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आदरणीय वाचमैनेद्र, एपेंद्र, चायेंद्र, चौकी नरेश चौकीदरेंदेर, मधुरभाषी कर्कशेन्द्र, मेमोरीराज 56×56जीबी

(नीलोत्पल मृणाल)

आदरणीय वाचमैनेद्र, हे चौकी नरेश चौकीदरेंदेर!

आज सदियों बाद फिर आपको एक पत्र लिख रहा हूँ। असल में इधर किताब बेचने के मजबूर धंधे के कारण आपको कोई अत्र-पत्र लिख नहीं पा रहा था। सबका यही सुझाव था कि अगर किताब बेचना है तो आदरणीय पीएम पर कुछ मत लिखना, वर्ना किताब बिकनी बंद हो जायेगी…लोग तुम पर गुस्सा हो जायेंगे…तुम्हारी किताब नहीं पढ़ेगा कोई…अखबार तुम्हें छापेगा नहीं…प्रोग्राम नहीं मिलेगा…लोग अन्फ्रेंड कर देंगे समझ लेना फिर।

इस डर से कई बार आपकी मोहक अदा, हिलती हाथ वाली डोलती गदा पर लिखना चाहा, पर व्यापारी मन रोक देता था। फिर अचानक खयाल आया, कि व्यापार तो आपके खून में है, फिर बाज़ार की चिंता मुझे क्यों? मैं तो साधारण सा नागरिक हूँ, भला मुझे क्यों हिचकना बोलने लिखने से।

हे जगत चराचर सदा निशाचर चायेंद्र, कल मैंने चौकीदार शो का कार्यक्रम देखा टीवी पर। आपके कहे एक-एक रिलायन्स फ्रेस शब्द सुने और खुद को भाग्यशाली मानता हूं कि मैने अपने आंखों से ये सब देखा, अपने प्राईवेट कानों से ये सब सुना। वर्ना आने वाली पीढियाँ शायद ही यकीन कर पायेंगी कि इस जगत में कभी कोई ऐसा भी आयोजन हुआ था, जहाँ ऐसे महाप्राण बोल रहे थे और इतनी आस्थावान प्रजा उसे सुन रही थी।

हे बिना सीटी बस गाल बजा के देश को रात रात भर जगाये रखने वाले चौकीदार नरेश, इस सभा में जैसे ही आपने ये बताया कि चौकीदार एक स्पिरिट है, आपने कम से कम उन अपने भोले लोगों को ये क्लियर कर दिया कि आप वर्दी पहन कर रात को व्हिसिल नहीं बजाते हैं और न ही आपको इसके लिये दो टाईम खाना समेत सात हज़ार नगद वेतन मिलता है। क्योंकि निश्चित रूप से पढ़ी लिखी जनता तो ये जानती ही होगी कि ऐसे शब्द प्रतीक और भावना अथवा स्पिरिट ही होते हैं। ये सचमुच की नौकरी नहीं होती है। पर फिर भी सभा मे मौजूद जिन लोगों ने भी इस नई विलक्षण जानकारी मिलते ही कूद कूद ताली बजाई उनके लिये नमन है। उनके लिये ये सच में एकदम नई बात थी। अधिकतर खुश थे,कुछ के चेहरे पर थोड़ी मायूसी जरुर दिखी कि ओह्ह ये नौकरी नहीं था! स्पिरिट था।

असल में इसमें उन कुछ लोगों की गलती नहीं। वे नये-नये आये होंगे। आपकी तीन चार सभा अटैंड कर धीरे-धीरे जान जायेंगे कि घर परिवार रोजी रोजगार से नहीं, स्पिरिट से चलता है।

इसके बाद एक छात्रा ने जब श्रद्धा से मुस्किया के आपसे सवाल पूछा “प्रधानमंत्री महोदय आप बतायें कि अगली बार शपथ लेने के बाद आपकी हमसे क्या अपेक्षाएं हैं?

मुझे पहली दफ़े तो कान पे यकीं नही हुआ। मैने तीन चार बार उसे रिपिट कर के सुना। सच मे छात्रा ने यही पूछा था।

सर, दुनिया के लोकतंत्र के इतिहास मे इस सवाल और इस क्षण को दर्ज़ कर रख देना चाहिये जब एक लोकतांत्रिक तरीके से चुने जनप्रतिनिधि से जनता अपेक्षा न रख उल्टे जनता ही उनसे कहे कि कहिये प्रधानमंत्री जी आप मुझसे क्या चाहते हैं।

आप भाग्यशाली हैं प्रधानमंत्री जी कि आपको ऐसी जनता मिली है इस देश में, जो आपको शपथ दिला के आपसे नहीं, जनता से ही अपेक्षा ले के आपको दे रही। पूरी दुनिया में जनता शासक को जिम्मेदारी देती है, जवाब मांगती है, यहां भारत के युवा आपको आराम दे आपसे आपकी इच्छा पूछ रहे।

हाऊ क्यूट युवा न मोदी जी।

एक श्रद्धालु ने कहा, “मैं नियमित रूप से नमो एप का सेवन करता हूँ।”
मुझे लगा आप पूछ न दें “लाभ हो रहा न। बताईए सभी चौकीदरों को।”

मैने देखा, आप चुप रहे, बस मुस्कुरा के मने मन कहा “लो बेटा, हम तुम्हारी ले रहे, तुम हमारी लो। नियमित लो। आँ हा हा अं हा हा”

आदरणीय एपेंद्र, आज तक नियमित नीम आंवला रस, त्रिफला चूर्ण, कायम चूर्ण, शहद, सतावर, सफेद प्याज, अश्वगंधा इत्यादि का नियमित सेवन तो सुना था पर अब कोई इन्सान किसी एप का भी नियमित सेवन कर सकता है ऐसा मुमकिन करने वाले आप अकेले वैद्य हैं दुनिया के। समय ने कब हाड़ मांस के मानव को तार, पीन और स्विच लगा रोबोट बना दिया और आपके रोबोटिक सरोकार और वैज्ञानिक सोच को नमन कि उनके नियमित सेवन वाला एप बना दिया। सुबह उठ के इन्हेलर लेने वाले दम्मा के मरीज अब नमो एप लेंगे सूर्योदय के साथ ही।

हे मधुरभाषी कर्कशेन्द्र, आपने जब प्रधानमंत्री का इतिहास बताते हुए बताया कि देश के पहले प्रधानमंत्री की बेटी प्रधानमंत्री बनी, फिर उसका बेटा।

हे संस्कारदूत, आपने जब दुनिया भर में अपनी दृढ़ता से भारत का मान बढ़ाते हुए पाकिस्तान की छाती पर चढ़ उसकी छाती को फाड़ दो टुकड़े में बाँट एक नया देश पैदा कर देने वाली भारत माँ की बेटी यशस्वी प्रधानमंत्री को “आदरणीया इन्दिरा गांधी जी” न बोल “उसकी बेटी” कहा तो कसम से अब आपके चाय बेचने वक़्त धंधे की तन्मयता पर कोई संदेह नहीं जिसे कप सस्पेन बैठ के धंधा करने से फुर्सत पा इतना भी साधारण पढ़ने का मौका नही मिला कि खुद उसी पद पर बैठने के बावजूद उस पद की गरिमा को धारण कर चुकी पूर्व प्रधानमंत्री का नाम बोल पाते, उसकी-इसकी बेटी जैसे शब्दों से न नवाजते।

मुझे लगता है कि शायद ही कोई चाय वाला अपने बच्चों को इतना अपढ़ रखना चाहेगा कि वो अपने देश के पूर्व प्रधानमंत्रियों के नाम तक न जाने। हाँ, अगर अपने बच्चों को प्रधानमंत्री ही बनाना है तो आप जितनी ही जानकारी चलेगी, लेकिन अगर पढ़ा लिखा के नौकरी की परीक्षा में बिठाना है तो पढ़ना पड़ेगा और न चाहते हुए भी पूर्व के सभी प्रधान का नाम भी जानना जरूरी होगा, पाठ्यक्रम की मांग होती है ये।

साथ ही आपने ये शानदार संस्कार दिया अपने सुनने वालों को कि वो घर जायें तो किसी भी महिला को उनके नाम की बजाय उसकी इसकी बेटी बोल के दांत चिहार बुला सकते हैं।

हे मेमोरीराज 56×56जीबी आदरणीय, आपने इस सभा में जो एक सबसे बड़ा सक्सेस सीक्रेट बताया, वो जगत में कोई ही शायद खुल के इस तरह बता पाये।

आपने बताया कि “झूठ बोलने की पहली शर्त है कि आपकी मेमोरी शार्प होनी चाहिए। अं अं हं अन्ह।”

इस बात पर डेढ़ मिनट ताली बजी। क्योंकि ये तो पूरी दुनिया जानती है, पप्पू कौन है? उसके पास तो मेमोरी और शार्पनेस रत्ती भर नहीं। इसी बात पर लहरा के दिवानी जनता ने आपके सम्मान में भयंकर ताली ठोंका। पप्पू तो कोई और है। बात इतने में ही सिद्ध है कि आपने इस तेजमई सूत्र के माध्यम से क्या संदेश दिया है, और लोगों ने उसे ठीक ठीक लिया भी।

आपने आगे एक महत्वपूर्ण संदेश दिया “कांग्रेस सिजनल झूठ बोलती है। अं आँ हं अं।”

इस तरह आपने जिस शानदार अन्दाज़ में ऐसे झूठ को किनारे करने और टिकाऊ और बारहमासा झूठ पे भरोसा करने का जो निहित संदेश दिया ये राजनीति में जनता को “….” ही समझ लेने के कान्फिडेंस का अद्वितीय और सर्वश्रेष्ठ निस्पादन है।

आप यहीं नही रुकें। योगदान की झड़ी लगा देते हैं आप।
आपने कहा “आदमी को “साबू” का इस्तेमाल करना चैये। यानी सामान्य बुद्धि।

इस तरह से पहली बार देश को एक नया चाचा चौधरी मिल जाने की बधाई। अब साबू आपके लिये काम करेगा। प्राण के जाने के बाद डायमंड कॉमिक्स की इस शृखंला को बढ़ाने वाला नया आदमी मिल गया।

मानव सभ्यता ने शायद ही कभी सोचा था कि गोबर सिंह और राका से भिड़ने में ही अपना पूरा करियर फोकस कर रखने वाला चौकीदार साबू एक दिन देश चलाने मे सहयोग करेगा। 
कुछ श्रद्धालु ये भी कह रहे थे कि जो एंटी सेटेलाईट मिसाईल दागने अंतरिक्ष भेजा गया था, वापसी मे वही मिसाईल यान आपके कहने पर जुपिटर ग्रह से साबू को वापस ले आया।
साबू ने आपकी तस्वीर देखी तो थोड़ा असमंजस में था आपको चचा मानने में। फिर जब उसे नोटबंदी और जीएसटी जैसे कारनामे बताये गए तब उसे यकिन हुआ कि हाँ इनका दिमाग तो सच में कंप्यूटर से तेज है, यही चचा चौधरी हैं। चला आया। और अब चुनाव सभा में उपयोग भी आ गया।

आप अब भी रुके नहीं सर। आपने एक एक शब्द में संदेश था।
आपने कहा “विदेश भागे चोर कहते हैं कि भारत के जेल में रहने लायक हालात नहीं। तो क्या हम तुम्हें अंग्रेजों ने जो गांधी जी को जैसी सुविधा दी, जिस हाल में रखा, तो क्या तुम्हें उससे अच्छा चाहिये क्या? हम उससे अच्छा नहीं देंगे।”

क्या आदर भरी तुलना की सलामी दी है आपने उन भागे हुए चोरों को। क्या पवित्र उदाहरण दे कर संदेश दिया आपने चोरों को। क्या क्न्वींस किया है चोरों को देश वापस आने और भारतीय जेल को स्वीकारने हेतु। क्या उच्च प्रेरणा दी है उन चोरों को।

वे चोर जब जेल आयेंगे, उन्हें कितना गर्व होगा। आपस में वे बतियायेंगे, गांधी जी वाली ही सुविधा मिली है, अब जो गांधी जी को भी नहीं मिली हमें क्या मिलती। उनके जितना मिल गया, वह कम है।

सर, चोरों भगोड़ों के बारे में इस लेवल का आदर्श कौन सोचता है कलयुग में। ये तो आप हैं जो निभा देते हैं। आपके बाद शायद ही चोरों और लुटेरों के जेल जाने के सन्दर्भ में कोई महात्मा गांधी के उदाहरण लें।

ये हिंदी मुहावरों के प्रयोग का स्वर्ण काल माना जाय।
मने अब लोग ऐसे उदाहरण ले सकते हैं,

“1-कल पिन्टू को उसके पिता ने महावीर की तरह निर्वस्त्र कर मारा।
2- भल्लू डकैत कल 14 वर्ष का राम वनवास काट के जेल से घर आया।
3-डकैत बिल्ला हनुमान जी की तरह बलशाली है।
4-अमित शाह में विनोबा भावे जैसी शालीनता है।”

ऐ सर, देश का इतना खजाना लूट वे भगोड़े भाग गए। अब अगर खराब जेल के कारण नहीं आ रहे तो प्लीज उन्हीं से कुछ पैसे ले कर बढ़िया स्टार जेल बनवा दीजिये पर प्लीज आगे से राष्ट्र के पिता को तो बख्श दीजिये हे वडनगर के सन्त शिरोमणि।

सबसे युगांतकारी बात तो ये रहा “पाकिस्तान को छोड़ दीजिए। वो खुद अपनी मौत मर जायेगा।”

सर ये सुनते ही दिमाग सन्न कर गया है।
हे युधेंद्र ,ये आपको क्या हो गया? अभी कुछ दिन पहले हर मंच से अदृश्य हो के पाक के घर घुस के मार आने का सुन्दर काण्ड संपादित वाला चक्रवर्ती अब नियति को कह रहा कि पाकिस्तान को तुम ही मारना।

हम चुनाव में मारेंगे,…….बाज़ी।
गाँव गाँव, गली गली आपसे ये आस लगाये है कि पाक का संहार आपके हाथ लिखा है और आप सारा लोड नियति पर छोड़ दिए? 
नियति फियती के भरोसे तो देश 65 साल से था ही सर। अब वो मोदी के भरोसे है। हमें पाक का विनाश चाहिए। 

आपकी सारी बकैती हम श्रद्धा से सुनते रहेंगे, नहीं श्रद्धा तो डर से सुनेगें, लेकिन अगर देश के 50 शहीदों का बदला विभाग बाँट कर भाग्य और नियति के जिम्में दे दीजियेगा तो समझ लिजिये ये मुल्क हमेशा सीमा पर खुद लड़ा है। आपके पैदा होने के पहले भी और आपके बाद भी।

और जब आखिर में आपने कहा ” अगर आपको सत्य चाहिये, सत्य की खोज हो तो नमो एप पे जायें।”

ये सुनते ही देश एक डिग्री और बदल गया जहाँ पहले गीता और रामायण में सत्य खोजा जाता था, अब वो सब नमो एप पे उपलब्ध है।
हे एपेंद्र …..सच में आप हैं त क्या नहीं मुमकिन देख रहा ये समय। जय हो।

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