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रिपोर्ट

एक फोटो के कारण स्मृति इरानी के चरणों में लोटना या स्त्रीवाद का सुनहरा अध्याय बताना कितना सही?

श्याम मीरा सिंह

स्मृति की इस तस्वीर के महिमामंडन और चरणलोटन करने से पहले कुछ जरूरी सवालों पर बात करने की जरूरत है। पहली बात कि चित्रों के आधार पर हीरोइक इमेज गढ़ना सबसे सस्ती एनालिसिस है। क्या आपने कभी सोचा कि अगर यह चित्र मानवीय सभ्यता में क्रांतिकारी कदम है तो रूढ़िवादी धड़े में इसका विरोध क्यों नहीं हुआ? क्या आपने किसी एक भी शख्स को हाथ में तख्ती लिए खड़े देखा कि “नहीं, स्मृति एक स्त्री होकर ऐसे कंधा नहीं दे सकतीं, ये हमारे धर्म की परंपराओं के खिलाफ है.”

या आपने किसी एक भी आदमी की कोई पोस्ट पढ़ी जिसमें उसने महिला होने के आधार पर स्मृति के कंधे देने का विरोध किया हो?

स्मृति के कंधा देने पर जब समाज के रूढ़िवादी हिस्से की कोई प्रतिक्रिया ही नहीं आई, उसमें कोई हलचल ही नहीं हुई तो यह रूढ़िवाद पर चोट कहाँ से हुई? या यह कोई इंग्लैंड की रक्तहीन क्रांति के जैसी क्रांति थी? या ये क्रांति साइलेंट मोड पर थी..?

अगर यह चित्र स्त्रीवाद का सुनहरा अध्याय है तो क्या स्त्रीवाद की इस नायिका ने स्त्रियों के अन्य मुद्दों पर पहले भी कभी मुखरता दिखाई थी? किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी पूरी जीवन यात्रा के आधार पर होता है न कि केवल एक चित्र के आधार पर। अगर स्मृति स्त्रीवाद की नायिका हैं तो स्त्रियों से जुड़े तात्कालिक सवालों पर स्मृति की प्रतिक्रिया क्या रही थी? ये भी जानना जरूरी है!

जब सबरीमाला में महिलाएं मंदिर में प्रवेश के हक के लिए लड़ रहीं थीं तब रूढ़िवाद के रक्षक उन स्त्रियों के चरित्र से लेकर उनके साथ शारीरिक हिंसा तक पर उतर आए थे। सबरीमाला दसों दिन देश की हेडलाइन में बना रहा! स्त्री क्रांति यह थी जिसने कट्टरपंथी पैट्रिआर्कल माइंडसेट पर चोट की थी। जिसके कारण दक्षिणपंथी धड़े में हलचल आ गई थी।

क्या स्मृति ईरानी ने एक भी बार कहा था कि वह उन साहसी स्त्रियों के साथ हैं जिनके साथ संघ के लोग हिंसा पर उतर आए थे..

उन चंद महिलाओं की हिम्मत ने रूढ़िवादी धड़े में प्रतिक्रिया पैदा की थी, जिसके विरोध में दक्षिपंथी संघ और भाजपा ने महीने भर प्रदर्शन करती रही थी। क्या उन स्त्रियों के सवालों का उनकी चिंताओं का स्मृति ने एकबारगी भी समर्थन किया?

जब डा. अम्बेडकर ने हिन्दू कोड बिल लाकर महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने का प्रयास किया तब दक्षिणपंथियों में इसपर कड़ी प्रतिक्रिया आई। जिसके विरोध में अम्बेडकर ने मंत्रिपद से इस्तीफा दे दिया। क्रांति यह थी। रूढ़िवाद पर चोट यह थी। समय की वह तस्वीर स्त्रीवाद का सुनहरा अध्याय थी।

बिना हलचल के कोई क्रांति कैसे हो सकती है स्मृति के चरण लोटन में लगे साथियों को इसबात की तस्दीक होनी चाहिए..

स्मृति जिस पार्टी और विचारधारा के लिए वोट मांगती हैं। वह विचारधारा खुद परंपरागत और रूढ़िवादी शोषण की सबसे बड़ी “चौकीदार” है। स्त्रीवाद के सवाल ही दक्षिणपंथ को खत्म करने की प्रस्तावनाओं से शुरू होते हैं। उसी विचारधारा की पोषक होकर स्मृति कैसे ही स्त्रीवाद की नायिका हो सकती हैं..

जब आप किसी पार्टी या विचारधारा से जुड़े हुए होते हैं तो उसके फलस्वरूप आने वाले परिणामों के भी आप कहीं न कहीं जिम्मेदार माने जाते हैं। दक्षिणपंथ की जिस हिंदूवादी धारा का भाजपा नेतृत्व करती है उस विचारधारा ने सती प्रथा के समर्थन में राजा राममोहन राय के ऊपर पत्थर फेंके हैं। उस विचारधारा ने स्त्री शिक्षा की पहली नायिका सावित्रीबाई फुले पर फब्तियां कसी हैं। जिसने महिलाओं को शिक्षा देने की बात करने वाले ईश्वरचन्द्र विधा सागर की मूर्तियां तोड़ी हैं।

स्मृति उस विचारधारा का नेतृत्व करती हैं।

इस एक तस्वीर के कारण स्मृति के चरणों में लोट मारने वालों से इन तमाम सवालों को पूछने की जरूरत है.

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