लोकवाणी

मुख़्तलिफ़ आवाज़, निगाह और विचार

कला एवं साहित्य

सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों का खंडर बनना हरयाणवी, राजस्थानी व अन्य क्षेत्रिय फिल्मों को ले डूबा

कभी कोई जमाना था जब शहर की दीवारों पर सिनेमाघर में लगी हुई फ़िल्मों के बड़े-बड़े पोस्टर लगे हुआ करते थे और 4 शो नीचे लिख कर शो की टाइमिंग लिखी होती थी। उन सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों की आलीशान बिल्डिंग किसी भी शहर की शान हुआ करती थी । एक बहुत बड़ा सा फिल्मी पोस्टर सिनेमा की सामने वाली दीवार पर लगा हर किसी को फ़िल्म देखने के ललचाता था। शो खत्म होने के बाद जब भीड़ सिनेमाघर से निकलती तो ट्रैफिक जाम से सड़क की जान निकल जाती.

 वो भी क्या जमाना था, शहर के सिनेमा में फ़िल्म देखकर आना और अगले दिन पूरी क्लास को बड़ी शान से फ़िल्म की स्टोरी डायलॉग समेत सुनाना। कमाल की बात है जो दिमाग लेख वगैरा खूब रट्टे मारने से भी याद नहीं कर पाता था वो एक ही बार में फ़िल्म के डायलॉग याद कर लेता था।

तब कितनों ने स्कूल, काॅलेज से भाग कर फ़िल्म देखने का रोमांच हासिल किया होगा। तब आज की मल्टीप्लेक्स की तरह मंहगा कोक, पॉपकॉर्न, बर्गर नहीं होता था। सिनेमाघर के आंगन में एक कोने में समोसे चाय की कैन्टीन होती थी, जहां लोग थोड़े पैसे वाले कैम्पा और गोल्ड स्पॉट पीते नजर आते थे। बीड़ी सिगरेट तो पीने वाले बिल्कुल फिल्मी स्टाइल में शूट्टा मारते, धुंए के छल्ले उड़ाते। 

    तब सबसे बड़ा काम होता था कि भीड़ में टिकट कैसे लाई जाए। लोगों के कपड़े फट जाते थे लाइनों की धक्का मुक्की में। पर जब टिकट हासिल होती तो लोगों को जंग जीतने जैसी खुशी मिलती। टिकट लेने के लिए एक साथी को भीड़ में से ऊपर से फेकंने जैसे कारनामे भी देखे। ब्लैक में सिनेमा की टिकट बिका करती थी। 

बच्चे कटी हुई सिनेमा की टिकट दूसरे बच्चों पर रोब झाड़ने के लिए रखते। सिनेमा के प्रोजेक्टर की लाईट पीछे से जब सामने वाले पर्दे पर पड़ती थी तो वहां बैठे लोगों मे रोमांच सिरे चढ़ जाता था। फिर पूरे शो में कई बार सिटिंयां बजतीं, विलेन को गालियां वही निकाल दी जातीं। सीटी बजाने की भी खास कला होती थी, कोई दो उंगली से जीभ को दबा के सीटी मारता था तो कोई दोनों हाथों की उंगलियों से जीभ दबा कर। इंटवरल कोल्ड्रिंक समोसे, चाय, बीड़ी सिगरेट से होता, बर्गर पॉपकॉर्न कहीं नजर नहीं आता था, कहीं रहा भी होगा तो किसी मेट्रो सिटी में। जैसे ही शो खत्म होता लोग लकड़ी की अपने आप बन्द होने वाली कुर्सी से उठते तो उन लकड़ी की कुर्सियों की बन्द होने की आवाज एक साथ यूं लगती मानो सारा सिनेमाघर तालियां बजा रहा हो।

  मगर धीरे-धीरे वीसीआर, सीडी, केबल टीवी ने सिनेमाघरों की रौनक खत्म करनी शुरू कर दी। सिनेमा में अब  भीड़ नहीं होती थी, वो नई महंगी बॉलीवुड की फिल्मों की बजाय सी ग्रेड की भोजपुरी फिल्मों से जैसे तैसे खर्चा निकालने लगे।

फिर दौर बदला और मल्टीप्लेक्स खुलने लगे, जहाँ अब ज्यादातर कूल ड्यूड ही जाते हैं, जो मंहगे पॉपकॉर्न के साथ बिना कोई सीटी बजाये चुपके से फ़िल्म देख लेते हैं। धीरे-धीरे सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर बन्द होने लगे। दरवाजों पर ताले लग गए और आंगन में खुली कैन्टीन की दुकानों में घास उग आए।

कभी शहर की शान रही सिनेमाघरों की इमारतें अब बड़ी हसरत से वहां से गुजरने वालों को देखती हैं और अपने गुजरे वक़्त को याद करती हैं। कई इमारतें अब ढह चुकी हैं और कुछ अभी बेहद दयनीय स्थिति में हैं। कुछ जगहों पर इन सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों को दोबारा जिन्दा करने की कोशिश भी हुई है।

  सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों का क्षेत्रीय फिल्मों को बहुत फायदा था और उस से खास स्थानीय भाषाओं को विस्तार में भी फायदा मिल रहा था। जब से वो दौर गया है तब से उतर भारत में कई जगह क्षेत्रीय फिल्में बनना ही बन्द हो गई हैं। इसमें हरयाणवी, गढ़वाली, डोगरी तो प्रमुख रूप से बन्द ही हो गई. इसके साथ राजस्थानी सिनेमा पर भी असर पड़ा। उत्तर भारत में सिर्फ पंजाबी और भोजपुरी क्षेत्रीय सिनेमा ही खुद को नये मल्टीप्लेक्स के अनुकूल ढाल पाया।

 ये सिंगल स्क्रीन सिनेमा हमारे इतिहास का एक हिस्सा हैं, पर शायद अब ये खंडहरों में तब्दील हो लुप्त हो जाएगें। 

हम भारतीयों को रोमांचित करने वाले इन सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों को मेरा सलाम.

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *