस्ट वीर सांघवी ने दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का इंटरव्यू किया। सांघवी ने जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों पर किए गए एयर स्ट्राइक पर शीला दीक्षित से प्रश्न पूछा तो वे बोलीं कि यह तो कोई भी करता! फिर सांघवी ने एक बहुत समीचीन और स्वाभाविक प्रश्न किया कि मनमोहन सिंह ने तो मुंबई पर हुए हमलों के बाद ऐसा नहीं किया था! इस पर शीला बोलीं, “मनमोहन सिंह… हां मैं आपकी बात मानती हूं कि वो शायद मोदी जैसे मजबूत और दृढ़ नहीं थे; लेकिन यह भी धारणा है कि उन्होंने यह सब राजनीति के लिए किया है। न कि वो ऐसा ही करना चाहते थे।”

हालांकि सांघवी ने इस प्रतिप्रश्न को शायद जानबूझकर छोड़ दिया कि जिस समय भारतीय लोकतंत्र का मंदिर कही जाने वाली संसद के भवन पर हमला हुआ तो एनडीए सरकार ने भी ऐसा कुछ नहीं किया था।

आजकल दिल्ली और शेष देश में जिस तरह की पत्रकारिता हो रही है, उसमें इस तरह के बयान को तो कोई भी ले उड़ेगा। शीला दीक्षित कोई सामान्य घरेलू महिला नहीं है कि उन्हें अपने किसी बयान के निहितार्थ पता नहीं हों। और संभव है, यह सब प्रायोजित हो! प्रायोजित शीला दीक्षित की तरफ से भी हो सकता है और सत्तारूढ़ खेमे की तरफ से भी। क्योंकि इसमें देखने की बात ये है कि इंटरव्यू करने वाला कौन है? वही सांघवी न, जो नीरा राडिया टैप्स में कहते सुने गए थे, “What kind of story do you want?” उन पर आरोप लगे थे कि उन्होंने नीरा राडिया के सुझाए गए कुछ बिंदुओं को अपने नियमित कॉलम “काउंटरपाइंट” में शामिल किया था। हालांकि बाद में सांघवी ने पूरे प्रकरण पर अपनी विस्तृत सफाई देकर आरोपों को निराधार करार दिया। लेकिन हम शक की दुनिया में ही जीते हैं और सांघवी कहते रहे हैं कि वे गुजराती जैन हैं। मोदी कहते हैं, मैं गुजराती बनिया हूं। और अमित शाह तो इन दोनों बयानों के वैसे भी मूर्त रूप हैं!

ख़ैर, शीला दीक्षित ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना में जो कहा है, उससे असहमत तो हुआ जा सकता है, लेकिन उनके कथन को लेकर पत्रकार उनकी राजनीतिक समझ पर शक़ करने लगें तो हैरानी होती है। अरे भाई, ये बात कोई कांग्रेसी कहे तो समझ आता है, लेकिन पत्रकार कहे तो हैरानी होती है। क्या आप लोगों को वह सब नहीं कहने देंगे, जो वे अपनी पार्टी के भीतर रहकर किसी इंटरव्यू में कहना चाहते हैं? अब अगर भाजपा में जाते हुए टॉम वडक्कन कांग्रेस के बारे में कुछ कहे तो उस पर तंज कसने का अधिकार सबको है। हम कह सकते हैं कि फ़िसल गए तो हर गंगे या सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली; लेकिन कोई नेता अगर 15 साल दिल्ली की सीएम रही है, महिला होने के बावजूद कुटिल कांग्रेस-जन के बीच टिकी रही है और भ्रष्टाचारियों से घिरे रहकर खाती-खेलती और बचती-बचाती रही है तो क्या उसे एक इंटरव्यू में कुछ ऐसा कहने का अधिकार भी नहीं, जो वह सोचती है? एक पत्रकार के नाते उनका यह बयान बहुत अच्छा है और इसमें वह सब है, जो एक अच्छी ख़बर के लिए चाहिए। पत्रकारिता के मानदंडों के हिसाब से सांघवी का यह पीस बहुत सफल है।

किसी राजनेता के विवादित बयान से, भले वह किसी भी दल का हो, ख़बर बन रही है या इंटरव्यू कंट्रोवर्सी क्रिएट कर रहा है तो फिर क्या चाहिए? हमें विवादित बयान या अंतर्निहित विवादों वाले बयान देने वाले किसी नेता को ग़लत क्यों कहना चाहिए? हम उसे ग़लत मानते हैं तो हम कैसी पत्रकारिता चाहते हैं? पत्रकार अगर प्रोफेशनलिज़्म छोड़कर भावुक और पक्षपाती होकर सोचने लगें तो यह शायद पत्रकारिता के लिए अच्छा नहीं है। बल्कि कुछ-कुछ वैसा ही है, जैसा आजकल जी टीवी से लेकर रिपब्लिक टीवी तक फैला हुआ है। पत्रकारों के उस रुझान पर भी हैरानी होती है, जब वे प्रियंका गांधी के कांग्रेस प्रवेश पर अपनी प्रसन्न आंखें चमकाते हैं। अभी मनमोहन सिंह, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को लेकर कांग्रेसी उतने उत्साहित नहीं है, जितने बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना टाइप प्रोग्रेसिव खेमा नजर आ रहा है। ब्रिलिएंट पत्रकार करण थापर का वह इंटरव्यू क्या कम करेजश है, जिसमें नरेंद्र मोदी जैसा नेता पानी पीने लगा और प्रश्नों का सामना नहीं कर सका? क्या उस पर हम नरेंद्र मोदी को बचकाना कहेंगे? नहीं। करण थापर कुछ नहीं था। नरेंद्र मोदी के मैदान छोड़ने की घटना ने उसमें ब्रिलिएंसी का रंग और करेज के नूर भरे।

आप सोचिए, कांग्रेस के प्रति सहानुभूति रखने वाले और किस्म-किस्म की मलाइयां खाने वाले पत्रकारों को महज पांच साल गैरकांग्रेसी सत्ता में इतना बुरा लग रहा है तो एक बार उनकी भी सोचिए, जो भाजपा या आरएसएस के प्रति खुली सहानुभूति रखते हैं, और दशकों-दशक सत्ता के के गलियारों पर दुत्कारे जाते रहे हैं। अरे भाई, इस देश के लोक में कहा जाता है, बारह साल में एक बार घूरे के भी दिन फिरते हैं। लेकिन हैरानी देखो कि बहत्तर साल में एक बार घूरे वालों के दिन फिर गए तो सुरूरे वाले दु:खी और हताश हो रहे हैं। उन्हें कष्ट है कि सब कुछ घूरे में क्यों बदला जा रहा है! हद है!

अभी सत्ता-दल की स्मृति बनकर ठाठ कीजिए। फिर भले आप ईरानी ही क्यों न हों! ठहरिए, कुछ दिन इसका भी आनंद लीजिए, और अपने आपको किसी भी दल की शीला होने से बचाइए! इसी से पत्रकारिता के शील और स्मृति की सुरक्षा रहेगी।

अरे भाई, हम लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहते हैं। क्या हुआ अगर अब तांत्रिक-लोक की व्यवस्था में आ गए!

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