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क्या भ्रष्टाचार और मोदी के फर्जी राष्ट्रवाद से लड़ने के लिए सबसे सटीक हैं तेजबहादुर यादव?

बनारस की सड़कों पर अकेले कुछ साथियों के साथ वोट और नोट मांगने वाले तेज बहादुर यादव को, गठबंधन का प्रत्याशी बन जाने के बाद देखते देखते काफी गम्भीरता से लिया जाने लगा है। राष्ट्रवाद के अपने ही बुने जाल में बुरी तरह उलझ गए हैं मोदी जी। नकली चौकीदार बनाम असली चौकीदार का विमर्श जोर पकड़ने लगा है। अरविंद केजरीवाल ने तो पहले ही अपना समर्थन दे दिया था, इधर योगी सरकार के मंत्री ओमप्रकाश राजभर का समर्थन खास मायने रखता है। भारतीय संविधान और लोकतंत्र बचाने के लिए प्रतिबद्ध नगर के बुद्धिजीवियों, मानवतावादी संगठनों तथा वामपंथी दलों की ओर से भी कुछ सकारात्मक सुगबुगाहट सुनाई पड़ने लगी है। – चौथीराम यादव

तेजबहादुर को महागठबंधन द्वारा उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद वरिष्ठ पत्रकार गिरीश मालवीय लिखते हैं, मोदी अपने चुनाव अभियान में दावा करते रहे हैं कि उनके कार्यकाल में देश की सुरक्षा मज़बूत हुई है. यदि ऐसा है तो फिर वो बताएं कि पुलवामा हमला कैसे हो गया. और उसकी जांच क्यों नहीं कराई गई?”

“अगर सुरक्षा इतनी मज़बूत है तो 775 जवान कैसे शहीद हो गए हैं? 997 जवानों ने आत्महत्या की है, ये बताते नहीं है। हमारे पास आंकड़े हैं. आए दिन पाकिस्तान सर पर चढ़कर बोलता है लेकिन ये जनाब चुनाव के समय बोलते हैं.”

भ्रष्टाचार से लड़ने के सबसे सटीक प्रतीक क्यों हैं तेजबहादुर यादव?

ऐसे में सवाल उठते हैं कि आखिर कौन है तेजबहादुर यादव और उसकी फैमिली फोटो आपको क्यों देखनी चाहिए? भ्रष्टाचार से लड़ने के सबसे सटीक प्रतीक क्यों हैं तेजबहादुर यादव?

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल तेजबहादुर यादव के बारे में लिखते हैं कि तेज बहादुर यादव ने अपनी जिंदगी बीएसएफ में खपा दी थी. दुश्मन की गोलियों की बीच जिंदा रहा. लगातार सीमाओं पर तैनात रहा.

वैसा ही राष्ट्रवादी था, जैसा आरएसएस हर किसी को बनाना चाहता है. मुसलमानों के लिए नफरत वाली उनकी पोस्ट आप पढ़ सकते हैं. मतलब कि जैसा कि होता है, वैसा ही था.

बाकी की कहानी ये है कि रिटायरमेंट के करीब आखिरी पोस्टिंग थी.

वहां खाना खराब मिला, तो उन्हें गुस्सा आया. मोदी राज में सैनिकों को ऐसा खाना. उन्हें लगा कि शिकायत करूंगा तो सरकार खुश होगी कि राशन में भ्रष्टाचार का पर्दाफाश कर दिया. उन दिनों कुछ वैसा ही माहौल था कि सरकार भ्रष्टाचार से लड़ रही है.

यादव साहेब ने उठाकर भोलेपन में फेसबुक पर सब बता दिया कि अफसर कैसे खाने में भ्रष्टाचार करते हैं. कितना खराब खाना सैनिकों को मिलता है.

उम्मीद थी कि शाबाशी मिलेगी.

मिला क्या?

तत्काल नौकरी से विदाई. कोर्ट मार्शल. रिटायरमेंट का विकल्प था लेकिन ये नहीं मिल पाया. बर्खास्त किए गए.

यानी सारी रिटायरमेंट बेनिफिट की छुट्टी. पेंशन नहीं, ग्रेच्युटी नहीं. मेडिकल सुविधा नहीं. कहीं और नौकरी करने से मनाही. सारे एजुकेशनल सर्टिफिकेट पर रेड मार्क.

जिंदगी पूरी तरह बर्बाद कर दी गई. इसी तनाव में उनके जवान 22 साल के बेटे रोहित ने घर में खुद को गोली मार ली.

भ्रष्टाचार से लड़ना मोदी राज में कितना जोखिम भरा काम था, इसका प्रतीक है तेज बहादुर यादव.

उन्हें वार्निंग देकर छोड़ा जा सकता था. लेकिन सरकार ने तय किया कि इस आदमी की जिंदगी बर्बाद कर दी जाए, ताकि कोई और आवाज न उठे.

रिटायर होने ही वाले थे. हो जाने देते. तेजबहादुर को इसलिए वोट नहीं मिलना चाहिए कि बहुत महान आदमी है. सारी कमजोरियां हैं उनमें.

ये सही है कि उन्हें अनुशासनहीनता के कारण बर्खास्त किया गया है. आरोप गलत भी नहीं है. लेकिन ये भोलेपन में हुआ है. नीयत बुरी नहीं थी बंदे की.

जो सजा मिली वो सही थी. कोई भी सुरक्षा बल अनुशासनहीनता के साथ नहीं चल सकता.

लेकिन सजा देने में मानवीय होने का रास्ता था. लेकिन सरकार ने ये रास्ता नहीं चुना.

तो ऐसे में मैं क्या करूं?

मुझे उनसे सिंपैथी है. सहानुभूति है. दया है. करुणा है.

तेजबहादुर यादव ये संघर्ष चुना नहीं है. उनके इरादे नेक थे. वो सुधार चाहता था. भ्रष्टाचार से लड़ना चाहता था. लेकिन उन्हें दीवार की तरफ इतना ज्यादा धकेल दिया गया है कि बंदा रेसिस्ट कर रहा है. जिंदा रहने की कोशिश कर रहा है.

तेज बहादुर को कम्युनल बताया जा रहा है

युवा लेखक ताबिश सिद्दीकी लिखते हैं, तेजबहादुर को लेकर कट्टर वाले मुसलमान बहुत नाराज़ हैं.. कह रहे हैं वो कम्युनल है, पहले कम्युनल मैसेज फ़ेसबुक पर पोस्ट करता था जो मुसलमानों के ख़िलाफ़ होते थे.. इसलिए उसको वोट न दो।

जाने क्यूं जब कट्टर टाइप वाले मोमिन भाई किसी को “कम्युनल” कहते हैं तो मुझे समझ नहीं आता है कि रोऊँ या हंसू.. इनके लिए शिया क़ाफ़िर, बरेलवी क़ाफ़िर, सूफ़ी राह से भटका हुवा, बोहरा अहमदिया सब वाजिबुल क़त्ल.. अपने ही धर्म के चार हज़ार फ़िरक़ों में से लगभग सारे इनकी नज़र के क़ाफ़िर और ज़्यादातर वाजिबुल क़त्ल.. बाक़ी अन्य धर्मों के बारे में इनकी राय का क्या कहूँ.. वो तो जग ज़ाहिर है.. मतलब कम्युनल होना इनका जन्मजात अधिकार है और ये किसी और को कम्युनल कहें तो आदमी अपना सर फोड़ ले

इन्हें लगता है कि बनारस में यही मोदी को जिताते थे जो अब तेजबहादुर को हरा देंगे.. रायता फैलाने को दे दो बस इन्हें

अरे जाओ जुम्मा मुबारक जुम्मा मुबारक खेलो यार.. कहाँ इस सब मे पड़ रहे हो.. वैसे भी भारतीय राजनीति में तुम्हारी औक़ात बची क्या है लफंडरों? कोई भी जालीदार टोपी लगा के आये और तुम्हें बिरयानी खिला के तुम्हारा वोट ले ले.. बस

नया बवाल: तेजबहादुर के 500 पाकिस्तानी दोस्त हैं फेसबुक पर

अजय चौधरी लिखते हैं, तेज बहादुर यादव अब से नहीं काफी दिनों से बनारस में कुछ पूर्व सैनिकों के साथ हैं और मोदी के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुके थे। बीएसएफ में खराब खाने की शिकायत का लाइव वीडियो शेयर करने वाले इस जवान में अबतक किसी को कमियां नहीं दिखती थी। क्योकिं ये जवान मीडिया की सुर्खियों से दूर था और न ही बनारस से पीएम को कॉम्पिटिशन देने की स्तिथि में था।

लेकिन सपा से तेजबहादुर को कैंडिडेट घोषित करते ही उसमें कमियों के अंबार लग गए और एक दिन में ही सोशल मीडिया इन कमियों से भर गया। एक खबर में बताया जा रहा है कि तेजबहादुर के 500 पाकिस्तानी दोस्त हैं फेसबुक पर। तो क्या ये मान लिया जाए सभी फेसबुक फ्रेंड असल जिंदगी में भी दोस्त होते हैं। हम में से बहुत सो की आईडी में पाकिस्तान से दोस्त जुड़े हैं। तो क्या ये सब भी पाकिस्तान का प्रोपोगंडा है? अगर नहीं तो तेजबहादुर यादव के खिलाफ ऐसी खबर करने को ही पत्रकारिता मान लिया जाए? किसी राजनीतिक पार्टी के डर का प्रोपोगैंडा न माना जाए?

एक खबर ये भी है कि तेज बहादुर यादव को बीएसएफ में दुर्व्यवहार और नशे में पाए जाने पर निकाला गया। लेकिन ये सब तेज बहादुर के खाने में शिकायत करने के बाद हुआ। उससे पहले क्यों कभी तेजबहादुर का व्यवहार खराब हुआ? क्या तेज बहादुर यादव का जारी किया गया वीडियो झूठा था? इसपर कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं होता।

दरअसल तेज बहादुर यादव को चुनाव मैदान में उतारकर सपा खुद को कॉम्पिटिशन में लाने की स्तिथि में आई है। भले ही जीत न हो अगर तेज बहादुर पीएम के खिलाफ सम्मानजनक वोट भी ले आए तो ये बड़ी बात होगी। तेज बहादुर की बातों में दम है। उसके सवालों का जवाब भाजपा पर नहीं बन रहा। इसलिए उसकी छवि बिगड़ने का काम आईटी सेल को दिया गया हो ऐसा नजर आ रहा है। तेजबहादुर कहते हैं कि हमारा मुद्दे जवान, किसान और नौजवानों के रोजगार से जुड़े हैं। लोगों को ये जानना होगा कौन असली चौकीदार है। सीमा पर देश की रक्षा करने वाला या फिर उनकी शहादत का फायदा उठाने वाला।

भाजपा का राष्ट्रवाद “फर्जी राष्ट्रवाद” है तो विपक्ष का राष्ट्रवाद “बेतुका राष्ट्रवाद” है “बेमतलब का राष्ट्रवाद”!

लेकिन दिलीप मंडल की बातों से असहमति रखने वाले युवा पत्रकार श्याम मीरा लिखते है कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ तेजबहादुर की बनारस से उम्मीदवारी पर दो-तीन बातें हैं। जिनपर गौर किए जाने की जरूरत है।

1.. तेजबहादुर को उसकी सैनिक छवि के आधार पर वोट की फसल काटने की उम्मीद करना उसी पैंतरे पर चलना है जिसपर आरएसएस और भाजपा आजतक चली आ रही है। यहां पर आरएसएस की आइडियोलॉजी की ही जीत है जिसके अनुसार धार्मिक नेताओं का राज और सैनिक राज ही शासन की मौलिक पद्धतियां हैं। जहां लोकतंत्र वही होता है जो राज पुरोहित ने कह दिया जो सैनिक राजा ने सुन लिया और अमल करने के लिए आदेश दे दिया।

जबकि असल में लोकतंत्र भावनाओं नहीं भावी योजनाओं और तर्कसंगतता के साथ प्रोग्रेसिव होने का नाम है। जहां सैनिक राज का कोई स्थान नहीं है।

2.भाजपा का राष्ट्रवाद “फर्जी राष्ट्रवाद” है तो विपक्ष का राष्ट्रवाद “बेतुका राष्ट्रवाद” है “बेमतलब का राष्ट्रवाद” है।

3.बनारस से प्रधानमंत्री लड़ रहे हैं जिनकी तानाशाही और फासीवादी तौर तरीकों का सशक्त प्रतिरोध करने की जरूरत थी। जहां बनारस की सीट पर मजबूत और वैचारिक रूप से स्पष्ट नेता की जरूरत थी वहां अजय राय और तेजबहादुर के सहारे इतनी इम्पोर्टेन्ट सीट का सर्कस बना देना बताता है कि देश का विपक्ष बत्ती लगाने लायक है।

इनका विरोध चुनावी भर है सड़क की लड़ाई और संघर्ष से इनका कोई संबंध नहीं। विपक्ष ने अपना अपना सर बचाने के लिए मोदी का रास्ता अकेला छोड़ दिया है। जैसे प्लासी की लड़ाई बिना लड़े ही छोड़ दी गई थी।

तेजबहादुर न तो मानसिक रूप से सशक्त हैं और न ही विचारधारा से स्पष्ट। वह उतना ही कट्टर हैं जितना कोई अन्य उत्पाती। वह हिन्दू राष्ट्रवादी प्रोपोगंडा से खुद ही पीड़ित है। वह आदमी प्रोपोगंडा के सेनापति के खिलाफ क्यों ही लड़ाया जा रहा है। नरेंद्र मोदी जैसे ताकतवर सख़्श के आगे एक दो मुंही तलवार पकड़ी कठपुतली खड़ा करके विपक्ष ने जता दिया कि नरेंद्र मोदी से लड़ाई में कितनी सीरियस है। यह लड़ाई वैचारिक और मुद्दों की लड़ाई न होकर एंटरटेनमेंट बन चुकी है।

ये आदमी क्या ही रिप्रजेंटेशन करेगा जो खुद ही आईटी सेल से पीड़ित हो।

पूरे देश के विपक्ष ने दो कठपुतलियों के सहारे बनारस का मैदान खुला छोड़ दिया है। दो बुतों को आगे कर प्लासी की लड़ाई नहीं जीती जा सकती।

भारतीय लोकतंत्र की इस असहाय तस्वीर का चित्रांकन भविष्य किन शब्दों में करेगा नहीं मालूम। लेकिन एक तानाशाह के खिलाफ एक भी जिम्मेदार नेता ने आकर चुनौती न दी यह बात भारतीय लोकतंत्र के इतिहास के सबसे बदरूप चेहरों में से एक रहेगी।

मैं भविष्य में जब कभी 2019 चुनावों के संस्मरणों को याद करते हुए लिखूंगा तो मन में एक सवाल जरूर आएगा कि जब एक संगठन, एक तानाशाह के नेतृत्व में लोकतंत्र से लेकर नौजवानों में जहर भर रहा था।तब बनारस से लड़ने वाले उस तानाशाह के खिलाफ क्या देश में एक अदब आवाज भी नहीं थी जो उससे ऊंची जुबान में बात करती।

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