लोकवाणी

मुख़्तलिफ़ आवाज़, निगाह और विचार

रिपोर्ट

छपाक रिव्यु: चीख़ में छिपी भाषा भविष्य में सामने आयेगी जब एक संवेदनशील समाज होगा

शुभा

“छपाक” इस मायने में एक साहसिक फिल्म है कि यह हिन्दी फिल्मों और समाज में दूर तक छाई हुई उपभोक्तावादी सौंदर्यदृष्टि को किनारे करती है. एक हस्तक्षेपकारी मनुष्य -दृष्टि से काम लेते हुए यह सुन्दरता के प्रति मौजूद रूढ़ समझ को बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के दरकिनार कर देती है. कोई बड़ा नैरेटिव नहीं, अलग सौंदर्य दृष्टि कायम करने की, कलात्मकता के नए मानदंड रचने की कोई अतिरिक्त महत्वाकांक्षा नहीं. बहुत सादगी और न्यूनतम रचनात्मक स्ट्रैटेजी के साथ यह एक जगह उन लोगों के लिये जीत लेती है जिन्हें कोई देखना भी नहीं चाहता. फिल्म न केवल उनका मंच रचती है बल्कि उनकी मनुष्यता और कर्तृत्व को भी स्थापित करती है. संवाद कम हैं और वे अपना काम अचूक तरीके से करते हैं. कमज़ोर पृष्ठभूमि से आगे निकलने वाली, अपनी इच्छा से आगे कुछ करने का स्वप्न संजोने वाली लड़की एसिड के हमलों की शिकार होती हैं यह बात एक संवाद में स्थापित हो जाती है. कोर्ट में एसिड सर्वाईवर का प्रेमी जब पलट जाता है और बयान देता है कि हम बस दोस्त थे तब “नायिका” की नज़र के रूप में जिस नज़र को फिल्म कैप्चर करती है वह केवल उत्पीडित की नज़र नहीं है. वह एक विवेशील स्त्री व्यक्ति की नज़र है जो पलट जाने वाले पुरुष की शिनाख़्त कर रही है.

यह पहली फिल्म है जो एक युवा नागरिक लड़की पर बनी है जो स्वयं अपने लिये स्वप्न देखती है और सार्वजनिक स्पेस में पैर जमाना चाहती है एसिड अटैक से पहले भी और बाद में भी. वह नेता नहीं है लेकिन नेतृत्वकारी भूमिका निभाती है. बहुत स्वाभिक तरीके से. नायक-नायिका, प्रेमी-प्रेमिका और विलेन के तमाम तूमारों से मुक्त यह एक प्रेमकथा भी है जिसमें नायक और अपराधी को अलग-अलग पहचाना जा सकता है.

हिन्दी फिल्मों में हीरो की जगह एक साईकोपैथ स्थापित हो चुका है और अक्सर प्रेमकथा एक अपराध कथा होती है जिसमें मध्ययुगीन शूरवीरता और आधुनिक मानसिक विकृति के मसाले की बैसाखियों पर नायक की मर्दानगी को स्थापित किया जाता है. इसका लेटेस्ट उदाहरण “कबीरसिंह” है. जबकि ‘छपाक” में पुरुष का स्वाभाविक और मानवीय चेहरा दिखाई देता है. पीड़िता के पिता और एसिड अटैक के ख़िलाफ़ काम करने वाले वालंटियर के रूप में भी. एक संवेदनशील, दुर्लभ सुन्दर पुरुष चेहरा दिखाई देता है. “हीरो” की हेकड़ी और संकोच में वह कुछ शर्माता भी है और हीरोईन की दी हुई नीली शर्ट पहने हुए कुछ गर्व जैसा भी छिपाए हुए है. इस फिल्म में कम से कम दो प्रेम-दृश्य बहुत सुन्दर हैं लेकिन शायद उन्हें अभी न देखा जा सके.

“छपाक” में हीरो की संरक्षक वाली जगह, हीरोईन एक संवाद में छीन लेती है संवाद है “आपको लगता है कि एसिड अटैक आप पर हुआ है जबकि वह मुझ पर हुआ है” इस तरह वह अपने ख़ुश होने और स्वाभाविक तरीके से साथ के कार्यकर्ताओं के साथ “पार्टी” मनाने की जगह नहीं छिनने देती.

फिल्म में ” कहानी” का कोई दबाव नहीं है फिल्म वर्णन से लगभग मुक्त है हालांकि यह नायिका की सात सर्जरी और एसिड बैन के लिये सात या नौ साल के संघर्ष का ठोस संदर्भ लिये हुए है. एसिड बैन नहीं होता लेकिन उसकी बिक्री को रैग्यूलेट करने के लिये कानून बनता है. आगे के काम अभी पड़े हैं. यह मात्र सफलता की कोई साधारण कहानी नहीं है. फिल्म एक लड़की पर एसिड अटैक और चीख़ के साथ ख़तम होती है.

फिल्म के शुरू में भी और आख़िर में भी चीख़ लगभग एक चरित्र की तरह मौजूद है. इस चीख़ में छिपी भाषा भविष्य मे सामने आयेगी जब एक संवेदनशील समाज होगा. यह चीख़ युवा लड़की की पीड़ा पर एक गहरी टिप्पणी की तरह है जिसे पढ़ने की एक आरम्भिक कोशिश फिल्म में की गई है लेकिन पढ़ा जाना अभी बाकी है.

इस फिल्म को लोग देख रहे हैं. यह लो बजट की फिल्म है जो व्यावसायिक लाभ के लिये नहीं बनाई गई है. निश्चित रूप से न केवल इसकी लागत निकल चुकी है बल्कि ये प्रोड्यूसर को अगली फिल्म बनाने का उत्साह देने लायक स्थिति में है.

ताना जी जैसी फिल्म और बाक्स आफिस के गुणगान से इस फिल्म का कोई धागा नहीं जुड़ता इन फिल्मों की कोई तुलना नहीं हो सकती. ये अलग लगभग विपरीत आधार और सौंदर्य-सिद्धांत पर बनी फिल्म हैं.

फिल्म मे कुछ यादगार दृश्य हैं मसलन एसिड अटैक से बची लड़कियां जो मिलकर इसके ख़िलाफ़ काम करती हैं. उनकी एक कम्युनिटी है. ट्रेन में वे एक डिब्बे में हैं और ख़ुश हैं, हंस रही हैं गा रही हैं. टिकट चैकर जब टिकट चैक करने के लिये आता है तो इन लड़कियों को हल्के से डर और अचकचाहट के साथ देखता है और जल्दी से वहां से खिसक जाता है. एडीटिंग और निर्देशन के लिहाज़ से यह एक निर्दोष और चुस्त-दुरुस्त फिल्म है.

जिस लड़की की त्वचा कोमल आदि नहीं है उसकी सुन्दरता, प्यार और शरारत से भरी नज़र फिल्म स्थापित करती है. दीपिका पादुकोण और मेघना गुलज़ार और उनकी टीम बधाई की पात्र है. फिल्म ने एसिड सर्वाईवर की पीड़ा, ख़ुशी, पहलक़दमी, प्यार और सुन्दरता को पहली बार पर्दे पर दृश्यमान बनाया है. यह (स्त्री) मनुष्यता को बाज़ार और अन्धउपभोक्तावादी आक्रामक शक्तियों से संचालित समाज के बीच फिर से परिभाषित करने का छोटा सा, सुन्दर और विनम्र प्रयास है. फिल्म किसी भी तरह के आदर्शवाद से मुक्त है. कोई नैतिक कोड़ा भी फिल्म में नहीं है और स्त्रीवाद का कोई आग्रह भी नहीं है. आप पूरी सांस लेते हुए फिल्म देख सकते हैं. यह एक बार देखने लायक फिल्म ज़रूर है.

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *