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भारत छोड़ो आंदोलन में आरएसएस के डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी की भूमिका

गोपाल राठी

कश्मीर के संदर्भ में आज डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी को बार बार याद किया जा रहा है। क्योंकि धारा 370 खत्म करने की मांग के लिए किये गए आंदोलन के दौरान कश्मीर में उनकी मृत्यु हो गई थी।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी जिन्होंने 1952 में जनसंघ की स्थापना की. वो जनसंघ जो बीजेपी का पूर्व अवतार थी. ये वही श्यामा प्रसाद मुखर्जी हैं जिनका गुणगान करते बीजेपी और आरएसएस के लोग आज थकते नहीं हैं, जिनकी मौत को बीजेपी के लोग कश्मीर के लिये की गई शहादत मानते हैं, वो उस वक्त हिंदू महासभा में थे जिसके अध्यक्ष सावरकर थे. 1942 में हिंदू महासभा ने बंगाल में जिन्ना की मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सरकार बनाई थी. लीग के फजल-उल-हक तब मुख्यमंत्री थे. श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस सरकार में उपमुख्यमंत्री थे. जैसे-जैसे आजादी की लड़ाई परवान चढ़ती गई, बंगाल की लीग-महासभा की संविद सरकार का जुल्म बढ़ता गया.

जिन श्यामा प्रसाद मुखर्जी को आज प्रचंड राष्ट्रवादी और प्रखर देशभक्त के तौर पर आरएसएस/बीजेपी/हिंदुत्ववादी पेश करते है उनकी तब के अंग्रेज गवर्नर को लिखी चिठ्ठी हतप्रभ कर देती है और ये सवाल खड़ा करती है कि क्या उन्हें सही मायनों में देशभक्त कहा जा सकता है?

उन्होंने 26 जुलाई, 1942 को गवर्नर को आधिकारिक तौर पर लिखा था- “सवाल ये है कि बंगाल में भारत छोड़ो आंदोलन का सामना कैसे किया जाये? प्रशासन को इस तरह से चलाया जाये कि कांग्रेस की भरसक कोशिश के बाद भी ये आंदोलन बंगाल में अपनी जड़ें न जमा पाये, असफल हो जाये. … भारतीयों को ब्रिटिशर्स पर यकीन करना होगा, ब्रिटेन के लिये नहीं, या इससे ब्रिटेन को कोई फायदा होगा, बल्कि बंगाल राज्य की सुरक्षा और स्वतंत्रता के लिये.”

हम श्यामा प्रसाद को महान और देशभक्त तब मानते जब फजल-उल-हक की सरकार से इस्तीफा देते और आंदोलनकारियों के साथ अंग्रेजों की लाठियां खाते. पर उन्होंने ऐसा नहीं किया. वो जिन्ना की पार्टी के साथ मिलकर आंदोलनकारियों पर लाठी भंजवाते रहे.

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