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समाज

हम मरी हुई कौमें हैं!

एस.एस.पंवार

निगाहो ~दिल से गुजरी दास्तां तक बात जा पहुंची

मिरे होटों से निकली और कहां तक बात जा पहुंची 


अनवर साबरी का ये खूबसूरत शायरी झूूठी लगती है मुझे। बात निगाहों-दिल से भी गुजरती है, बात होटों से भी निकलती है। पर वहां तक पहुंचती नहीं मगर; जहां पहुंचनी चाहिए।

इस देश में अनेकों सामाजिक आंदोलन होते रहे हैं, कम्युनिष्ट सभाएं-आंदोलन-गोष्ठियां होती हैं, अलग तरह के समाजवादी भी हैं, यूनियनिस्टों की अपनी बाते हैं। अनेको मंचों द्वारा विद्यार्थियों को लामबंद करने की कोशिशें होती हैं, महिला मुद्दों पर बहस-मुहाबिसे, सभाएं, गोष्ठियां होती हैं। विचारधारा और गैर-विचारधारा दोनो तरह के प्रयास चलते रहे हैं। गैर-विचारधारा अनेकों तरह के क्लब इत्यादि को कहा जा सकता है, जिनके नियम अवैज्ञानिक, निराधार, कुछ उचित-कुछ अनुचित होते हैं।

यह निःसन्देह सच है कि इस देश की महिला उत्पीड़ित है, इस देश के मजदूर का हक मारा जा रहा है, इस देश के विद्यार्थी को बेचकर खाये जाने की साजिशें हैं और इस देश के किसान की दशा तो अति दयनीय है। समस्या भी है। समाधान भी है। कम्युनिष्टों को हालांकि अनेकों तरह की लानत भेजने वाले भी इसी देश में मिल जाएंगे हैं। वहीं बाहरी समर्थन करने वाले भी अनेकों हैं। लेकिन सही मायनों में अगर देखा जाए तो कोई दूसरा विकल्प नजर नहीं आता। सड़कों पर सिर्फ इसी के संगठन से जुड़े लोग दिखते हैं। इसी विचारधारा के बहुतेरे मजदूर संगठनों ने सैद्धांतिक तरीकों से वक्त-दर-वक्त अपनी जंगें जीती भी हैं और संतुष्ट भी हुए हैं। लेकिन बात अगर सच है तो सबको माननी चाहिए। ‘सत्यम शिवम सुन्दरम’ भी यहीं सुना जाता है, सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र को भी मानने वाले बहुत लोग हैं और हर माँ-बाप, गुरुजन कहते आये हैं कि सच बोलो, सच के साथ खड़े रहो। सच की बात सब करते हैं पर सच कहता कोई नहीं, कोई ऐसी बात नहीं मानता जो तार्किक हो, वैज्ञानिक हो, सत्य हो।

सच की पैरवी करने वाले गौतम बुद्ध कहते हैं… “किसी बात को सिर्फ इसलिए मत मानो कि ऐसा सदियों से होता आया है, परंपरा है, या सुनने में आई है। इसलिए मत मानो की किसी धर्म शास्त्र, ग्रंथ में लिखा हुआ है या ज्यादातर लोग मानते हैं। किसी धर्म गुरु, आचार्य, साधु-संत, ज्योतिषी की बात को आंख मूंदकर मत मान लेना। किसी बात को सिर्फ इसलिए भी मत मान लेना कि वह तुमसे कोई बड़ा या आदरणीय व्यक्ति कह रहा है बल्कि हर बात को पहले बुद्धि, तर्क, विवेक, चिंतन व अनुभूति की कसौटी पर तोलना, कसना,परखना और यदि वह बात स्वयं के लिए, समाज व संपूर्ण मानव जगत के कल्याण के हित में लगे तो ही मानना। 

इसी समाज से, इसी देश से कुछ और भगत सिंह निकले, लड़े और मरे। झूठी राजनीति और व्यवस्था के हलक में हाथ डालकर सच उगलवाया है कुछ मानव-हितैषियों ने। लेकिन बराबर समाज का विरोध भी सहा। ज्योतिबा-सावित्री फुले से लेकर आज तक ऐसे ही समाज कीचड़ उछाल रहा है। हालात तो यहां तक है कि कम्युनिष्ट विचारधारा के हितैषी कुछ लोगों को तो उनका परिवार घर से निकालने तक को तैयार रहता है। …हां तो बात संप्रेषण-कम्युनिकेशन की चल रही थी। कि सही बात है तो बात लगनी चाहिए श्रोता को। लेकिन लगती नहीं है। लेनिन ने तो यहां तक कहा था कि ‘अगर आप किसी को कोई बात समझा नहीं सकते तो आप मूर्ख हैं।’ लेनिन कहकर चले गए। लेनिन ही क्यों कोई कहकर चला जाये। हमारे खुद के देश में भगत सिंह और डॉ. अंबेडकर ने क्या क्या नहीं कहा होगा। लेकिन बात लगी नहीं। सोचने वाली दो टुक बात ये है कि या तो संगठन करने वाले तमाम नेता विफल हैं या श्रोता मरे हुए हैं।

उदय प्रकाश की एक कविता मैं जगहों-जगहों पर बोलते हुए नहीं थकता…

मरा हुआ आदमी बोल नहीं सकता

मरा हुआ आदमी सोच नहीं सकता

जो आदमी नहीं बोलता

जो आदमी नहीं सोचता

वो आदमी मरा हुआ है…

एक अन्य समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया कहते हैं ‘जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करती।’ हमने तो दशकों निकाल दिए। हम ये भी मानते हैं कि समाजवाद विकल्प है, हम कम्युनिष्ट न तो कुछ और सही। समाजवाद की बात तो करें। समाजवाद पढ़ें तो सही। पर लोग यहां सैनिकों, किसानों, महिलाओं, मजदूरों, बच्चियों की लाशों के ऊपर से निकल रहे हैं। उफ्फ तक नहीं कर रहा कोई। हम कुछेक लोग ही हैं जो बात-बात पर भावुकता से भर जाते हैं। आज ही एक कटिंग देख रहा था कि चाइना में एक औरत फ़िल्म देखकर इतनी रोई कि हॉस्पिटल में भर्ती कराना पड़ा। हम इक्का-दुक्का लोग ही क्यों दर्दनाक मंजर देख फफक पड़ते हैं। क्या हम इक्का-दुक्का ही जिंदा लोग हैं? हम जुल्म होते देखते हैं और हम बोलते नहीं ! क्या वाकई मर गए हैं हम क्या वाकई जिंदा नहीं हम? 

(लेखक हरियाणा ख़ास के कंटेंट एडिटर एवं स्वतन्त्र लेखक हैं )

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