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टीवी एंकर्स और नेता गिद्ध बनकर शहीदों की लाश नोचना और आपको अन्धा बनाकर भड़काना चाहते हैं

लेखक: Murari Tripathi और Mandeep Punia

जम्मू में कुछ दक्षिणपंथी समूहों ने मुस्लिम बस्तियों में हमला किया है। देश के कई कोनों से खबरें आ रही हैं कि कहीं कश्मीरियों को परेशान किया जा रहा है तो कहीं मारा जा रहा है।

आज सुबह ही पटना की एक खबर पढ़ी जिसमें जम्मू कश्मीर में सीआरपीएफ पर आतंकी हमले के विरोध में 25-30 उपद्रवियों ने कल कश्मीरी दुकानदारों को पीट दिया। इन उपद्रवियों के हाथों में हॉकी स्टिक, डंडा और लोहे के रॉड थे। इनको देख लोगों में अफऱातफरी मच गई। इन उपद्रवियों ने कश्मीरी दुकानदारों को निशाना बनाते हुए पहले उनकी पिटाई की और फिर उनका समान लुटा। इस हमले में तीन कश्मीरियों को गंभीर चोटें आई हैं। कश्मीरी बाजार के संयोजक वसीर अहमद का कहना है कि हमलावरों ने कश्मीरी दुकानदारों की पिटाई करते हुए उन्हें बिहार छोड़ने की चेतावनी दी है।

पुलवामा की घटना निंदनीय है, लेकिन इसकी आड़ में टीवी वाले आपको भ्रमित करने पर लगे हुए हैं। वे एक सधे एजेंडे के तहत निर्दोष मुसलमानों को इस घटना का जिम्मेदार ठहराने की कोशिश कर रहे हैं जिससे इस घटना की आड़ में आप लोगों के मन में एक समुदाय विशेष के मन में ज़हर भरा जा सके। इसलिए बेहतर यही होगा कि आप लोग टीवी देखना बंद कर दें। टीवी को मानसिक विक्षिप्त लोग चलाते हैं। इनका एक मात्र उद्देश्य तबाही लाना है। यही उद्देश्य जैशे-मोहम्मद और तमाम आतंकी संगठनों का है।

ऐसा इसलिए क्योंकि टीवी चैनल्स पर नफरती हिंसा फैलाने वाले एंकर अब हमारे फौजियों की बात भी नहीं सुन रहे हैं। कारगिल युद्ध में अपना पैर गवांने वाले हमारे नायक मेजर डीपी सिंह शुक्रवार सुबह जब एक न्यूज़ चैनल पर डिबेट में थे तो वह लोगों को भड़काने की बजाय तर्कशील बातें रख रहे थे। तर्कशील बातों से एंकर का उन्माद फैलाने वाला लक्ष्य हासिल नहीं हो रहा था इसी वजह से उसने कहा, ”शायद आपने पुलवामा की तस्वीरें नहीं देखीं हैं इसलिए आप इस बात से सहमत नहीं हैं कि इसका एक ही समाधान है और वो है प्रतिशोध.”

चैनलों पर फैलाए जा रहे जहर के खिलाफ उन्होंने एक लम्बी फेसबुक पोस्ट लिखनी पड़ी, जिसमें उन्होंने लिखा है कि 40 परिवार बर्बाद हुए हैं और हम समाधान की तरफ़ नहीं बढ़ेंगे तो भविष्य में और परिवार बर्बाद होंगे. जब आप प्रतिशोध के लिए चीख रहे होते हैं तो कृपया दूसरे परिवारों, अभिभावकों, पत्नियों और बच्चों से पूछिए कि क्या वो उन शहीद सैनिकों यानी अपने पति, अपने पिता और अपने बेटे के बिना जीने के लिए तैयार हैं?

उन्होंने अपनी पोस्ट में शहीदों के परिवारों से लेकर सैनिकों की अनदेखी की पोल भी खोली हैं और लोगों से निवेदन किया है कि अपने कारोबार को चमकाने के लिए शहीदों का उपहास और लोगों की भावनाओं से न खेलें

लेकिन समझदार सैनिकों की बातें नकार सारे चैनल युद्ध की मांग करने लगे हुए हैं। बीजेपी के नेता भी कह रहे हैं कि शहादत बेकार नहीं जाएगी। एक राजनीतिक माहौल बनाया जा रहा है। इसमें कहा जा रहा है कि इस मुद्दे पर राजनीति ना हो, लेकिन खुद राजनीति की जा रही है। कोई भी नहीं पूछ रहा है कि पिछले युद्धों का हासिल क्या है? आखिर बीजेपी ने पीडीपी के साथ मिलकर जो वादा किया था उसका हासिल क्या? इतनी मजबूत सरकार, चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा व्यवस्था होने के बाद भी इतना बड़ा हमला कैसे हो जाता है? कौन जिम्मेदार है? बीजेपी ने तीन साल पहले कहा था कि वो कश्मीर पर सभी पक्षों को साथ लेकर बात करेगी। इस ओर क्या किया गया है? इन सब जरूरी प्रश्नों से किसी को कुछ लेना देना नहीं है। बस खाली माहौल बनाना है। असल में मरने वाले तो वैसे भी किसानों और मजदूरों के बेटे होते हैं इन एंकरों और नेताओं के नहीं.

आप अपने आसपास माहौल देखिए. कुछ लोग सरकार से ये नहीं पूछ पा रहे हैं कि आखिर इतनी बड़ी चूक कैसे हुई? ये नहीं पूछ पा रहे हैं कि सरकार तमाम एजेंसियों का प्रयोग आतंकी साजिशों को नाकाम करने की जगह अपने राजनैतिक विरोधियों के खिलाफ क्यों करती है?

आज के इस समय में जब तकनीक एक ऐसे स्तर पर पहुंच गई है कि अब किसी भी गतिविधि पर निगरानी रखी जा सकती है, उस समय में कोई कैसे 350 किलो विस्फोटक लेकर 2500 जवानों के काफिले पर हमला कर सकता है, वो भी उस जगह जहां प्रत्येक 6 नागरिकों पर एक हथियारबंद सैनिक तैनात है. कुछ लोगों को इन सवालों के जवाब नहीं चाहिए.

लोग नहीं जानना चाहते हैं कि इन जाहिल धार्मिक उन्मादियों के पास हथियार कहां से आते हैं. किन पूंजीपतियों का पैसा इन हथियारों में लगा होता है. कौन लोग ताबूत बेचते हैं और कौन मेडिकल सुविधाओं को बेचकर मुनाफा कमाते हैं. इन प्रश्नों पर कोई भी रुककर नहीं सोचना चाहता.

ले देकर हल क्या निकाला जाता है. तमाम मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का वध कर दो. सब ठीक हो जाएगा. अरे, मानाधिकार कार्यकर्ताओं को तो पहले से ही मारा जाता आ रहा है, उससे कोई हल निकला? नहीं.

असल ये सब बातें एक विशुद्ध एजेंडे के तहत की जा रही हैं. ऐसी बातें करने वाले सैनिकों की लाशों को गिद्ध बनकर नोच रहे हैं. अगर ऐसा ना होता तो ये सरकार से वाजिब प्रश्न ना पूछते. इन्हें ना तो आम मेहनतकश आवाम की फिक्र है और न ही सैनिकों की. ये नफरत और उन्माद में डूबे लोग हैं, गोलियों और बमों की आवाज से ये उत्तेजित होते हैं और बेकसूरों का बहता हुआ खून देखकर चरमोत्कर्ष पर पहुंचते हैं

टीवी वाले आपको समस्या की जड़ तक नहीं पहुँचने देना चाहते हैं। वे आपकी नशों में केवल जहर भरना चाहते हैं। बेहतर है कि आप इनसे दूर रहें। इन्होंने आजतक न तो कश्मीर पर कोई किताब पढ़ी होगी और ना ही कभी वहां जाकर कुछ समझने सोचने की कोशिश की होगी। इनका एक बना बनाया उन्मादी नजरिया जिसके पार देखने की कभी इन्होंने कोशिश नहीं की। किसी ने अगर दिखाना भी चाहा तो ये उसी पर चढ़ बैठे। इन्होंने विश्व इतिहास में हुए युद्धों से भी कुछ नहीं सीखा होगा। जिस धरती पर युद्ध होता है वो सालों साल तक बंजर हो जाती है।

खैर, नफरत फैलाने वाले हर के प्रयास को नाकाम कीजिये। ज्यादा उत्तेजित मत होइए। अपने विवेक का प्रयोग कीजिये। नफरत फैलाने वालों को समझाने का प्रयास करिए। उन्हें रोकिए।

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