लोकवाणी

मुख़्तलिफ़ आवाज़, निगाह और विचार

रिपोर्ट

आतंकवाद निरोधी दस्ता की आतंकी कार्यवाही

कृपाशंकर

8 जुलाई 2019 की सुबह 4 बजे के आस-पास हमारे किराये के घर का मेन गेट तेज-तेज से खटखटाने की आवाज हुई। मैं और मेरी पत्नी बिन्दा हड़बड़ाकर उठे और बिन्दा ने तुरन्त गेट का ताला खोला। 20-25 की संख्या में सादी वर्दी वाले लोग मकान के अन्दर हमारे कमरे में तरन्त घुस आये। इनमें से कुछ महिलायें भी थीं और कुछ लोग वर्दी में भी थे। उन्होंने हमारा नाम पूछा और बिना कारण बताये, बिना सर्च वारण्ट दिखाये और बगैर आपस में एक-दूसरे की तलाशी लिए, (जैसा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार और सर्वोच्च न्यायालय का ऐसे मामलों में दिशा-निर्देश है) हमारे कमरे में घुसकर कमरे की तलाशी शुरू कर दी। हम लोग एक ही कमरे में रहते हैं उसी में खाना भी बनाते हैं। उन्होंने हमसे व मकान मालिक से हमारे द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले दूसरे कमरे के बारे में भी पूछा। मना करने पर कमरे के साथ लैटिन बाथरूम की भी विधिवत छानबीन की। हमारी एक-एक किताब, कॉपी, फाइल सब खंगाल डाला और उनमें से कुछ को अपने पास भी रखते गये। हम दोनों के मोबाइल (एण्ड्रायड), मेरा लैपटॉप और पेन ड्राइव तो तुरन्त ही कब्जे में ले लिया। मैंने अपने घर वालों व वकील को फोन करने हेतु कहा तो उन्होंने साफ मना कर दिया। बहुत पूछने पर उन्होंने हमें और मकान मालिक को इतना बताया, कि हमें कुछ सूचना मिली है, इसीलिए छानबीन कर रहे हैं, शाम तक को छोड़ देंगे। कुछ कागजात, मोबाइल, लैपटॉप, पेनड्राइव के साथ हम दोनों को लेकर वे लोग देवरिया पुलिस लाइन पहुंचे। वहां एक हॉल में, हमारे मोबाइलों, लैपटॉप, पेन ड्राइव व सभी कागजातों की जांच-पड़ताल शुरू हुई साथ ही हमसे पूछताछ भी होने लगी। मुझे अलग कमरे में बिठा दिया गया और बिन्दा से पूछताछ होती रही। कुछ ही देर बाद देवरिया से लगभग 20 किलोमीटर दूर गांव में रहने वाले पति-पत्नी बृजेश व प्रभा को भी हमारे ही तरीके से उनके गांव से उठा लाया गया था। उनके पास से भी उसी प्रकार कुछ लिटरेचर उनके मोबाइल, लैपटॉप व पेनड्राइव को कब्जे में ले लिया गया था 8 जुलाई की रात 8 बजे तक हम चारों से पूछताछ भी होती रही और साथ ही हमारे घरों से उनके द्वारा लाये गये सामानों की भी जांच होती रही। इसके बाद एटीएस के एक अधिकारी महोदय ने कहा कि ‘‘आप लोगों के पास कुछ भी आपत्तिजनक नहीं मिला है, इसलिए हम आप लोगों को छोड़ रहे हैं।’’ लेकिन इसके साथ ही उन्होंने हमें दण्ड प्रकिया संहिता की धारा 160(गवाहों को नोटिस) के तहत नोटिस दिया, जिसमें हम चारों को एटीएस यूपी के मुख्यालय अनौरा लखनऊ में 12 जुलाई की सुबह 10 बजे तलब किया गया।

हमसे पूछताछ करने वालों में यूपी एटीएस के अलावा आन्ध्र प्रदेश के लोग भी थे। उनका सबसे ज्यादा जोर इसी बात पर था कि ‘‘क्या हम मनीष को जानते हैं, हम लोग क्यों नहीं चुपचाप कमाते-खाते हैं, क्यों सामाजिक काम करते हैं?’’ उनका कहना था कि एक बार जेल काटने के बाद पुनः राजनीतिक काम क्यों शुरू कर दिये?’’ उन्होंने बताया कि मनीष को उन्होंने पत्नी सहित गिरफ्तार कर लिया है।

दिन भर की सघन पूछताछ के बाद रात दस बजे बारिश के बीच ही उन्होंने हम चारों को बृजेश के गांव पर ले जाकर छोड़ दिया।

10 जुलाई को हम चारों ने पुलिस महानिदेशक उप्र के नाम एक प्रार्थनापत्र भेजा, इसकी प्रति राष्ट्रीय व राज्य मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग के साथ सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट उप्र के मुख्य न्यायधीशों के पास भी भेजा है। हमें इसकी आशंका है कि हमारे इलेक्ट्रानिक सामानों में हेर-फेर करके हमें फंसाया जा सकता है।

बाद में हमें पता चला कि 8 जुलाई की सुबह ही लगभग एक ही समय में मनीष और अमिता के भोपाल स्थित आवास पर भी ये ऐसे ही पहुंचे थे और उसी दिन कानपुर के दिनेश और ज्योत्सना के घर पर भी। मनीष और अमिता को लखनऊ जेल में बंद कर दिया गया और शेष 6 लोगों को पूछताछ के नाम पर परेशान करना जारी है।

हम चारों यानि मैं, बिन्दा, बृजेश, प्रभा 12 जुलाई 2019 को एटीएस मुख्यालय अनौरा गये, जहां हमसे उस दिन रात 8 बजे तक और फिर अगले दिन 13 जुलाई को सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक मानसिक रूप से यातना देने की स्थिति तक पूछताछ करते रहे। हालांकि उन्होंने हमें शारीरिक यातना नहीं दी, लेकिन यह प्रकिया किसी यातना से कम नहीं है। वे बार बार कह रहे थे-‘‘ देखिये आप लोगों के साथ हम इतना अच्छा व्यवहार कर रहे हैं, यदि देश में जनवाद नहीं होता, तो हम ऐसा व्यवहार करते?’’ या ‘‘क्यों नहीं चुपचाप कमाते-खाते हो, अपना जीवन क्यों तबाह कर रहे हो, फासीवाद विरोध की बात, दलित-मुस्लिम एकता की बात तो माओवादी-नक्सलवादी करते हैं।’’

हमसे पूछताछ करने वाले आईबी वालों की बातचीत से ऐसा प्रतीत होता था कि वे आरएसएस के ‘अर्बन नक्सली’ थ्योरी पर काम कर रहे हैं। उन्होंने मुझसे कहा भी कि ‘‘तुम मान लो कि ‘‘अर्बन नक्सली’’ हो।

12 व 13 जुलाई को पूछताछ के बाद भी हम चारों को 22 जुलाई हेतु उपस्थित होने का नोटिस देकर छोड़ा गया। 12 जुलाई की शाम जब हम वहां से निकल रहे थे, तो उस समय मनीष को पुलिस कस्टडी रिमांड के लिए लाया जा रहा था।

22 जुलाई को जब हम एटीएस ऑफिस पहुंचे, तो उस दिन वहां कानपुर से दिनेश को भी लाया गया था। उस दिन उनके द्वारा कथित रूप से दो ‘पब्लिक विटनेस’ की मौजूदगी में हमारा ईमेल खोलकर उसकी वीडियोग्राफी की गयी। इस बार हमें आने-जाने का किराया भी दिया गया और कहा गया कि आगे भी जब जरूरत होगी बुलाया जायेगा।

इस पूरे घटनाक्रम ने हमारा काफी नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने हमारे आसपास ऐसा भय का वातावरण बना दिया है, जिसमें हम हर वक्त रहने को अभिशप्त हैं। हम जेल भले ही नहीं गये, लेकिन हमारे आस-पास के लोग हमें संदेह की नजर से देखने लगे हैं। इस भय के कारण लोग हमसे मिलने-जुलने, बातचीत करने से बचने लगे हैं, जो कि एटीएस एजेन्सियों की चाहत भी है। घटना के बाद हमारे मकान मालिक ने हमसे तुरन्त कमरा खाली करा लिया। बिन्दा जो कि स्कूल में अध्यापिका थी, उसे दूसरा काम नहीं मिल रहा। आगे क्या होगा, सब कुछ अनिश्चित है। इन सबके दौरान ही हमें हमारे खिलाफ दर्ज हुई एफआईआर के बारे में पता चला, जो कि 5 जुलाई को लखनऊ के गोमतीनगर थाने में दर्ज कराई गयी थी और इसे एटीएस के ही वाराणसी के एटीएस एसआई राजेश राय ने दर्ज करायी थी, जिसमें लिखा गया है कि ‘‘कुछ संदिग्ध नक्सली उप्र, मध्य प्रदेश व राजस्थान में घूम फिरकर गुप्त मीटिंग करके लोगों को सशस्त्र तरीके से तख्ता पलटने हेतु भड़का रहे हैं, जिनमें प्रमुख हैं- मनीष श्रीवास्तव, अमिता श्रीवास्तव, दिनेश व ज्योत्सना, कानपुर, बिन्दा सोना, बृजेश और प्रभा और अज्ञात। इसी एफआईआर के आधार पर यह कार्यवाही चल रही है। ज्ञात हो कि इस एफआईआर में मेरा नाम नहीं है, लेकिन मैं भी उनके निशाने पर हूं।

56 इंची मोदी-शाह सरकार के लिए दुःस्वप्न बने इन ‘अर्बन नक्सलियों के बारे में मैं संक्षेप में बताना जरूरी समझता हूं।

कृपाशंकर- मेरा नाम बेशक एफआईआर में नहीं है, लेकिन पूछताछ के नाम पर मुझे लगातार परेशान किया जा रहा है। मैंने सिविल इन्जीनियरिंग में डिप्लोमा किया है। पढ़ने के दौरान ही भगत सिंह के विचार से प्रभावित होकर ‘विकल्प छात्र मंच’ से जुड़ गया था। बाद में मनीष के साथ इंछास के संस्थापकों में शामिल रहा। कुछ समय तक रेलवे में नौकरी करने के बाद नौकरी छोड़ सामाजिक कामों के साथ जुड़ गया। 2010 में एसटीएफ द्वारा लखनऊ से अपहृत कर फर्जी केस में कानपुर जेल में डाल दिया गया। 2015 में जमानत पर छूटने के बाद देवरिया में पत्नी बिन्दा के साथ रहता हूं। वहीं से एलएलबी की पढ़ाई कर रहा हूं। ‘फासीवाद विरोधी मोर्चा’ उत्तर प्रदेश का कार्यकारिणी सदस्य हूं, इसके मुखपत्र ‘विरूद्ध’ का सम्पादकीय कार्य विश्वविजय के साथ मिलकर देखता हूं।‘फोरम अगेंस्ट हिन्दुत्व फासिस्ट ऑफेंसिव’ के संयोजन समिति का सदस्य हूं। मानव अधिकारों के राष्ट्रीय समन्वय एनसीएचआरओ के पूर्वी उत्तर प्रदेश चैप्टर का सदस्य भी हूं।

मनीष- मनीष से मैं 1996 में गोरखपुर विवि में मिला था। उनकी बातों, भाषण व व्यवहार से मैं ही नहीं ‘विकल्प छात्र मंच’ से जुड़े सभी छात्र-छात्रायें नागरिक और बुद्धिजीवी भी प्रभावित रहते थे। हर मामले में सही विचार व राय रखना, अत्यन्त संवेदनशील, सबको प्रिय लगने वाले, बूढ़ों से लेकर बच्चों तक सबको दोस्त महसूस कराने वाले और सबके साथ जनवादी व्यवहार करने वाले व्यक्ति हैं मनीष। संवेदनशील इतने कि इलाहाबाद में झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले सफाई कर्मियों के बच्चों को पढ़ाने के दौरान, उनकी दुर्दशा देखकर अपनी खुराक इतनी कम कर दिये थे कि बीमार पड़ गये। गोरखपुर में मनीष जिस गोष्ठी में अपनी बात रख देते थे, उसके बाद के वक्ता उसका सन्दर्भ दिये बिना अपनी बात नहीं रख पाते थे। जब दिसम्बर 1998 में ‘इंक़लाबी छात्र सभा’ की स्थापना हुई, तो मनीष को सर्वप्रिय व सबका वास्तविक नेता होने के नाते संगठन का अध्यक्ष चुना गया। उनके नेतृत्व में इंछास का विस्तार इलाहाबाद तक हुआ। मैं भी व्यक्तिगत रूप से मनीष से बहुत प्रभावित हुआ था और हमेशा उससे बहुत कुछ सीखता रहा।

अमिता- अमिता हम लोगों की दीदी जैसी दोस्त है, जो कला व संगीत मर्मज्ञ हैं। बहुत सुरीली आवाज वाली हैं। कविता और कहानी दोनों अच्छा लिखती हैं और अत्यंत संवेदनशील इंसान हैं। अंग्रेजी भाषा पर अच्छी पकड़ के कारण कई दस्तावेजों और किताबों का अनुवाद कर चुकी हैं, जिसमें मनीष भी उनके सहभागी हैं। इंछास द्वारा आयोजित पोस्टर वर्कशॉप भी अमिता के नेतृत्व में कई बार चल चुका है।

बिन्दा- रायपुर छत्तीसगढ़ में उड़िया लोगों की झुग्गी बस्ती की रहने वाली हैं। स्कूल में शिक्षण का कार्य करते हुए स्नातक तक की पढ़ाई की, फिर एक एनजीओ से जुड़ ‘सर्व शिक्षा अभियान’ के तहत झुग्गी बस्तियों के बच्चों को पढ़ाया। कुछ समय तक दिल्ली में रहकर घरेलू कामगार महिलाओं के लिए भी काम किया। इस घटना के पहले तक देवरिया के एक स्कूल में शिक्षण कार्य कर रही हैं, लेकिन इस घटना के बाद बेरोजगार हैं।

बृजेश- देवरिया जिले के खुखुन्दू थाने के रार बड़ी गांव के निवासी हैं। अपनी खेती-किसानी देखने के साथ ही ‘मजदूर किसान एकता मंच’ संगठन में सक्रिय हैं। बृजेश अपने छात्र जीवन में ‘इंकलाबी छात्र सभा’ से प्रभावित थे और सक्रिय थे। रोजगार के तौर पर बृजेश ने कुछ दिन तक छत्तीसगढ़ रायपुर में कारखाने में नौकरी भी की, फिर खेती किसानी की ओर आ गये।

प्रभा- प्रभा बिन्दा की दोस्त हैं और रायपुर में उनकी बस्ती की ही निवासी हैं। बिन्दा की तरह प्रभा ने भी दिल्ली में घरेलू कामगार औरतों के लिए काम करने वाले एनजीओ में काम किया। बृजेश से शादी के बाद वे भी उनके साथ खेती का काम करती हैं और गांव में ‘सावित्री बाई फुले संघर्ष समिति’ संगठन के माध्यम से महिलाओं के बीच में जागरूकता का काम करती हैं।

इनके अलावा नामजद लोगों में दिनेश और ज्योत्सना हैं, जिनके बारे में मुझे अधिक जानकारी नहीं है।

इन आठ अलग-अलग जगह पर रह कर अपना जीवन यापन करने वाले और सामाजिक काम करने वाले, जो कि आपस में ठीक से परिचित भी नहीं हैं, से यह हिन्दुत्व फासीवादी सरकार इतना डरती है कि उसे इनके खिलाफ यह साजिश रचनी पड़ी, यह हास्यास्पद है। दूसरी बार ‘प्रचंड बहुमत’ (पड़े वोट का 37 प्रतिशत) पाकर सत्ता में आने के बाद मोदी-शाह की सरकार देश की बर्बाद हो चुकी अर्थव्यवस्था से लोगों का ध्यान हटाने के लिए इन्हीं खुराफातों में अपनी सफलता दिखा रही है। जबकि हम देश के लोकतन्त्र के खतरनाक स्थिति तक संकटग्रस्त होने की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ठ कर रहे हैं। हम सबका गुनाह यही है।

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