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#KabirSingh: ‘रेप की कोशिश’ करने वाला हीरो कैसे बना?

 सिन्धुवासिनी

“अगर वो मेरी नहीं हुई तो उसे किसी और की नहीं होने दूंगा.”

“और अगर तेरी हो गई तो सबकी होने देगा?”

हाहाहहाहाहा! ‘जोक’ पढ़ लिया, अब आगे पढ़िए.

वैधानिक चेतावनी: इस फ़िल्म की शूटिंग के दौरान किसी महिला को नुक़सान नहीं पहुंचाया गया है. फ़िल्म लड़कियों का पीछा करने, उन्हें मारने-पीटने और उनके साथ ज़बरदस्ती करने का किसी भी तरीके से समर्थन नहीं करती.

फ़िल्म शुरू होने से पहले ऐसे डिस्क्लेमर शराब-सिगरेट और नशीली चीज़ों के इस्तेमाल के लिए दिए जाते हैं. बताया जाता है कि फ़िल्म की शूटिंग में किसी जानवर को नुक़सान नहीं पहुंचाया गया है लेकिन अगर ‘कबीर सिंह’ जैसी फ़िल्में बनती हैं तो ऐसी चेतावनी दी जानी चाहिए.

सवाल तो ये है कि साल 2019 में ‘कबीर सिंह’ जैसी फ़िल्में बन कैसे रही हैं और दर्शक इन्हें देखकर लार कैसे टपका रहे हैं?

वैसे, शुरुआत में जो ‘जोक’ आपने पढ़ा वो फ़िल्म का हिस्सा नहीं है, लेकिन उसे सबसे शुरू में क्यों रखा गया, वो आख़िर में पता चल जाएगा.

नोट- अगर आपने अभी ‘कबीर सिंह’ नहीं देखी है और आपके मन में इसे देखने की प्रबल इच्छा है तो ये यहीं रुक जाइए क्योंकि आगे कुछ स्पॉइलर हैं.

फ़र्स्ट इयर में एक लड़की आई है. सफ़ेद कमीज-सलवार में है. वो मेरी बंदी है. अगर किसी ने उसकी ओर आंख उठाकर देखा तो उसके पिछवाड़े में इंजेक्शन घुसा दूंगा. उसे छोड़कर बाकी सारी लड़कियां तुम्हारी.

प्रीति, चुन्नी ठीक करो.

चुप्प्प! क्या बकवास कर रही है? दो दिन से एक ही बात रट रही है, एक बार बोल दिया ना. समझ नहीं आता क्या?

तू है कौन? तेरी औकात क्या है? तू सिर्फ़ कबीर सिंह की बंदी है. छह घंटे हैं तेरे पास, अपने बाप को समझा ले. तड़ाक! (लड़की को ज़ोरदार थप्पड़)

फ़ुटबॉल इज़ अ वॉइलेंट गेम सर. वो हमारे पाले में आते हैं, हम उनके पाले में जाते हैं. अगर हम सामने वाले को नहीं रोकेंगे तो वो हम पर चढ़ जाएंगे. ये फ़िल्म ‘कबीर सिंह’ के कुछ डायलॉग हैं. इनमें कुछ गड़बड़ लगी?

डायलॉग के बाद अब फ़िल्म के कुछ दृश्य देखते हैं.

-फ़िल्म का ‘हीरो’ चाकू लिए खड़ा है और चाकू की नोक पर एक लड़की से कह रहा है: चल कपड़े उतार, कपड़े उतार जल्दी!-फ़िल्म के ‘हीरो’ को ‘शर्मीली’ और ‘डरी-सहमी’ जूनियर लड़की से पहली नज़र में ‘प्यार’ हो जाता है और वो तय कर लेता है कि वो उसकी बंदी है. वो पूरे कैंपस में इसका ऐलान कर देता है. ये बात अलग है कि उसे उस जूनियर लड़की के बारे में कुछ नहीं मालूम. उसका नाम तक नहीं. न वो उसे अपनी फ़ीलिंग्स के बारे में कुछ बताता है, न पूछता है. बस ऐलान कर देता है कि वो उसकी बंदी है.

-उस लड़की का दोस्त कौन होगा, रूममेट कौन होगा, ये ख़ुद ‘हीरो’ तय करता है. वो एक ‘हेल्दी’ (मोटी पढ़िए) लड़की को उसकी दोस्त बनाता है और कहता है: हेल्दी लड़कियां टेडी बियर जैसी होती हैं, वो वफ़ादार होती हैं. ख़ूबसरत लड़की और ‘हेल्दी’ लड़कियों की दोस्ती अच्छी होती है. ऐसा करने से पहले वो उसके पास बैठी दो सामान्य सी दिखने वाली लड़कियों को पीछे की बेंच पर भेज चुका होता है.

-वो कैंपस में आई नई-नई उस लड़की को अपने पास बुलाता है और उसके बिना पूछे, बिना उसके दिल को टटोले सबके सामने उसके गाल पर किस कर लेता है और कहता है: किसी ने नही देखा, जाओ क्लास करो.

-एग्ज़ाम ख़त्म होने के बाद लड़की कैंपस में दो दिन और रुकना चाहती है. इसलिए डरी-डरी आवाज़ में वो ‘हीरो’ से कहती है: कबीर, एक बात पूछूं? ग़ुस्सा तो नहीं हो जाओगे? मैं दो दिन और रुक जाऊं? प्लीज़ ना? जवाब में ‘हीरो’ ग़ुस्से में उस पर बुरी तरह चीखता है और फिर उसे किस कर लेता है. (यू सी, वो उससे बहुत ‘प्यार’ करता है)

-वो फ़ुटबॉल खेलते हुए बड़े ही स्टाइलिश अंदाज़ में स्लो मोशन में ग्राउंड पर पिच्च-पिच्च थूकता है और सिनेमा हॉल की विशाल स्क्रीन पर उसके थूक को ऐसे लहराते हुए दिखाया जाता है जैसे मोगरे के फूल बिखर रहे हों.

-वो लोगों को ऐसे पीटता है कि उनके नाक-मुंह और जाने कहां-कहां से ख़ून निकलने लगता है और वो उल्टे पांव भाग खड़े होते हैं. वो कभी भी किसी पर भी चीख़ सकता है, किसी को भी मारकर अधमरा कर सकता है और इसका उसे कोई अफ़सोस नहीं है. वो बड़े गर्व से कहता है- आई एम नॉट अ रेबेल विदाउट अ कॉज़. ये बात और है कि वो किस ‘नेक’ वजह से ‘विद्रोह’ करता है, वो किसी भी समझदार व्यक्ति को कभी समझ नहीं आता.

-उसके अंदर इतनी ‘आग’ है कि लड़की की शादी किसी और से होने के बाद वो भरी दुपहरी में सबके सामने अपनी पैंट में बर्फ़ के टुकड़े डाल लेता है.

ये सारे डायलॉग और सीन उस फ़िल्म ‘कबीर सिंह’ के हैं जो साल 2017 में आई ‘अर्जुन रेड्डी’ का रीमेक है. यानी, ऐसी ही एक फ़िल्म, बल्कि इससे भी ज़्यादा ‘ख़तरनाक’ फ़िल्म दो साल पहले भी आ चुकी है और धमाल मचा चुकी है.

अब शाहिद कपूर और कियारा आडवाणी की ‘कबीर सिंह’ भी धमाल मचा रही है. बताया जा रहा है कि ये शाहिद कपूर की ‘सबसे ज़बरदस्त’ ओपनिंग वाली फ़िल्म है.फ़िल्म का नाम ‘कबीर सिंह’ इसलिए है क्योंकि फ़िल्म के हीरो यानी शाहिद कपूर का नाम कबीर सिंह है.

फ़िल्म कबीर की कहानी है. वो फ़िल्म का मुख्य किरदार है, नायक है.लेकिन फ़िल्म में ऐसा क्या है जो इस पर इतनी लंबी-चौड़ी बहस हो रही है, रिव्यू के बजाय इस पर लेख लिखे जा रहे हैं, तारीफ़ें हो रही हैं, आलोचना हो रही है, बचाव हो रहा है? फ़िल्म में दिक्कत कहां है?

फ़िल्म की दिक्कतें जानने के लिए शुरू से शुरू करते हैं. उसी ‘चुटकुले’ से, जो हमने सबसे पहले पढ़ा था और पढ़कर हंसे थे.

1.वो मेरी बंदी है बे!

‘वो मेरी नहीं हुई तो किसी और की नहीं होने दूंगा’- फ़िल्म का लब्बोलुआब बस इसी एक लाइन पर टिका है. दुर्भाग्य से ये एक तथाकथित चुटकुले की लाइन है. मगर एक सच ये भी है कि दुनिया में सबसे गंभीर बातें चुटकुलों के ज़रिए कही जाती हैं. किसी समाज को भांपना हो तो उसमें प्रचलित चुटकुले पढ़े जाने चाहिए. फ़िल्म का हीरो ये लाइन बार-बार दुहराता है: वो मेरी बंदी है बे!

अब ये समझना इतना मुश्किल नहीं है कि ‘वो मेरी नहीं हुई तो किसी की नहीं होने दूंगा’ में लड़की को ऐसी निर्जीव वस्तु की तरह देखा जा रहा है जैसे उसका कोई दिमाग़ नहीं है, कोई मर्ज़ी नहीं है, कोई चाहत नहीं है, कोई भावना नहीं और उसके पास कोई हक़ नहीं है, जिसे बिना पूछे इस्तेमाल किया जा सकता है.

‘कबीर सिंह’ में भी यही हुआ है. फ़िल्म की नायिका प्रीति को शुरू में देखकर ऐसा लगता है कि कहीं ये ‘गूंगी’ तो नहीं ? क्योंकि वो कुछ बोलती ही नहीं है. वो क्या सोच रही है, क्या समझ रही है, उसके दिलो-दिमाग़ में क्या चल रहा है, कुछ पता नहीं चलता. वो एक कठपुतली है जो कबीर के इशारों पर चलती है. वो उसे जहां बुलाता है, चली जाती है. जो कहता है, चुपचाप करती है.

हालांकि फ़िल्म में बड़े ही सुविधानजक तरीके से इसे मेडिकल कॉलेजों के ‘सीनियर-जूनियर’ इक्वेशन के तौर पर दिखा दिया गया है. डायरेक्टर और लेखक ये कहकर इन सारी चीज़ों को जस्टिफ़ाई कर सकते हैं कि प्रीति फ़र्स्ट इयर की छात्रा है और रैंगिग के डर से डरी-सहमी सी हुई है, चुप है!

2. ‘प्रीति! चुन्नी ठीक करो’

बॉयफ़्रेंड बन जाने के बाद कबीर ‘अपनी बंदी’ के दुप्पटे को उसके सीने से थोड़ा सा ऊपर खिसकते हुए बर्दाश्त नहीं कर सकता. बर्दाश्त करे भी तो कैसे? प्रीति को देखने का हक़ सिर्फ़ उसे है, किसी और को नहीं. ख़ुद प्रीति को भी नहीं. इसलिए जब वो प्रीति से बड़े ही तल्ख़ अंदाज़ में कहता है- चुन्नी ठीक करो तो प्रीति एक माइक्रो सेकेंड में चुन्नी ‘ठीक’ कर लेती है. यू सी, वो भी कबीर से बहुत प्यार करती है. हां, ये बात अलग है कि वो कबीर से कभी चिल्लाकर नहीं कहती: कबीर! पैंट ठीक करो. कबीर! शर्ट के बटन बंद करो…

कबीर और प्रीति सिर्फ़ फ़िल्मी पर्दे पर नहीं हैं. असल ज़िंदगी में भी हैं, जहां लड़के बड़ी आसानी से अपनी प्रेमिकाओं से कहते हैं- बेबी, तुम्हें ऐसे तो सिर्फ़ मैं देख सकता हूं ना.

3. ब्यूटीफ़ुल चिक्स vs हेल्दी चिक्स

कबीर प्रीति की दोस्ती एक ‘हेल्दी’ (मोटी कहिए) लड़की से करवाता है क्योंकि उसे लगता है कि दो ‘ब्यूटीफ़ुल’ लड़कियां दोस्त नहीं हो सकतीं. कबीर ‘ब्युटीफ़ुल’ की परिभाषा भी वही है जो पूरी दुनिया की है- पतली, गोरी…वगैरह-वगैरह. प्रीति ‘ब्यूटीफ़ुल’ है क्योंकि वो पतली है, गोरी है…

4. तेरी औकात क्या है? ले थप्पड़!

कबीर प्रीति को ज़ोर से थप्पड़ मारता है और कहता है: तू है कौन? तू सिर्फ़ कबीर सिंह की बंदी है! जवाब में प्रीति कहती है- हां, हां. मैं तुम्हारे बिना कुछ नहीं हूं. लेकिन रुकिए, प्रीति रैंक होल्डर है. टॉपर है. कैंपस की सबसे ‘ख़ूबसूरत’ लड़कियों में से एक है, लेकिन फिर भी कुछ नहीं है. वो सिर्फ़ ‘कबीर की बंदी’ है इसलिए उसका थप्पड़ सिर झुकाकर सिर माथे चढ़ाती है.

लेकिन थप्पड़ सिर्फ़ कबीर प्रीति को नहीं मारता, प्रीति भी कबीर को मारती है. डायरेक्टर ने यहां बड़ी चालाकी से ख़ुद को ‘लिबरल’ और समानतावादी साबित करने के लिए प्रीति से भी कबीर को थप्पड़ मरवाया है. एक नहीं बल्कि दो-दो बार. हालांकि इन दोनों के थप्पड़ों में छोटा मगर मोटा फ़र्क है. जब कबीर प्रीति को थप्पड़ मारता है तो पूरी धौंस के साथ मारता है, ज़ोर से मारता है. मगर जब प्रीति उसे थप्पड़ मारती है तो बड़े ही प्यार से मारती है, प्रेम में आहत प्रेमिका की तरह! एक फ़र्क और है, प्रीति के कबीर को थप्पड़ मारने के तुरंत बाद दोनों या तो किस कर लेते हैं या गले लग जाते हैं लेकिन जब कबीर प्रीति को थप्पड़ मारता है तो इनमें से कुछ नहीं होता. वो थप्पड़ मारकर वहां से निकल जाता है और प्रीति अपने गाल पर हाथ रखे, आंखों में आंसू भरे सिर झुकाकर खड़ी हो जाती है….

क्या इन दोनों स्थितियों में कोई फ़र्क नहीं है?

5. चल कपड़े उतार! उतार जल्दी…

ये तब होता है जब प्रीति की शादी किसी और से हो चुकी होती है. कबीर यहां एक दूसरी लड़की से चाकू की नोंक पर उसके कपड़े उतारने को कह रहा है. वो उसका बलात्कार करने को तैयार है. इसके बावजूद फ़िल्म में कबीर को निर्दोष दिखाया गया है. ऐसा इसलिए क्योंकि वो जिस लड़की से चाकू की नोंक पर कपड़े उतरवाना चाहती है वो थोड़ी देर पहले उससे आकर्षित होती है लेकिन बाद में उसके करीब आने से इनकार कर देती है. यू सी, अब इसमें बेचारे कबीर की क्या ग़लती? लड़की पहले तो उससे आकर्षित थी ना? बेचारे को उकसाकर ऐन मौके पर मना कर दिया. अब बेचारा जबरदस्ती नहीं तो क्या करेगा? (ये बात और है कि कबीर मेडिकल कॉलेज का टॉपर है उसने ‘कंसेन्ट’ शब्द के बारे में सुना ज़रूर होगा!)

6. कबीर, ये तुम्हारा बच्चा है (Awww!)

फ़िल्म के साथ एक बहुत बड़ी दिक्कत ये है कि इसमें प्रेगनेंसी को एक मज़ाक की तरह दिखाया गया है. प्रीति शादी के बाद प्रेगनेंट है और ‘इसके बावजूद’ कबीर उसे अपने साथ ले जाने को तैयार है! यहां फिर कबीर की ‘महानता’ स्थापित करने की कोशिश की गई है, दिखाया गया है कि वो कितने खुले विचारों का है. अपनी एक्स गर्लफ़्रेंड के पेट में पल रहे किसी और के बच्चे से उसे कोई दिक्कत नहीं है. लेकिन रुकिए! कबीर इतना लिबरल है तो क्या आप प्रीति को कम ‘महान’ समझते हैं? वो बच्चा उसके पति का नहीं बल्कि कबीर का है क्योंकि प्रीति ने अपने पति के शादी के तीन दिन बाद ही छोड़ दिया था. उसने उसे ख़ुद को छूने भी नहीं दिया था. इसके बाद और कुछ कहना बचा है क्या? इसके बाद तो सब रोमैंटिक हो जाता है, सब ‘Awww’ हो जाता है.

एक और बात. प्रीति और कबीर दोनों मेडिकल स्टूडेंट होते हैं. दोनों टॉपर. फिर भी अनप्लांड प्रेगनेंसी? वैसे कबीर को शायद अनप्लांड प्रेगनेंसी कुछ ज़्यादा ही पसंद है क्योंकि जब उसका बड़ा कहता है कि वो शादी के दो साल बाद बच्चा प्लान करना चाहता है तो कबीर भौचक्का होकर पूछता है- प्लान? ये क्या होता है?

अनप्लांड प्रेगनेंसी असल में इतनी रोमैंटिक हो, ये ज़रूरी नहीं भई.

अब दलील दी जा सकती है कि ये सिर्फ़ फ़िल्म ही तो है, फ़िल्म में इतने लॉजिक मत ढूंढो. मगर याद करिए हाल ही में आई फ़िल्म ‘लुका-छिपी’ जिससे कृति सेनन इंटिमेट होने से कार्तिक आर्यन से पूछती हैं- हमारे पास प्रोटेक्शन है क्या?

याद करिए, फ़िल्म ‘सिमरन’ को जिसमें कंगना रनौत बिल्कुल साफ़ शब्दों में कहती हैं- नो प्रोटेक्शन, नो सेक्स.

याद करिए, फ़िल्म ‘डियर ज़िंदगी’ जिसमें आलिया भट्ट अपनी शादीशुदा दोस्त को प्रेगनेंसी की बधाई देती हैं और फिर तुरंत पूछती हैं- मुझे ख़ुश होना चाहिए ना? क्योंकि ये भी ज़रूरी नहीं है कि शादीशुदा जोड़े के लिए प्रेगनेंसी ख़ुशख़बरी ही हो.

याद कीजिए, फ़िल्म ‘पा’ को जिसमें अभिषेक बच्चन सबके सामने कहते विद्या बालन से उनकी अनप्लांड प्रेगनेंसी के लिए माफ़ी मांगते हैं और कहते हैं- काश, मैंने उस दिन प्रोटेक्शन यूज़ किया होता!

तो फ़िल्म है इसलिए तर्क मत ढूंढिए, ये बात भी अपने आप में काफ़ी तर्कहीन है.

‘लेकिन फ़िल्म देखकर कोई रेप नहीं करता…’

ये वो तर्क है जो ‘कबीर सिंह’ और इसके जैसी तमाम फ़िल्मों के समर्थन में दिया जा रहा है. ये तर्क है कि जैसे देशभक्ति फ़िल्में देखकर लोग सेना में भर्ती नहीं होते वैसे ही फ़िल्मों में ‘स्टॉकिंग’ देखकर, रेप देखकर लोग छेड़खानी और रेप नहीं करने लगते. पहली बार में सुनकर ये तर्क वाजिब लगता है लेकिन ये इतना आसान नहीं है जितना लगता है.

कोई फ़िल्म देखते ही तुरंत जाकर किसी का पीछा नहीं करने लगेगा, तुरंत ही लड़की नहीं छेड़ने लगेगा या सिरगेट-शराब नहीं पीने लगेगा. इन सबका त्वरित असर नहीं होता बल्कि ये टॉक्सिक फ़िल्में, गाने और ये पॉप कल्चर ‘धीमे ज़हर’ की तरह धीरे-धीरे चढ़ते हैं.

फ़िल्में देखकर हेयरस्टाइल तो तुरंत बदल जाती है लेकिन विचार धीरे-धीरे बदल जाते हैं.

मान्यताएं और चलन साल दर साल में स्थापित होते हैं. ऐसा न होता तो ‘मैं हू शिकारी’ और ‘मूड तू बनाती है फिर थोड़ा ललचाती है पर रात होते ही तू जाके अपने घर सो जाती है’ जैसे गानों के बोलों जवान लड़कों की जुबान पर न चढ़े होते.

ऐसा न होता तो स्कूल जाने वाले लड़के ‘स्टॉकिंग’ को प्यार जताने का तरीका न समझते. किसने उन्हें बताया कि लड़की का पीछा करके ही उससे प्यार का इज़हार किया जाता है? क्या इनमें ‘स्टॉकिंग’ और छेड़छाड़ की रोमांस की चाशनी में लपेटकर परोसने वाली फ़िल्मों को कोई दोष नहीं है?

‘लेकिन ऐसे कैरेक्टर दिखाने में क्या बुराई है?’

कैरेक्टर दिखाने में कोई बुराई नहीं है. ऐसे लोग दुनिया में होते हैं. तो दिखाइए, ख़ूब दिखाइए. लेकिन ऐसे कैरेक्टर को ‘हीरो’ बनाकर पेश मत करिए, प्लीज़. लोगों के मन में उसके लिए हमदर्दी मत जगाइए. बीच-बीच में स्क्रिप्ट तोड़-मरोड़कर और एकाध सीन डालकर ऐसे कैरेक्टर को ‘महान’ बनाने की कोशिश मत कीजिए.

उसके बेहूदे कामों को ‘रोमांस’ बनाकर दिखाने की कोशिश मत कीजिए. उसे ‘रोमांस का देवता’ मत बनाइए क्योंकि बंदी से बिना पूछे ‘वो मेरी बंदी है’ ऐलान करने वाला हीरो नहीं होता.

वैसे, मेरी दोस्त ऋषिजा ने ऐसी ही एक फ़िल्म के लिए लाख गुना बेहतर कहानी सुझाई है जो सच के बेहद क़रीब है:

कबीर प्रीति को अपनी बंदी बनाने की कोशिश करता है लेकिन प्रीति उसे पसंद नहीं करती क्योंकि उसके पास अपना दिमाग़ है (माइंड यू, वो NEET क्रैक करके मेडिकल कॉलेज में आई है). लड़की के ‘ना’ कहने से कबीर का मेल इगो इतनी बुरी तरह हर्ट होता है कि वो उस पर तेज़ाब डाल देता है. अनगिनत मुश्किलों और सर्जरी के बाद प्रीति एक तेज़तर्रार फ़ेमिनिस्ट, डॉक्टर और ऐक्टिविस्ट बनकर उभरती है. इसके बाद उसकी ज़िंदगी पर ‘छपाक’ जैसी कोई फ़िल्म बनती है और उस फ़िल्म में प्रीति का किरदार दीपिका पादुकोण जैसी लीडिंग हिरोइन निभाती. अब फ़िल्म की हिरोइन प्रीति है.

वैसे, इससे भी बेहतर कहानी ये होती कि कबीर स्टॉकिंग के लिए जेल जाता और नशे के लत छुड़ाने के लिए रिहैबिलिटेशन सेंटर! अभी आइडिया बोरिंग लग सकता है लेकिन डायरेक्टर और स्क्रिप्ट राइटर दिमाग़ लगाएं तो दमदार कहानी बनेगी 🙂

लेखिका बीबीसी हिंदी की पत्रकार हैं

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