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पुण्यतिथि विशेष: जब ताऊ देवीलाल ने कहा, ‘मैं पहले किसान हूँ और मुख्यमंत्री बाद में’

साल 1977। देश में इमरजेंसी ख़त्म हुई। हरियाणा की बागडोर एक समझदार किसान के हाथ में गई। नाम था देवीलाल यानी जनता के ताऊ। उसी दौरान हरियाणा बाढ़ की चपेट में आ गया। ताऊ को अपने देहात की फिक्र होने लगी।

केंद्र सरकार के पास गए तो मोरारजी देसाई ने अपना पल्ला झाड़ लिया क्योंकि वे चौधरी चरणसिंह के नज़दीकी माने जाते थे। पैसे बेशक न रहे हों लेकिन अपनी जनता को बाढ़ से बचाने का उनमें जज़्बा था। इसलिए उन्होंने गांव-गांव घूमकर लोगों को ख़ुद ही मिट्टी के बांध बनाने के लिए प्रेरित किया। मिट्टी का पहला तसला वह ख़ुद डालते। उनको काम करते देख पूरा गांव काम करने लग जाता और मिट्टी का बांध चंद घण्टों में पूरा हो जाता। ऐसे करके उन्होंने बिन पैसे ही हरियाणा को उस समय बाढ़ से बचा लिया।

इस किस्से को याद करते हुए हरियाणा के राजनैतिक इतिहासकार अनिल भनवाला बताते हैं,

“ताऊ देवीलाल को हराने का माद्दा किसी में नहीं रहा। लेकिन फिर भी वे कई चुनाव हारे। उसकी वजह थी कि वे किसान-मज़दूरों के हक़ों की बात करते थे, इसीलिए शहरों की व्यापारी लॉबी उनसे खार खाती थी। इसी वजह से व्यापारी सभी गैर किसान लोगों को इकठ्ठा कर ताऊ देवीलाल को हराया करते थे।”

चौधरी देवीलाल के सबसे छोटे पौते अनिरुद्ध देवीलाल लिखते हैं, “मैं पहले किसान हूँ और बाद में मुख्यमंत्री” यह महज़ एक व्यक्तव्य ही नही था बल्कि ताऊ के जीवन का सार था। आज फिर से मैं आप सभी साथी भाइयों के साथ ताऊ की एक और इतिहासिक झलक सांझा कर रहा हूँ। सबसे ख़ास बात उनमें यह थी की जितना विशाल उनका व्यक्तितव था उससे भी कहीं ज़्यादा विशाल उनकी सोच थी।

हो सकता है की नयी पीढ़ी को ये लगे की ताऊ देवीलाल का पौता हूँ इसलिए अपने दादा की तरफ़दारी कर रहा हूँ लेकिन मेरे पास हक़ीक़त में ताऊ के संघर्ष के और उनकी दूरदर्शी सोच के हज़ारो सबूत मौजूद हैं जो की चर्चा से अछूते है जिनका समय समय पर में उल्लेख करूँगा। अगर तुलना करें आज की राजनीति से पहले की राजनीति की तो मैं यही कहूँगा की पहले की राजनीति कहीं ज़्यादा जागरूक थी। सिर्फ़ वोट माँगना और सरकार बनाना ही राजनीति नहीं होती, अव्यवस्था को व्यवस्था के साँचे में ढाल कर दूरदर्शी सोच के सेमेंट से लिपाई करके नीतिगत राज के निर्माण को ही राजनीति कहना मुनासिब होगा जो की आजकल विरले ही करते हैं। आजकल राजनीति तो सिर्फ़ फैशन है जो की मौसम के मुताबिक बदलता रहता है।

ये एक विशाल सोच ही तो थी जब उठी तो सामंतवाद के हुकुम सिंह को समाजवाद के हुज़ूम सिंह में बदल दिया और अब सोच गिरी तो जातिवाद के हजम सिंह में तब्दील हो गई। क्या फ़ायदा हुआ शिक्षा का? डिग्री बड़ी और सोच छोटी हो गयी, अमूमन सभी लोग तो होडम-होड़ की राजनीति कर रहे हैं। सोच से किसी को कोई सरोकार नहीं। अब ऐसा तो हो नहीं सकता की नेता ना सोचे तो जनता भी नहीं सोचेगी। सोचने लायक बात यह है की जिस दिन जनता ने सोचना शुरू कर दिया उस दिन नेताओं का क्या हश्र होगा? जैसे सरदार पटेल कहते थे “जो प्रजा राजा का ज़ुल्म सहती है वह राजा को ज़ुल्मी बनाने में सहायक होती है। ज़ुल्म का विरोध करना प्रजा का धर्म है।” मैने अपनी शोध में पाया की लोगों के दिलों में गुस्से का जवालामुखी दहक रहा है ख़ासकर नौजवानों में। देखना यह है की धर्म का पालन कब होगा?


हरियाणा के किसान, दलित और मेव मुसलमान जिसके साथ भी चल देते हैं जीत उसी की होती है। लेकिन आरएसएस और भाजपा को किसान, दलित और मुसलमान के इस गठजोड़ का पहले से ही पता था क्योंकि उनकी नीतियां किसान विरोधी, दलित विरोधी और मुसलमान विरोधी रही हैं। इसीलिए आरएसएस ने इनके गठजोड़ को तोड़ने का पहले ही एक तोड़ निकाल रखा था, वो है इन तीनों समुदायोंके वोटों को कई जगह बांट देना और पूंजीपतियों की मदद से दोबारा सत्ता हासिल करना।

अब ताऊ की विचारधारा को तोड़ा जा चुका है तो संघ-भाजपा को सत्ता में वापसी करने में कतई कोई दिक्कत नहीं होगी।

कुर्सी का खेल गज़ब है। आदमी अपने दादा तक को नहीं छोड़ता, जिसने उसे चलना सिखाया है। ख़ैर बरसाती और लालची कार्यकर्ताओं को 40-50 साल से जुड़े उन कार्यकर्ताओं की तरफ भी देखना चाहिए जो ताऊ की विचारधारा को ज़िंदा रखे हुए हैं.

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