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उस किसान की कहानी जिसे बेवकूफ बनाकर नेता ने दोबारा वोट ले लिया

असली मालिक कौन?

नेता जी के गाड़ियों का काफिला गाँव के बाहर सड़क किनारे बैठे किसानों के पास आ रुका। काफिले को देख वहां बैठे किसान नेता को पहचानने की कोशिश करने लगे।

किसान उसे जान पाते, उससे पहले ही नेता पास आ कर बोला,
“राम राम मालिक।”

किसान उसे अभी भी ठीक से पहचान नहीं पाए थे। इसी उलझन में भरे एक किसान ने नेता की तरफ देखते हुए कहा, ”राम राम तो ठीक है, पर न्यू बता भाई तू है कौन?

किसान का सवाल सुनते ही नेता के माथे की तियोरियाँ चढ़ आईं। किस तरह नेता अंदर के भाव छुपाते हुए एक नकली हँसी को चेहरे पर सजाकर बोला, “अरे तुमने मुझे नहीं पहचाना, मैं वही हूं जिसको आपने 5 साल पहले वोट देकर जितवाया था।

वहां बैठे किसान असमंजस में पड़ गए। इस विचित्र घड़ी में सबके आव-भाव पस्त थे। इतने में ही एक किसान दाड़ी खुजाते हुए बोल पड़ा, “अच्छा वो तू ही है वो। क्या करूँ नेता जी 5 साल में आपकी राह तकते-तकते नजर भी कमजोर हो गई।” किसान ने थोड़ी बनावटी गम्भीरता के साथ आंखें मली।

नेता कुछ बोल पाता उससे पहले ही किसान ने गंभीर होकर फिर बोलना शुरू किया, “आपको देखने की बहुत इच्छा थी, इसलिए सोचा कि गांंव में बनाये आपके अस्पताल मे आंखों का इलाज ही करवा लूंं। एक दिन अस्पताल गया तो जो अस्पताल कागजों में था वहां खाली प्लाट पड़ा है। फिर सोचा अबकी बार जो आपकी लाईन में लगकर जो यूरिया लिया था, उससे आलू की फसल अच्छी हुई तो उसको बेचकर शहर के बड़े अस्पताल में आंखों का इलाज करवा लूंं ताकी आपको देख सकूंं। मगर आपकी मेहरबानी इतनी हुई कि मेरे शहर आलू लेकर जाने का किराया भाड़ा भी बच गया। दाम ऐसे गिरे की आलू यूंं ही फेकंना पड़ा। फिर मेरी आपको देखने की बहुत इच्छा हुई पर आप तो दिखते ही चश्मों से हैं, तो सोचा गन्ना मील पिछले साल अपने बेचे हुए गन्ने का बकाया पैसा ले आऊंं। पर वहांं तो आपकी मेहरबानी से हमारी इतनी कसरत की गई डंडों से की हमारे शरीर मे चर्बी छोड़ो चमड़ी भी छिल गई।”

नेता शर्म के मारे नीचे झांकता दिख रहा था, लेकिन यकीन मानिए वह शर्मिंदा नहीं था बल्कि यह सोच रहा था कि किसान को दोबारा कैसे बेवकूफ बनाऊं। एक ठड़ी सी आह भरते हुए और अपनी पगड़ी संभालते हुए किसान ने कहा, “क्या करूँ नेता जी अब बिना चमशे के आप दिखते नहीं और हमारी तो नजर कमजोर होने के कारण आपको पिछले 5 साल में देखने की हसरत अधूरी रह गई।”

नेता हाथ जोड़ कर घुटनों के बल बैठ गया और किसान से कुछ मांगने के लिहाज से रोनी सी सूरत करके बोला, “मेरे मालिक आपकी नजर कमजोर हुई मैं आपके गाँव छोटा अस्पताल तो छोड़ो सीधा एम्स बनवा दूँगा। अब आपको आलू शहर ले जाने जरूरत नहीं आपके आलू के लिये सीधे फक्ट्री आपके गाँव में लगा दूँगा जो आपसे लागत से भी कई गुणा ज्यादा मोल पर खरीदेगी। गन्ने की पेमेंट अब आपको अग्रिम आपके खाते में आयेगी, गन्ना बाद में मिल में डाल आना। ओ मेरे मालिक आपको कहीं आने जाने की कोई दिक्कत ना हो इसलिए आपके गाव में ही एक बुलट ट्रेन का स्टेशन खुलवा दूँगा। आप बस मालिक मेरे ऊपर अपनी दया-दृष्टि अबकी बार भी बनाये रखें। आप मेरे मालिक हैं और मैं आपका छोटा सा चौकीदार”

वहां बैठे किसानों ने रोते हुए नेता को ऊपर उठाया और पिंघलकर वोट उसे ही देने का वादा किया। किसानों की आँखों पर अब फिर से एक एक चश्मा लगाया गया और नेता का काफिला आगे बढ़ चला। गाड़ी में बैठे नेता का पीए ने नेता से कहा, “नेता जी अबकी बार आप फिर किसानों को आशाओं का चश्मा पहना आये। सबसे ज्यादा वोट भी किसानों की है पर आप किसानों का काम नहीं करते बल्कि शहर के बड़े कारोबारियों का करते हो और मालिक किसानों को कहते हो।
 नेता जी मुस्कुरा के बोले, ‘अभी तुम नादान हो। हमारे असली मालिक ये कारोबारी हैं जो हमे पैसे देते है। उसी पैसे से हम.बड़ी बड़ी रैली करते हैं। उन्हीं रैलियों में ये किसान सबसे ज्यादा आते हैं। वहां हम चाय नाश्ते का भी प्रबंध करते हैं। यहीं किसान उस भीड़ और ताम झाम को देख कर और हमारा भाषण सुनकर हमको वोट देते हैं। जिस गाड़ी में हम बैठे हैं इसका खर्चा भी वो कारोबारी दे रहे हैं।”

पीए कोई अनजान थोड़ी न था वह भी सब जानता था और नेता की बात सुनकर हंसने लगा। नेता ने शैतानी मुस्कान लाते फिर जवाब दिया, “कहने से न कोई मालिक होता है और न ही कोई चौकीदार। जो हम पर खर्चा करता है वो ही असली मालिक है।”

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