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समालोचना

पुस्तकालयों में लाइब्रेरियन की जगह ढोलक बजाने वालों को क्यों नियुक्त करना चाहिए ..

Shyam Meera Singh

पुस्तकालय आदमी बनाने की मशीने होते हैं. जहाँ इक्कीसवीं सदी का एक आम आदमी भी सभ्यता के शुरूआती दौर के लेखकों, स्मृतिकारों और उपन्यासकारों से किताबों में छपे उनके शब्दों के माध्यम से बातें कर सकता है और उन्हें समझ सकता है. कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के पुस्तकालय ने अपने फेसबुक पेज पर फर्श पर लेटकर पढ़ते हुए एक पाठक का चित्र साझा करते हुए लिखा है कि ‘’आप कैसे भी पढ़िए हमें फर्क नहीं पड़ता लेकिन आप हमारी किताबें पढ़ने आते हैं यही हमारे लिए सबसे कीमती है।’’
विश्विद्यालय में लाइब्रेरी के प्रति छात्रों के रुझान को बनाए रखने के लिए जो संवेनशीलता कैम्ब्रिज विश्विद्यालय ने दिखाई है क्या उसका एक अंश भी भारतीय विश्वविद्यालयों या शिक्षा संस्थानों में देखने को मिल सकता है? उसी फेसबुक पोस्ट के नीचे कमेंट बॉक्स में बलूचिस्तान के एक छात्र ने अपने यहाँ की एक पुस्तकालय का फोटो साझा किया है जिसमें बैठने के लिए सीट न होने के कारण सुबह 6 बजे से ही छात्र कतार में लगे हुए हैं. बलूचिस्तान जैसे अस्थिर क्षेत्र में भी लाइब्रेरी की कीमत को समझा जा रहा है.

हमें जब भी भारत की शिक्षा व्यवस्था के अतीत पर बोलने के लिए दो मिनट भी मिल जाते हैं तो उसमें नालंदा और तक्षशिला विश्विद्यालयों के पुस्तकालयों का जिक्र करना हम कभी नहीं भूलते, लेकिन वर्तमान में उन्हीं के जैसे पुस्तकालयों के होने की आवश्यकता पर किसी का ध्यान नहीं जाता. मेरे अपने देश में पुस्तकालयों के अनुभवों को जानेंगे तो आप हसेंगे और शायद शर्मिंदगी भी महसूस करेंगे.

पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान पहले ही दिन इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मास कम्युनिकेशन यानी आईआईएमसी के डायरेक्टर जनरल ने माइक पर बड़े गर्व से कहा था कि IIMC का पुस्तकालय पत्रकारिता के क्षेत्र में एशिया में सबसे बड़ा है. लेकिन वहां बिताए गए सालभर के अनुभवों ने उनकी इन हवा-हवाई बातों के गुब्बारे फोड़ दिए. मैं यहां दो-चार अनुभव यहां लिख रहा हूँ.

पहला, IIMC में पुस्तकालय की इंचार्ज ने पानी की बोतल लाने पर भी पाबंदी लगा दी थी, यानी आपको हर तीस मिनट बाद जब प्यास महसूस होगी तो आपको अपनी टेबल छोड़कर पुस्तकालय के बाहर जाकर पानी पीकर आना होगा. लाइब्रेरी में लंबी सिटिंग करने वालों के लिए पास में पानी रखा रहना जरूरी होता है जिससे आप लंबे समय तक पढ़ सकें. मैंने लाइब्रेरी के प्रशासन से व्यक्तिगत रिक्वेस्ट की लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई, मैंने एप्लिकेशन लिखे उसके बाद भी कोई सुनवाई नहीं हुई, लाइब्रेरी के प्रशासन ने अपने फैसले को बदलने से साफ़ मना कर दिया गया. लाइब्रेरी की सर्वोच्च अधिकारी ने भी मेरी शिकायत पर दांत निपोर दिए. आखिर में हारकर संस्थान के सर्वोच्च अधिकारी यानी डाइरेक्टर जनरल को एप्लिकेशन लिखे गए, और अंततः उनसे ऑफिस में लम्बी बहस के बाद हमें पुस्तकालय में पानी की बोतल ले जाने की अनुमति मिली.
दूसरी, पुस्तकालय, दफ्तर और वाचनालय एक ही छत पर होने के कारण लोगों के आवागमन के शोरगुल की वजह से पढ़ना बड़ा मुश्किल हो जाता था. लाइब्रेरी के अधिकारी खुद ही आपस में बातचीत करते रहते थे. उनके फोन शायद ही कभी साइलेंट पर रहते हों, हद्द तो तब हो जाती थी जब लाइब्रेरी के कर्मचारी पुस्तकालय में ही फोन पर बातचीत करने लगते. कई बार ऐसा भी होता कि अधिकारी मंद-मंद मुस्कान के साथ आवाज़ कम कर फ़ोन में वीडियो का आनदं भी ले लिया करते थे. इतना ही नहीं लाइब्रेरी के कर्मचारी और अधिकारी आपस में बैठकर लाइब्रेरी में ही ठहाके लगाते और गप्पे हांकते थे. अचरज की बात यह भी थी कि ऐसा करना वे अपना अधिकार मानते थे. बातचीत न करने के अनुरोध को वे अपना विरोध समझते थे.

इन सब समस्याओं के विरोध में हमने शिकायत की तो सबने दुश्मन मान लिया. जब शोरगुल की समस्या को लेकर छात्र संयोजक से शिकायत की तो वह बोलीं कि ‘’बेटा लक्ष्य पर ध्यान दो फिर आवाज सुनाई नहीं देगी’’. उन्होंने एक उदाहरण देकर और समझाया ‘’देखो बेटा जब बारिश आती है तो कितना शोरगुल होता है , बादलों की कितनी कडकडाहट होती है लेकिन अगर उसी दौरान अगर फ़ोन की घंटी बजती है तो सुनाई देती है इसके पीछे ध्यान की ताकत है और लक्ष्य के प्रति हमारे निष्ठा की ताकत है … मतलब मैडम जी ने समस्या को अपने फिलोसोफिकल अन्दाज से ही सुलझाया दिया होता. वाह इतनी अच्छी सलाह, और इतना अच्छा समाधान .. ये तो अद्भुत है कलाकारी है! इसपर तो भारत को जल्दी से WTO में दो आदमी भेजकर कॉपीराइट की ट्रिप्स नामक संधि के अंतर्गत अपना पेटेंट करा लेना चाहिए वरना इस विधि को विदेशी लोग चुरा लेंगे… खैर
छात्र सयोंजक की इस गोलीबाजी से निराश होकर जब कोर्स डायरेक्टर से इसकी शिकायत की तो उन्होंने कहा कि ”23 साल से वे इस संस्थान में हैं इतने बड़े बड़े पत्रकार इस संस्थान ने निकाल दिए लेकिन किसी ने भी अलग शांत रीडिंग रूम की मांग नहीं की. तुम्हें लाइब्रेरी मिल भी जाएगी तब भी तुम उस स्तर के बड़े पत्रकार नहीं बन पाओगे, और न भी मिली तब भी अगर तुम्हारे अंदर सामर्थ्य होगा तो बिना लाइब्रेरी के ही तुम बड़े पत्रकार बन जाओगे लेकिन अगर सच कहूँ तो मुझे तो तुम्हारी मांग में राजनीतिक प्रपंच लग रहा है.

कोर्स डायरेक्टर की असंवेदनशीलता से भावविभोर होकर मैं और मेरा साथी दोस्त कृतग्य हो गए.

जब हर जगह से निराशा मिली तो हमने संस्थान के डायरेक्टर जनरल से बातें करनी चाहीं , इस बाबत एप्लिकेशन लिखकर अलग वाचनालय की मांग की तो उन्होंने अलग ही स्वैग(अंदाज) में समाधान निकाल दिया. उन्होंने हमें अपने बचपन की कहानी सुनाई, उन्होंने बताया कि ”जब वह बचपन में पढ़ते थे तो उनके आसपास ढोलक वाले रहते थे, बैंड वाले रहते थे, दिन भर ढोलक की आवाज आती थी लेकिन तब भी उन्होंने पढ़ाई की और आज देश के सर्वोच्च पत्रकारिता संस्थान के डायरेक्ट जनरल बन गए हैं.”

वाह-वाह. इतना अद्भुत सफलता मन्त्र है ये तो ! इतनी महान महान कहानियों को सुनकर ऐसा लगता है कि सरकार को पुस्तकालय बनाते समय लाइब्रेरियन न रखकर दो-दो ढोलक वाले रखने चाहिए ताकि बच्चे मन लगाकर एकाग्रचित्त होकर पढ़ा करें और भविष्य में किसी संस्थान के वाइस चांसलर या डीजी बनकर आने वाली पीढ़ियों को भी यही सलाह दें और ढोलक मजीरा का इंतजाम करवाया करें.

खैर ये सब बातें थीं प्रशासन की, लेकिन छात्र भी एक से एक महान मिले जो छात्र कम राजनीतिक पार्टियों के बगुले ज्यादा थे. चूँकि डीजी केंद्र में बनी हुई सरकार की भेजी हुई कठपुतली थे इसलिए सत्ता के रसूख ने छात्रों को भी प्रभावित किया.
अलग वाचनालय के लिए एवं पुस्तकालय के समय को बढाने के लिए जब कुछ छात्रों ने मांग की तो कुछ छात्र विचारधाराओं के झंडे ढोने वाली अपनी निष्ठा दिखाने के लिको साबित करने ले लिए प्रशासन की गोद में ही जा बैठे.. और मांग करने वाले छात्रों के खिलाफ़ लोन-वोल्फ़ की तरह काम करने लगे, प्रशासन की गोद में बैठे इन छात्रों द्वारा पुस्तकालय की मांगों को छद्म मांगे बताया गया. कहा गया कि ये फ़ालतू की मांगे हैं व्यवहार्य नहीं है अथवा व्यक्तिगत तैयारी के लिए मांग की जा रही हैं. उस समय किस तरह दक्षिणपंथ की विचारधारा में नहाए हुए कुछ छात्रों ने किस तरह आँख बंद कर हमारा विरोध किया थे उसके साक्ष्य के रूप में अब भी तमाम स्क्रीनशॉट रखे हुए हैं.
मैं इस बात को इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि जब भी देशभर से अयोध्या में उमड़ी मूर्ख नौजवानों की भीड़ को हम टीवी पर देखते हैं तो आश्चर्य करते हैं कि ये कौन लोग हैं, ये भीड़ रोटी, रोजगार, कपड़े की मांग की जगह मंदिर की मांग करती है. तो उसके पीछे यही कारण है कि हमारे देश में शिक्षा को तो सीरियस लिया गया लेकिन उसकी गुणवत्ता को कभी सीरियस नहीं लिया गया. कभी भी पुस्तकालयों के विकास पर कोई बात नहीं हुई. जब आप बैठकर पढ़ेंगे ही नहीं, चिंतन नहीं करेंगे तो पार्टियों और जातियों के झंडों को तो ढोएंगे ही.. और आपका नेता आपका चूतिया ही नहीं काटेगा वह आपके चुतियाफे़ को पहले वोट में ट्रांसलेट करेगा फिर उसे काटेगा, कृषि विज्ञान में इसे ही फ़ूड प्रोसेसिंग कहते हैं
जिस वाचनालय को पाने के लिए IIMC के 2017-18 बैच के कुछ छात्र तीन दिन तक भूख हड़ताल पर रहे, कितने ही लड़के-लड़की तीन दिन अपने कमरों पर नहीं जा सके. भूखे प्यासे ही फरवरी की स्याह ठंडी रात में खुले में ही डेरा डाले रहे, उसी संस्थान की अगले बैच की पीढ़ी से प्रशासन ने दोबारा से वाचनालय छीन लिया, अचरज और असहज करने वाली बात यह है कि किसी एक स्टूडेंट ने भी इसके लिए बोलना जरूरी नहीं समझा.… अगर कुछेक छात्रों ने थोड़ा बहुत चूं करने की कोशिश भी होगी तो मुझे IIMC के प्रशासन पर पूरा भरोसा है कि उसने पहले की तरह ही पाखण्ड रचकर उन बच्चों को दबा दिया होगा और उनके समानांतर कुछ पुतले भी खड़े कर दिए होंगे.

आज वह रीडिंग रूम दोबारा से बन्द कर दिया गया है..
जब भी इस घटना को महसूस करने की कोशिश करता हूँ तो जेहन में एक ही बात आती है कि ”पुस्तकालय किसी भी राष्ट्र के निर्माण के लिए मिट्टी और गारा हैं इस बात को समझने में इस देश को वर्षों लग जाएंगे…

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